आस्था पर चोट सही नीयत में खोट नहीं!
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आस्था पर चोट सही, नीयत में खोट नहीं!

आस्था पर चोट हुई है तो पीड़ा स्वाभाविक है। व्यवस्था में चूक हुई है तो सुधार अनिवार्य है। अपराध हुआ है तो दंड आवश्यक है। पर नीयत में खोट सिद्ध करने से पहले प्रमाण चाहिए। मंदिर हिंदू समाज की आस्था के केंद्र हैं और उनका प्रबंधन भी हिंदू समाज की भागीदारी, परंपरा और उत्तरदायित्व से होना चाहिए।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jul 12, 2026, 06:36 pm IST
inसम्पादकीय
अयोध्या में आस्था का सागर (फाइल चित्र)

अयोध्या में आस्था का सागर (फाइल चित्र)

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की कथित गड़बड़ी केवल धन की हानि या प्रबंधन की चूक का विषय नहीं है। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था, विश्वास, धार्मिक अधिकार और सामाजिक स्वायत्तता से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए इस मामले को हल्के में लेना भी गलत होगा और जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति, संस्था या पूरे आंदोलन को दोषी घोषित कर देना भी अन्याय होगा। यदि गड़बड़ी हुई है तो दोषी बचने नहीं चाहिए। जांच हो, धन की वसूली हो, प्रक्रिया सुधरे और जिम्मेदारी तय हो। लेकिन व्यक्ति के अपराध या व्यवस्था की कमजोरी को संघ, भाजपा, विहिप, राम मंदिर आंदोलन या समूचे हिंदू समाज की नीयत पर हमला बनाने की कोशिश तर्क नहीं, राजनीतिक अवसरवाद है।

अब तक सामने आए तथ्यों से यह स्पष्ट है कि दान संग्रह और गिनती की प्रक्रिया में गंभीर कमियां रहीं। दानपात्रों की निगरानी, राशि की गिनती, रिकॉर्डिंग और जमा करने की व्यवस्था में यदि ढील थी तो यह अपने आप में बड़ा प्रश्न है। भक्त का चढ़ावा केवल नकद राशि नहीं होता। वह श्रद्धा का प्रतीक होता है। इसलिए मंदिर प्रशासन पर यह दायित्व और भी अधिक है कि प्रत्येक रुपए, प्रत्येक आभूषण और प्रत्येक दान का पारदर्शी हिसाब रहे। इस दृष्टि से जांच का स्वागत होना चाहिए, क्योंकि जांच से ही दूध का दूध और पानी का पानी होगा।
लेकिन इसी बिंदु पर सावधानी भी जरूरी है। जांच का अर्थ सत्य की खोज है, निष्कर्ष थोपना नहीं। जब मीडिया या राजनीति जांच से पहले ही चेहरों को अपराधी की तरह प्रस्तुत करने लगती है, जब कथित दोष को पूरे हिंदू समाज की अक्षमता का प्रमाण बनाया जाने लगता है, तब प्रश्न उठता है कि उद्देश्य सुधार है या प्रहार। लोकतंत्र में मीडिया का काम सवाल पूछना है, अदालत बन जाना नहीं। राजनीति का काम जवाबदेही मांगना है, आस्था को हथियार बनाना नहीं। जिन मामलों में मीडिया ट्रायल की आलोचना की जाती रही है, वही जल्दबाजी श्रीराम मंदिर के संदर्भ में उचित कैसे हो सकती है।

यह भी आश्चर्यजनक है कि श्रीराम और मंदिर के नाम पर सबसे अधिक आहत होने की मुद्रा कई बार वही लोग बनाते दिखते हैं जो लंबे समय तक आस्था को पाखंड, श्रीराम को कल्पना और श्रीराम मंदिर को केवल राजनीति बताते रहे। यदि उनका उद्देश्य सचमुच पारदर्शिता है तो उसका स्वागत है। लेकिन यदि संवेदना की आड़ में श्रीराम मंदिर की नैतिक प्रतिष्ठा पर हमला करना, हिंदू समाज में अविश्वास फैलाना और मंदिरों की सामाजिक व्यवस्था को बदनाम करना लक्ष्य है तो समाज को सावधान रहना होगा। दोषी को बचाना गलत है, पर दोषी की आड़ में धर्म को दोषी बना देना उससे भी अधिक गलत है।

इस पूरे शोर में एक और बड़ा मुद्दा दबने का खतरा है। वह है मंदिरों के स्वामित्व और प्रबंधन का प्रश्न। क्या मंदिर सरकार चलाएगी या मंदिर हिंदू समाज के होंगे! गड़बड़ी की आड़ में यदि यह तर्क खड़ा किया जाता है कि सरकार ही मंदिरों का बेहतर प्रबंधन कर सकती है तो यह तर्क अधूरा भी है और खतरनाक भी। मंदिर केवल संपत्ति नहीं होते। वे पूजा-पद्धति, परंपरा, सेवा, दान, स्थानीय रीति और समुदाय की जीवित स्मृति के केंद्र होते हैं। उनका प्रबंधन केवल प्रशासनिक कौशल से नहीं, आस्था की समझ और समाज की भागीदारी से चलता है।

भारत को सेकुलर राज्य कहा जाता है। इसका अर्थ यह होना चाहिए कि सरकार सभी आस्थाओं से समान दूरी रखे और किसी भी धार्मिक समुदाय की आंतरिक व्यवस्था पर अनावश्यक कब्जा न करे। पर व्यवहार में हिंदू मंदिरों के मामले में स्थिति अलग दिखाई देती है। अनेक राज्यों में सरकारें मंदिरों की संपत्ति, चढ़ावे और प्रशासन पर नियंत्रण रखती हैं, जबकि अन्य आस्थाओं की संस्थाओं को छूने में वही सरकारें अत्यधिक सावधानी दिखाती हैं। यह असंतुलन सामाजिक द्वंद पैदा करता है। यदि राज्य सचमुच सेकुलर है तो वह हिंदू मंदिरों का स्थायी प्रबंधक कैसे हो सकता है!

सरकारी नियंत्रण को निष्ठा की गारंटी मानना भी तथ्यपूर्ण दृष्टि नहीं है। सरकारी या अर्ध-सरकारी ढांचे वाले मंदिरों में भी विवाद और अनियमितताओं के उदाहरण सामने आए हैं। सबरीमाला मंदिर से जुड़े सोने के विवाद ने यह दिखाया कि बोर्ड आधारित व्यवस्था में भी अभिलेख, निगरानी और जवाबदेही की गंभीर कमी हो सकती है। पद्मनाभस्वामी मंदिर के खजाने और प्रशासन को लेकर लंबे समय तक न्यायालयों में विवाद चला। तिरुपति जैसे बड़े संस्थागत ढांचे में भी प्रसाद और आपूर्ति श्रृंखला को लेकर गंभीर प्रश्न उठे। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि समाधान सरकारी कब्जा नहीं, बल्कि पारदर्शी और उत्तरदायी प्रबंधन है।

दूसरी ओर समाज आधारित धार्मिक ट्रस्टों के अनेक सफल उदाहरण भी हैं। स्वामीनारायण परंपरा और बीएपीएस जैसे संगठनों ने मंदिरों, शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और सांस्कृतिक कार्यों का प्रभावी संचालन किया है। दिल्ली का झंडेवाला देवी मंदिर जैसे अनेक मंदिर भी भक्त समाज की भागीदारी, व्यवस्था, उत्सव प्रबंधन और सेवा गतिविधियों के उदाहरण हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि हिंदू समाज अपने मंदिरों को सुव्यवस्थित, पारदर्शी और सेवा केंद्रित ढंग से चला सकता है, बशर्ते व्यवस्था में उत्तरदायित्व और निगरानी हो।चढ़ावा चाेरी प्रकरण का सही समाधान भी यही है। दानपात्रों को बंद करने और खोलने की सही प्रक्रिया बनाई जाय। हर चरण की वीडियोग्राफी हो। डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाए। बैंकिंग आधारित जमा व्यवस्था हो। स्वतंत्र ऑडिट और नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग हो। आभूषण, नकद और विशेष दान का अलग लेखा हो। पदाधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय हो। दोषी पाए जाने पर कठोर आपराधिक कार्रवाई हो। लेकिन यह सब हिंदू समाज की भागीदारी और धार्मिक रीति-नीति के भीतर हो, सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के नाम पर नहीं।

अंततः बात सीधी है। आस्था पर चोट हुई है तो पीड़ा स्वाभाविक है। व्यवस्था में चूक हुई है तो सुधार अनिवार्य है। अपराध हुआ है तो दंड आवश्यक है। पर नीयत में खोट सिद्ध करने से पहले प्रमाण चाहिए। मंदिर हिंदू समाज की आस्था के केंद्र हैं और उनका प्रबंधन भी हिंदू समाज की भागीदारी, परंपरा और उत्तरदायित्व से होना चाहिए। सरकार का काम कानून लागू करना और अपराध रोकना है, आस्था का स्वामित्व लेना नहीं। श्रीराम का मार्ग सत्य, न्याय, संयम और मर्यादा का मार्ग है। इसी मार्ग पर चलते हुए दोषियों को दंड और आस्था को सम्मान, दोनों साथ-साथ सुनिश्चित होने चाहिए।

X@hiteshshankar

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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