शक्ति सम्पन्न होना अच्छा होता है और साथ में वैभव सम्पन्न होना तो सोने पर सुहागे जैसा होता है। लेकिन अगर इसे लेकर कोई दंभ करे और शेष सबको धमकाने और पैरों तले रौंदने लायक समझे तो फिर शक्ति और वैभव को श्राप लगना विधि का विधान होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका का इन दिनों जैसा व्यवहार सामने दिख रहा है उसे इन कसौटियों पर परखें तो यह तस्वीर साफ दिखाई देती है। बात सिर्फ वेनेजुएला की नहीं है, बात सिर्फ उसके राष्ट्रपति को मादक पदार्थों के कारोबार में लिप्त बताकर उसकी राजधानी से रात के अंधेरे में अगवा कर लेने भी की भी नहीं है।
बात है, वहां के तेल और सोने के भंडारों की, जिनके अमेरिका की जद में न होना, स्वाभाविक ही उसे खलता रहा है। इतिहास बताता है कि विश्व में जो देश अमेरिकी थानेदारी को सलाम नहीं करता, उससे फिर अन्यान्य तरीकों से सांचे में ढलने को मजबूर किया गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार कुर्सी पर बैठते ही जिस प्रकार भारत सहित अनेक देशों पर बेतहाशा टैरिफ जड़े और हठधर्मिता दिखाते हुए उन्हें न्यायोचित बताया, वह आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा। जिहाद के लिए दुनियाभर में बदनाम पाकिस्तान के सेना प्रमुख को उस ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के ठीक बाद व्हाइट हाउस बुलाकर भोज देना कौन सी रणनीतिक बाध्यता थी, जिसमें भारत ने पाकिस्तान पोषित जिहादियों के ठिकाने ध्वस्त किए थे!
इसी ‘शक्ति’ के मद में चूर गजनी का महमूद मजहबी उन्माद पर सवार होकर भारत के आस्था केन्द्रों पर चढ़ आया था। सागर किनारे स्थित भव्य सोमनाथ मंदिर को उसने न सिर्फ लूटा, बल्कि शिवलिंग को अपमानित करने के हर प्रयास किए थे। उसके कई आक्रमणों के बाद अंतत: 1026 में उसे पराजित होकर जान बचाकर यहां से भागना पड़ा था। उसके उस आक्रमण के हजार साल बाद आज भी, सोमनाथ अटूट सनातन आस्था का दिव्य प्रतीक बना हुआ है। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ इसी का गौरव गान करने का अवसर है।
और आज अवसर भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के गौरवगान का भी है। राष्ट्र आज हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा से निखर रहा है और दुनिया का मार्गदर्शन कर रहा है। विशेषकर युवाओं ने इस राष्ट्र की अस्मिता को पुन: विश्व में शिखर पर पहुंचाने का बीड़ा उठाया है और युवाओं का यही भाव नई दिल्ली में 2-4 जनवरी को आयोजित शब्दोत्सव में साफ दिखा भी। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ,
दक्ष प्रतिनिधियों ने साहित्य, विमर्श, कला, राजनीति, प्रतिरक्षा, पत्रकारिता आदि में आ रहे सकारात्मक बदलाव का चित्र प्रस्तुत किया।
यह बदलाव जनजातीय समाज में भी आ रहा है। कन्वर्जन का शिकार बने अनेक जनजातीय बंधु न सिर्फ स्वधर्म में लौट रहे हैं, बल्कि सत्ता द्वारा नियमों को विकृत करके उनका अहित करने वाले कानून बनाने का मुखर विरोध भी कर रहे हैं।
समाज की संगठित शक्ति का यह विरोध ही है जो गलत करने वालों को सबक सिखाता है। 2020 के दिल्ली दंगे के साजिशकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत के लिए न्यूयार्क से नई दिल्ली तक के वामपंथी सेकुलर ईकोसिस्टम ने जोर लगाया, लेकिन समाज में उनके प्रति आक्रोश इतना है कि सर्वोच्च न्यायालय को भी उनकी जिहादी करतूत पहचानने में कोई बाधा न आई।
इन सब विषयों को समेटे है पाञ्चजन्य का यह अंक।

















