उन्नीस साै इक्यावन में सौराष्ट्र (गुजरात) के वेरावल में सुप्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा स्वतंत्र भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र्र प्रसाद के हाथों हुई थी। उस समय सरदार पटेल, के. एम. मुंशी, महात्मा गांधी, वी.पी. मेनन, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे मूर्धन्य नेताओं ने सोमनाथ मंदिर के निर्माण कार्य को भारतीयों की चिरविजयी अस्मिता और गौरव का प्रतीक माना था।
हालांकि पं. नेहरू जैसे नेता ने इस घटना का ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ कहकर विरोध भी किया। उस समय नेहरू से हुई बहस को कन्हैयालाल मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘पिलग्रिमेज टू फ्रीडम’ में दर्ज किया है। यह प्रकरण पढ़ने योग्य है, क्योंकि तब ही हम भारत के सांस्कृतिक इतिहास में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के महत्व और इसके विरोध को भी समझ सकेंगे। चूंकि अयोध्या के राम मंदिर की तरह, सोमनाथ मंदिर पर भी एक मुस्लिम आक्रांता महमूद गजनवी ने कई बार हमला किया और उसे नष्ट किया था इसलिए के. एम. मुंशी की पुस्तक से उद्धृत अंश आज के सन्दर्भों में भी सांस्कृतिक विरासत के लिए राष्ट्र भावना के साथ राजनीति के छोटे भाग की संकीर्णता को रेखांकित करने में सक्षम हैं।
के.एम. मुंशी लिखते हैं, “दिसंबर, 1922 में मैं उस भग्न मंदिर की तीर्थयात्रा पर निकला। वहां पहुंचकर मैंने मंदिर में भयंकर दुरावस्था देखी-अपवित्र, जला हुआ और ध्वस्त, पर फिर भी वह दृढ़ खड़ा था, मानो हमारे साथ की गई कृतघ्नता और अपमान को न भूलने का संदेश दे रहा हो। उस दिन सुबह जब मैंने पवित्र सभामंडप की ओर कदम बढ़ाए तो मंदिर के खंभों के भग्नावशेषों और बिखरे पत्थरों को देखकर मेरे अंदर अपमान की कैसी अग्निशिखा प्रज्ज्वलित हो उठी थी, मैं बता नहीं सकता।’
सांस्कृतिक धरोहरें केवल भौतिक प्रतीक नहीं होतीं। सामाजिक मूल्यों और परंपराओं में पगे ये ऐसे सूत्र होते हैं जिनमें समाज को बांधने की, उत्साह देने की शक्ति होती है। के.एम. मुंशी आगे लिखते हैं, “नवंबर, 1947 के मध्य में सरदार प्रभास पाटन के दौरे पर थे, जहां उन्होंने मंदिर का दर्शन किया। एक सार्वजनिक सभा में सरदार ने घोषणा की, ‘नए साल के इस शुभ अवसर पर हमने फैसला किया है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण करना चाहिए। सौराष्ट्र के लोगों को अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देना होगा। यह एक पवित्र कार्य है जिसमें सभी को भाग लेना चाहिए।’ …कुछ लोगों ने प्राचीन मंदिर के भग्नावशेषों को प्राचीन स्मारक के रूप में संजोकर रखने का सुझाव दिया, जिन्हें मृत पत्थर जीवंत स्वरूप की तुलना में अधिक प्राणवान लगते थे। लेकिन मेरा स्पष्ट मानना था कि सोमनाथ का मंदिर कोई प्राचीन स्मारक नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के हृदय में स्थित पूजा स्थल था जिसका पुनर्निर्माण करने के लिए अखिल राष्ट्र प्रतिबद्ध था।”

राष्ट्रीय विषयों पर मतभिन्नता
उस समय भी हमारे राष्ट्रीय नेता दो अलग-अलग विचारों में बंटे थे। सामाजिक-राष्ट्रीय महत्व के कुछ मुद्दों पर कई बार राजनीति के अलग-अलग मत और पक्ष देखने को मिलते हैं। इसका कारण राष्ट्र और समाज को लेकर राजनीति के अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। सोमनाथ पर नेहरू जी का दृष्टिकोण या अयोध्या पर आज उठतीं छिटपुट विरोध की आवाजें इसी संदर्भ में देखी जा सकती हैं। के.एम. मुंशी लिखते हैं, “कैबिनेट की बैठक के अंत में जवाहरलाल ने मुझे बुलाकर कहा-मुझे सोमनाथ के पुनरुद्धार के लिए किया जा रहा आपका प्रयास पंसद नहीं आ रहा। यह हिंदू पुनरुत्थानवाद है।” मैंने जवाब दिया, “मैं घर जाकर, जो कुछ भी घटित हुआ है उसके बारे में आपको जानकारी दूंगा।”
सवाल यह है कि आखिर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने इसे ‘हिंदू पुनरुत्थान कार्य’ कहकर विरोध क्यों किया था! जबकि के.एम. मुंशी ने इसे ‘भारत की सामूहिक अंत:चेतना’ कहा और इस प्रयास को लेकर आम लोगों में खुशी की लहर का संकेत दिया था। एक ही मुद्दे पर दो विरोधी दृष्टिकोण क्यों बन जाते हैं? मूलत: ये भारत के दो अलग-अलग विचार हैं। पंडित नेहरू भारत विरोधी नहीं थे, लेकिन भारत के संबंध में उनका नजरिया यूरोपीय विचारधारा पर केंद्रित था जो भारतीयता से अलग था, अभारतीय था, वहीं सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, के.एम. मुंशी और अन्य लोगों के भारत संबंधी विचार भारतीयता की मिट्टी से जुड़े थे, जिसमें भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा का सार निहित था। यहां तक कि महात्मा गांधी ने भी इसे स्वीकृति दी थी, उन्होंने केवल यह शर्त रखी थी कि मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए धनराशि जनता के सहयोग से इकट्ठी की जाए।
के.एम. मुंशी आगे लिखते हैं, “24 अप्रैल, 1951 को मैंने उन्हें (श्री नेहरू को) एक पत्र लिखा था, जिसे मैं आगे अक्षरश: पुन: प्रस्तुत कर रहा हूं, “…जब सरदार ने बापू (गांधीजी) के साथ पूरी योजना पर चर्चा की तो उन्होंने कहा कि यह बिल्कुल सही है, बशर्ते मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक धन जनता के सहयोग से इकट्ठा किया जाए। गाडगिल ने भी बापू से मुलाकात की और बापू ने उनको भी यही सलाह दी थी। उसके बाद मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए भारत सरकार की ओर से आर्थिक सहायता की बात पर विराम लग गया।…सोमनाथ के संबंध में आपने कैबिनेट में स्पष्ट रूप से मेरा नाम लिया। मुझे खुशी है कि आपने ऐसा किया, क्योंकि मैं अपने किसी भी विचार या कार्य को छिपाना नहीं चाहता, खासकर आपसे, जिसने बीते महीनों में मुझ पर इतना भरोसा किया है। मैंने कई संस्थानों के भवनों के निर्माण में मदद पहुंचाई है। …ऐसे किसी कार्य में सहायता प्रदान करते समय मेरा वकील होना या एक आम नागरिक या मंत्री होना सिर्फ एक संयोग मात्र है। आप अच्छी तरह जानते हैं कि मेरे ऐतिहासिक उपन्यासों ने गुजरात के प्राचीन इतिहास से आधुनिक भारत को परिचित कराया है और मेरा उपन्यास ‘जय सोमनाथ’ देश भर में चर्चित है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि भारत की ‘सामूहिक अंत:चेतना’ किसी अन्य कार्य की तुलना में सोमनाथ के पुनर्निर्माण के लिए भारत सरकार के समर्थन के बारे में सुनकर ज्यादा खुश है।”
“कल आपने ‘हिंदू पुनरुत्थान’ के संदर्भ में बात की। मैं आपके विचारों से अवगत हूं। मैंने हमेशा उनका सम्मान किया है। मुझे उम्मीद है कि आप मेरे विचारों के साथ भी न्याय करेंगे। मैंने अपने साहित्यिक और सामाजिक कार्यों के माध्यम से हिंदू धर्म के कुछ पहलुओं की आलोचना करते हुए उन्हें नया रूप देने या बदलने का विनम्र निवेदन किया है, इस विश्वास के साथ कि यह छोटा सा कदम ही आधुनिक वातावरण में भारत को एक उन्नत और सशक्त राष्ट्र बना सकता है।…एक बात और कहना चाहूंगा कि अतीत पर मेरा विश्वास मुझे वर्तमान में काम करने और भविष्य की ओर बढ़ने की शक्ति दे रहा है। मेरे लिए ऐसी आजादी का कोई मूल्य नहीं हो सकता, जो हमें भगवद्गीता से वंचित कर दे, या हमारे जैसे लाखों लोगों के मन में मंदिरों के प्रति बसी आस्था को उखाड़ फेंके और हमारे जीवन के बुनियादी स्वरूप को ही नष्ट कर दे। मुझे सोमनाथ के पुनरुद्धार के सपने को जीने और उसे साकार करने का विशेषाधिकार दिया गया है। इससे मुझे महसूस होता है, और मुझे पूरा विश्वास भी है, कि जब यह मंदिर हमारे जीवन में अपनी पूर्ण गरिमा और आस्था के साथ स्थापित हो जाएगा, तब लोगों को धर्म की ज्यादा सुयोग्य अवधारणा और हमारी शक्ति की सुस्पष्ट चेतना की अनुभूति प्राप्त होगी, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस वर्तमान समय के दौरान और स्वतंत्रता के परिणामों को परखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।” मेरे पत्र को पढ़ने के बाद राज्य मंत्रालय के सलाहकार श्री वी.पी. मेनन ने मुझे निम्नलिखित जवाब भेजा, “मैंने आपका शानदार पत्र पढ़ा। मैं शायद वह व्यक्ति हूं, जो आपके पत्र में व्यक्त आपके दृष्टिकोण को जीने या आवश्यक हुआ तो उसके लिए प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार रहूंगा।”

उन्होंने लिखा है, “सोमनाथ में प्राण-प्रतिष्ठा के साथ एक और घटना जुड़ी हुई थी। जब प्राण-प्रतिष्ठा का समय आया, तो मैंने राजेंद्र प्रसाद (भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति) से संपर्क किया और उनसे समारोह का उद्घाटन करने का निवेदन किया। लेकिन मैंने उनसे यह भी कहा कि अगर वह मेरा निमंत्रण स्वीकार करते हैं तो उन्हें अवश्य आना होगा। प्रधानमंत्री के साथ मेरा पत्राचार उनसे छिपा नहीं था। उन्होंने वादा किया कि प्रधानमंत्री का जो भी दृष्टिकोण हो, वह आएंगे और प्राण-प्रतिष्ठा भी करेंगे और कहा, ‘मैं एक मस्जिद या चर्च के साथ भी ऐसा ही करता, अगर मुझे वहां निमंत्रित किया जाता।’ मेरी आशंका सही साबित हुई। जैसे ही यह घोषणा की गई कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद मंदिर का उद्घाटन करने आ रहे हैं, तो जवाहरलाल ने उनके सोमनाथ जाने का जोरदार विरोध किया। लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने अपना वादा पूरा किया। सोमनाथ में दिए उनके भाषण को सभी अखबारों में प्रकाशित किया गया था, लेकिन उसे सरकारी विभागों के दस्तावेजों में दर्ज नहीं किया गया।”
कैसी विडंबना थी कि भारत में उदारवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रतीक होने का दम भरने वालों ने भारत के महामहिम राष्ट्रपति के भाषण को सरकारी विभागों के दस्तावेजों से काट कर हटा दिया गया! नेहरू सहित देश में उस समय अनेक व्यक्ति थे, जो सोमनाथ मंदिर के निर्माण का विरोध कर रहे थे, पर वहीं गांधी जी सहित राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े नेताओं ने इसका समर्थन किया था। उन्हीं के प्रयासों के परिणामस्वरूप आज देश भर से लाखों श्रद्धालु एक भव्य और अद्भुत मंदिर के दर्शन करने सोमनाथ पहुंचते हैं।
60 साल तक एक ही दल के निरंतर शासन के कारण इस अनुदार धारणा को ही सरकार द्वारा संरक्षण, पोषण और समर्थन मिलने के कारण बौद्धिक जगत, शिक्षा संस्थानों और मीडिया में भारत की यही अभारतीय अवधारणा प्रतिष्ठित कर दी गई है। इसलिए अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के विरोध में उभरने वाली आवाजें मीडिया और बौद्धिक जगत में ज्यादा तेज दिखाई देती हैं। लेकिन करोड़ों भारतीय ऐसे हैं जो भारत की भारतीय अवधारणा को अंत:करण से मानते हैं, जो भारत की एकात्म और समग्र आध्यात्मिक परंपरा के साथ गहराई से जुड़ा है और ‘भारत की सामूहिक अंत:चेतना’ के अनुरूप है। भारत की यह अंत:चेतना वही है जिसे सरदार पटेल, के.एम. मुंशी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, महात्मा गांधी, डॉ. राधाकृष्णन, पं. मदनमोहन मालवीय और आधुनिक स्वतंत्र भारत के कई दिग्गज राष्ट्र निर्माताओं ने अपनी वाणी और आचरण से अभिव्यक्त किया है।
(पाञ्चजन्य, 9 अगस्त, 2020)


















