“अपवित्र, अग्निशप्त और क्षत-विक्षत होकर भी वह हमारे अपमान और अकृतज्ञता का प्रतीक बन कर दृढ़ता से खड़ा हुआ था। उषा काल के उन क्षणों में जब मैं उस सभा मण्डप, जो कभी भव्यता और श्रद्धा का केंद्र था, के टूटे-फूटे फर्श पर (जहां चारों ओर खण्डित स्तम्भ और पाषाण खण्ड बिखरे हुए थे) चलने लगा तो मेरा मन शर्म की इतनी गहरी टीस से भर उठा कि उसका वर्णन करना भी कठिन है। मेरी अनजानी पदचाप से चौंक कर छिपकलियां छेदों से निकल कर इधर से उधर भागने लगीं। वहां बंधा किसी पुलिस उप निरीक्षक का घोड़ा भी मुझे देखकर घोर अवज्ञा के साथ हिनहिनाने लगा।”
यह वर्णन है दिसम्बर, 1922 का जब महान साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने पहली बार प्रभास पाटन की यात्रा की और सोमनाथ मन्दिर के भग्नावशेषों को अपनी आंखों से देखा। इन भग्नावशेषों के सामने खड़े होकर उन्होंने कल्पना नेत्रों से सोमनाथ मन्दिर का विध्वंस पूर्व का भव्य चित्र बना डाला। गगनचुम्बी मन्दिर में प्रतिष्ठित विशाल शिवलिंग, पूजा-अर्चना में रत आचार्यों का विशाल समूह, मृदंग की थाप पर नृत्य करतीं देवगणिकाएं, सोमनाथ भगवान के दर्शनों के लिए आतुर श्रद्धालुओं की लम्बी कतारें। और तभी अनायास मन्दिर पर विधर्मी विदेशियों का आक्रमण। हृदय विदारक विध्वंसलीला, सहस्रों श्रद्धालुओं के रक्त में डूबी नंगी तलवारें। राष्ट्रीय अपमान के उन क्षणों की स्मृति ने मुंशी जी के भावुक अन्तःकरण को विदीर्ण कर दिया, बेचैन कर दिया। यह वेदना किसी एक अन्तःकरण तक सीमित नहीं थी, कोटि-कोटि भारतवासियों के अचेतन मानस में व्याप्त थी। इस वेदना को 1905 में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग नगर में महात्मा गांधी ने 3 और 11 मार्च को ‘हिन्दू धर्म’ पर अपने दो भाषणों में मुखरित किया था। इस्लाम के नाम पर विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा भारत की भूमि पर प्रदर्शित मजहबी असहिष्णुता और विध्वंसलीला के उदाहरणस्वरूप उन्होंने महमूद गजनवी के हाथों सोमनाथ मन्दिर के ध्वंस का उदाहरण पीड़ा के साथ दिया था। गुजरात के प्रत्येक परिवार में परम्परा से चली आ रही इस पीड़ादायक स्मृति ने कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के संवेदनशील युवा अन्तःकरण को 1910 में ही, जब वे कालेज विद्यार्थी थे, सोमनाथ मन्दिर की विध्वंस गाथा पर एक खोजपूर्ण लेख प्रकाशित करने की प्रेरणा दी थी।
अपमान की टीस
विध्वंस गाथा में व्याप्त राष्ट्रीय पराजय और अपमान की टीस उनके मानस पर इस कदर हावी थी कि 1938 में उन्होंने कश्मीर में लिद्दर नदी के किनारे पहलगाम में बैठकर ‘जय सोमनाथ’ नामक उपन्यास में सोमनाथ मन्दिर के वैभव के साथ-साथ उस विध्वंस गाथा का दिल दहलाने वाला कल्पना चित्र बना डाला। पर उनकी टीस केवल भावुक लेखन तक सीमित नहीं रही। वे गुजराती साहित्य के महान उपन्यासकार के रूप में तो प्रतिष्ठित हुए ही, पर उनके पास वकील की पैनी तर्क बुद्धि और इतिहास के शोधकर्ता की वैज्ञानिक दृष्टि भी थी। उन्होंने 1938 में भारतीय विद्या भवन की स्थापना की। इससे भी आगे वे गांधीजी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन के अंग थे और 1937-39 में बम्बई प्रान्त में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल में गृहमंत्री थे। वे स्वतंत्र भारत के पहले नेहरू मत्रिमण्डल के सदस्य भी रहे। किन्तु इन अनेकविध महत्वपूर्ण भूमिकाओं का निर्वाह करते समय भी सोमनाथ मन्दिर की विध्वंस लीला उनकी आंखों के सामने नाचती रही। गांधी और नेहरू के समस्त प्रयत्नों के बावजूद मातृभूमि का विभाजन हो ही गया, तब खण्डित भारत की अस्मिता की घोषणा स्वरूप मुंशी की पहल पर लौहपुरुष सरदार पटेल और नेहरू मंत्रिमण्डल के एक अन्य सदस्य नरहर विष्णु गाडिगल के सक्रिय सहयोग से, गांधीजी के आशीर्वाद एवं नेहरू मत्रिमण्डल की आधिकारिक सहमति से सोमनाथ मन्दिर का पुनर्निर्माण प्रारम्भ हुआ। 11 मई, 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के हाथों पुनर्निर्मित गर्भगृह में शिवलिंग की प्रतिष्ठापना की घोषणा हो गई। तब मुंशी के भीतर विद्यमान इतिहासकार ने सोमनाथ-अक्षय मन्दिर (सोमनाथ-दि इटरनल श्राइन) नामक ग्रंथ की रचना कर डाली, जिसमें सभी पुरातात्विक, अभिलेखीय एवं साहित्यिक स्रोतों का अवगाहन कर प्रभास तीर्थ एवं वहां स्थित सोमनाथ मन्दिर के धार्मिक महत्व व विदेशी आक्रमणकारियों एवं विधर्मी शासकों के विरुद्ध उनकी लम्बी संघर्ष गाथा का पूरा इतिहास प्रस्तुत कर दिया।

पैरों से रौंदा शिवलिंग को
भगवान श्रीकृष्ण के देहोत्सर्ग एवं यादवों की विनाशलीला का स्थल होने के कारण प्रभास तीर्थ महाभारत काल से ही प्रसिद्ध रहा। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में अशोक के शिलालेख, दूसरी शताब्दी ईसवीं में रुद्रदाकयन का अभिलेख अति प्राचीन काल से इस क्षेत्र के महत्व का निदर्शक है। पहली शताब्दी ईसवीं में शक राजा नहपाण के अभिलेख में प्रभास तीर्थ में पूजा करने और ब्राह्मणों को दान देने का उल्लेख मिलता है। पूरे भारत को व्याप्त करने वाले द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से सोमनाथ एक है। शैव मत के पाशुपत सम्प्रदाय के आचार्यों का वह प्रमुख केन्द्र था। इस पवित्र तीर्थ में मन्दिर का सर्वप्रथम निर्माण कब हुआ, इसका निर्णय कर पाना इतिहासकारों के लिए सम्भव नहीं हो रहा। किन्तु 1025 ईसवीं में महमूद गजनवी ने जिस मन्दिर का विध्वंस किया उसकी विशालता, भव्यता, धार्मिक महत्व का वर्णन गजनवी के समकालीन विद्वान अलबेरूनी की कलम से हमें प्राप्त होता है। वह लिखता है, “सोमनाथ पत्तन उस जगह स्थित है, जहां प्राचीन वैदिक नदी सरस्वती समुद्र में गिरती है और जहां भगवान कृष्ण का देहोत्सर्ग हुआ था।” अन्यत्र वह दक्ष प्रजापति द्वारा चन्द्रमा को शाप देने की पौराणिक कथा का वर्णन करते हुए लिखता है, “चन्द्रमा के बहुत याचना करने पर प्रजापति ने उपाय बताया कि महादेव के लिंग की प्रतिमा की पूजा करने से ही वह शापमुक्त हो सकेगा। तब चन्द्रमा ने पत्थर का लिंग स्थापित किया जो सोमनाथ कहलाया, क्योंकि सोम अर्थात् चन्द्रमा और नाथ अर्थात् स्वामी तो सोमनाथ अर्थात् चंद्रमा के स्वामी।”
अलबेरूनी के अनुसार, “उन दिनों सिंध के क्षेत्र में शिवलिंग की पूजा व्यापक रूप से प्रचलित थी। इनमें सोमनाथ की सर्वाधिक प्रतिष्ठा थी। उस पर चढ़ाने के लिए नित्यप्रति गंगाजल और कश्मीर से पुष्प लाए जाते थे। हिन्दुओं का विश्वास था कि सोमनाथ लिंग की उपासना करने से वे असाध्य रोगों से भी मुक्ति पा सकते हैं। चन्द्रमा से जुड़ी ज्वार-भाटे की प्रक्रिया के कारण समुद्र का जल बार-बार शिवलिंग को नहला कर वापस लौट जाता है। यह भी लोगों को चमत्कृत करता था।” अलबेरूनी को प्राप्त जानकारी के अनुसार, “शिवलिंग के चारों ओर किले जैसा एक विशाल मन्दिर विद्यमान था। वह रत्नों और स्वर्ण रजत प्रतिमाओं से भरा हुआ था।” ग्यारहवीं शताब्दी के ही एक अन्य मुस्लिम लेखक अल-गिरटिजी ने अपनी रचना ‘किताब जैन-उल-अखबार’ में सोमनाथ के महत्व का वर्णन करते हुए लिखा है, “हिन्दुस्थान में समुद्र के किनारे एक बड़ा शहर सोमनाथ है, जो हिन्दुओं के लिए उतना ही पवित्र माना जाता है जितना कि हम मुसलमानों के लिए मक्का है।”
अलबेरूनी ने महमूद गजनवी द्वारा मन्दिर के विध्वंस का वर्णन करते हुए लिखा है, “महमूद ने सोमनाथ मन्दिर पर हमला 416 हिजरी या 947 शक काल में किया। उसने शिवलिंग के ऊपरी हिस्से को चूर-चूर करने का आदेश दिया और शेष भाग को रत्नजड़ित कशीदाकारी युक्त मखमली गलीचों आदि के साथ गजनी भेजने का आदेश दिया। उसके कुछ भाग को गजनी शहर की मुख्य घुड़साल में रखवा दिया, जहां थानेश्वर से लाई गई चक्रस्वामिन भगवान की प्रतिमा भी रखी हुई थी। कुछ भाग को गजनी की जामा मस्जिद के प्रवेश द्वार पर फिंकवा दिया, ताकि वहां आने वाले लोग उसे अपने पैरों से रौंद कर अपने तलुवों में लगी गन्दगी और गीलेपन को साफ कर सकें।”
बाद के मुस्लिम लेखकों ने इस हमले और विध्वंसलीला का बहुत विशद् रोमांचकारी वर्णन किया है। वे बताते हैं, “विशाल घुड़सवार सेना के साथ महमूद के अचानक सोमनाथ मन्दिर के सामने पहुंचने से वहां उपस्थित हजारों श्रद्धालु दर्शनार्थियों की भीड़ और मन्दिर में कार्यरत पुजारी वर्ग हतप्रभ रह गए, भगदड़ मच गई। हजारों निर्दोष असावधान हिन्दुओं का कत्लेआम हुआ। तोड़फोड़ और लूटपाट के काम को जल्दी-जल्दी पूरा करके महमूद अपनी सेना के साथ भाग निकला।” उसकी इस जल्दबाजी के कारणों पर प्रकाश डालता हुआ लगभग उसका समकालीन लेखक अल-गिरटिजी लिखता है, “उसके पीछे हटने का कारण यह था कि हिन्दुओं का प्रमुख राजा परमदेव इस आकस्मिक आक्रमण की सूचना पाकर सोमनाथ की ओर चल पड़ा था और अमीर महमूद को भय था कि कहीं उसकी महान विजय धूल में न मिल जाए। वह सिन्धु नदी के किनारे-किनारे मन्सूरा के रास्ते से मुल्तान की ओर गया। रास्ते में रेगिस्तानी प्रदेश और सिंध के जाटों के कारण उसके सैनिकों को भारी हानि उठानी पड़ी। मुल्तान पहुंचने के पहले ही रास्ते में उसके जानवर और मुस्लिम सैनिक बड़ी संख्या में काल-कवलित हो गए।”
महमूद गजनवी का भारत पर यह अन्तिम आक्रमण था। वह पिछले अनेक वर्ष से लगातार आक्रमण कर रहा था। मुस्लिम लेखकों के अनुसार, “उसने खलीफा को वचन दिया था कि वह उत्तर भारत के अति महत्वपूर्ण श्रद्धा केन्द्रों पर आक्रमण करके करोड़ों हिन्दुओं की श्रद्धेय देव-प्रतिमाओं का विध्वंस करेगा और बुतशिकन कहलाने का गौरव प्राप्त करेगा। उसकी इस मजहबी निष्ठा के प्रमाणस्वरूप मुस्लिम लेखकों ने कहानी गढ़ी है कि सोमनाथ के पुजारियों ने उसे सोमनाथ लिंग का विध्वंस न करने के एवज में अपार धन-सम्पदा का लालच दिया, किंतु उसने उसे यह कह कर ठुकरा दिया कि मैं यहां धन बटोरने के लिए नहीं, बुतपरस्ती के कुफ्र को मिटाने आया हूं।”

मजहबी उन्माद
महमूद गजनी अपनी विध्वंसलीला में सफल क्यों हो सका! मथुरा, थानेश्वर, कांगड़ा, मुल्तान, सोमनाथ आदि सभी दूरस्थ तीर्थस्थानों पर एक के बाद एक हमले करके बिना किसी प्रतिरोध के सुरक्षित वापस कैसे लौट सका, इसकी कारण मीमांसा बहुत आवश्यक है। किन्तु कुछ कारण तो बहुत स्पष्ट हैं। एक है भारत का अनेक छोटे-छोटे जनपदीय राज्यों में विभाजित होना। अर्थात् अखिल भारतीय स्तर पर राजनीतिक एकता का अभाव, और दूसरा कारण है भारत की सैनिक प्रणाली और महमूद द्वारा अंगीकृत सैनिक प्रणाली में भारी अन्तर। उन दिनों भारत में स्थायी सेना रखने की पद्धति नहीं थी। युद्ध आमने-सामने की व्यूह रचना करके होता था। शत्रु के आक्रमण की घोषणा होने पर सामन्त लोग अपने-अपने युद्ध अनुचरों और सैनिकों को बटोर कर रणस्थल में पहुंचते थे। इसके विपरीत महमूद गजनवी ने बिल्कुल नई ‘सैनिक प्रणाली’ को अपनाया। उसकी सेना में पैदल सैनिकों, हाथियों और रथों का कोई स्थान नहीं था। वह तेज घुड़सवार सेना को लेकर पहले से निर्धारित किसी तीर्थस्थल पर अचानक धावा बोलता था और जब तक भारतीय राजागण अपनी सेनाओं को बटोरते थे तब तक वह अपनी विध्वंसलीला पूरी करके गजनी वापस पहुंच जाता था। किन्तु महमूद गजनवी के इस मजहबी उन्माद और उसकी विध्वंसलीला का हिन्दू मन पर जो गहरा प्रभाव हुआ उसका चित्रण अलबेरूनी की कलम से हमें प्राप्त हो जाता है। वह अपनी प्रसिद्ध रचना ‘तारीख-ए-हिन्द’ में लिखता है, “धर्म के मामले में हिन्दू हमसे बिल्कुल भिन्न हैं, क्योंकि हमारा उनकी किसी चीज में विश्वास नहीं, न ही उनका हमारी बातों में। सच तो यह है कि रहन-सहन और रीति-रिवाजों में वे हमसे इतने अलग हैं कि अपने बच्चों को हमारे नाम से, हमारे तौर-तरीकों, रीति-रिवाजों से डराते हैं, हमें शैतान की औलाद बताते हैं, हमारे हर काम को बुरा और अनुचित कहते हैं।”
अलबेरूनी स्वीकार करता है, “हिन्दुओं के पूर्वज इतने संकुचित नहीं थे, जितनी कि उनकी वर्तमान पीढ़ी दिखायी देती है।” और इसके लिए मुस्लिम आक्रमणों को उत्तरदायी ठहराते हुए वह लिखता है, “विदेशियों के प्रति हिन्दुओं के मन में घृणा और दूरी का भाव तब से बहुत अधिक बढ़ गया है जबसे मुसलमानों ने उनके देश में घुसना शुरू किया है।”
अलबेरूनी लिखता है, “महमूद गजनवी ने उनके देश की समृद्धि को बुरी तरह नष्ट कर दिया। उसके चमत्कारी अमानुषिक कारनामों से हिन्दू लोग धूल के कणों की तरह चारों ओर बिखर गए और वे केवल कहानी बन कर रह गए। उनके बिखरे अवशेषों में निस्सन्देह समस्त मुसलमानों के प्रति अत्यन्त घृणा का भाव पैदा हो गया है।” वह और स्पष्ट करता है, “यही कारण है कि तमाम हिन्दू विद्वान और वैज्ञानिक हमारे द्वारा जीते गए प्रदेशों को छोड़कर कश्मीर, बनारस आदि ऐसे दूरस्थ स्थानों को भाग गए हैं, जहां हमारे हाथ नहीं पहुंच सकते हैं। और अब उनके और विदेशियों के बीच कटुता की खाई राजनीतिक एवं मजहबी कारणों से अधिकाधिक गहरी होती जा रही है।” अलबेरूनी का निष्कर्ष है कि इन घटनाओं ने हिन्दुओं के अन्तःकरणों में घृणा की जड़ों को गहरा करने का काम किया है।
इस समकालीन साक्षी के आलोक में देखें तो स्पष्ट होगा कि मथुरा, थानेश्वर और सोमनाथ जैसे मन्दिरों की विध्वंसलीला इस देश के अचेतन मानस में पराजय और अपमान की गहरी वेदना बनकर समा गयी है। यह वेदना पीढ़ी दर पीढ़ी सोमनाथ मन्दिर के पुनर्निर्माण के प्रयास के रूप में प्रकट हुई। सोमनाथ का मन्दिर बार-बार बना, बार-बार तोड़ा गया। और इस प्रकार वह हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक चिन्ह बन गया। इसका पुनर्निर्माण हमारा राष्ट्रीय स्वप्न बन गया। यह स्वप्न महात्मा गांधी की आंखों में, सरदार पटेल की आंखों में था, नरहर गाडगिल की आंखों में था, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की आंखों में था। (पाञ्चजन्य : 2 जनवरी, 2000)















