पाञ्चजन्य सागर मंथन संवाद 4.0: विचारों के क्रियान्वयन के लिए सत्ता है आवश्यक- भाजपा संगठन महामंत्री बीएल संतोष
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पाञ्चजन्य सागर मंथन संवाद 4.0: विचारों के क्रियान्वयन के लिए सत्ता है आवश्यक- भाजपा संगठन महामंत्री बीएल संतोष

भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने पाञ्चजन्य के हितेश शंकर से कहा- सत्ता आर्टिकल 370 हटाने जैसी उपलब्धियां लाती है, बिना सत्ता केवल प्रदर्शन संभव। पिछले 12 सालों में मोदी जी ने विकास के साथ औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिलाई।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Dec 24, 2025, 03:27 pm IST
in गोवा
Panchjanya Sagara manthan samvad 4.0 BL Santosh

सागर मंथन संवाद में अपने विचार रखते भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष

पाञ्चजन्य के सागर मंथन संवाद 4.0 में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष के साथ विभिन्न विषयों पर बातचीत की।

भाजपा विरोधियों को अपने फैंसलों से चौंकाती रही है, लेकिन क्या अब खुद को भी चौंका रही है।

चौंकाने वाली कोई बात नहीं है। हर जगह ऐसा ही होता है और जब निर्णय होता है तो सभी को पता चलता है। इस मौके पर बीएल संतोष जी ने कहा कि सत्ता विचारों को लागू करने का मार्ग है। विचारों का क्रियान्वयन करने के लिए सत्ता साधन मात्र है।

पार्टी के संविधान के अनुसार तो अध्यक्ष का चुनाव और उसकी खोज काफी पहले शुरू कर देना चाहिए था

लोकतंत्र में चुनाव एक महत्वपूर्ण विषय है। नड्डा जी का कार्यकाल पूरा हुआ, तो उसके तुरंत बाद हम मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में लग गए। जैसे ही वो समाप्त हुआ तो लोकसभा चुनाव में लग गए। इसलिए हमने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर अध्यक्ष के चुनाव के लिए वक्त मांगा। अब जब वक्त मिला तो अध्यक्ष का चुनाव हो गया।

भाजपा में लोकतांत्रिक तरीके से फैसले लिए जाते हैं, लेकिन जब ऊपर से नीचे की ओर निर्णय आते हैं तो क्या आंतरिक असहमति के लिए जगह होती है?

आंतरिक असहमति के लिए पार्टी में पूर्ण स्वतंत्रता होती है। कोई भी फैसला कई स्तरों पर लिया जाता है।

आरएसएस और भाजपा का संबंध कैसा है? कुछ लोग इसे प्रेरणा का स्त्रोत मानते हैं और कुछ लोग इसे नियंत्रण मानते हैं? ऐसे में आरएसएस कैसे प्रेरणा का स्त्रोत है और उसकी सीमा क्या है? पार्टी के निर्णय की स्वतंत्र राजनीतिक प्रक्रिया कैसे तय होती है?

प्रेरणा असीम है। राष्ट्रवाद की जो सीमा है अनुशासन, संस्कार, मूल्योदय में असीम प्रेरणा है। संगठन को चलाने में हमें पूरी आजादी है।

संगठन और सत्ता के नैतिक द्वंद को आप कैसे देखते हैं? संगठन सत्ता प्राप्त करने का विकल्प है या सत्ता संगठन के वैचारिक विस्तार का साधन है? 

एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर सत्ता प्राप्त करना आवश्यक है। क्योंकि अगर आप सत्ता नहीं प्राप्त करेंगे तो आर्टिकल 370 को छू भी नहीं सकते हैं। विचारों का क्रियान्वयन करने के लिए सत्ता हासिल करना आवश्यक है। क्योंकि सत्ता होगी, तो ही आप उद्देश्यों को लागू कर पाएंगे। अन्यथा बिना सत्ता के आप केवल प्रदर्शन ही कर सकते हैं। लेकिन, ये स्पष्ट होना चाहिए कि सत्ता केवल भोगने के लिए नहीं है। पिछले 12 साल से प्रधानमंत्री मोदी जी ने विकास के साथ ही औपनिवेशिक मानसिकता से आजादी दिलाने के लिए काम किया है। रही बात चुनाव की तो चुनाव जीतने के लिए इन सभी विषयों की आवश्यकता नहीं है।

इसलिए सत्ता हमारे विचारों को आगे बढ़ाने का एक मार्ग है। हम जहां भी सत्ता में आए हैं, वहां हमने इसे भी लागू किया है।

संघ और पार्टी के बीच समन्वय को देखें तो क्या कभी ऐसा मौका आया है, जहां पार्टी की राजनीतिक जरूरत अलग है और संगठन की विचारधारा अलग है?

नदियों की बात करें तो कभी-कभी किसी न किसी कारण से वो अपने मार्ग से दो भागों में बंट जाती है, लेकिन अंतत: वो एक ही हो जाती है। ऐसे ही सत्ता, संगठन या समाज को सीधी रेखा में चलने वाली यात्रा नहीं है। ये एक प्रकार का नौवहन है और जब आप हवा में नौवहन करते हैं तो कभी कभी ज्वार भाटा के कारण रास्ते भी बदलते हैं। चुनौतियों के कारण रास्ते भी बदलते हैं, लेकिन अंत में वो एक ही जगह पहुंचता है।

भाजपा की चुनावी सफलता को अक्सर बूथ मैनेजमेंट से जोड़कर देखा जाता है। ऐसा कौन सा संगठनात्मक प्रयोग हुआ और उसमें असफल होकर एक सबक सीखा कि इस तरह से पार्टी नहीं चलेगी?

हम छोटे-छोटे करेक्शन के साथ आगे बढ़ते हैं। बिहार चुनाव के बाद भी जब हम कार्यकर्ता बैठे तो उसमें कुछ 7 बिन्दुओं को हमने ऑब्सलेट करने का फैसला किया। जैसे डिजिटल मीडिया के आने के बाद एब एसएमएस का कोई महत्व नहीं रह गया है और इसलिए हमने इसे बंद करने का सोचा है। मैं किसी भी चीज को असफलता नहीं मानता।

विपक्ष का आरोप है कि भाजपा में सब कुछ केंद्रीकृत है। ऐसे में संगठन के अंदर कई बार असहमति भी होती होगी, तो उससे कैसे निपटते हैं?

पहली बात तो ये कि यहां केंद्रीकरण है ही नहीं तो इसके कारण असहमति को संभालने की जरूरत ही नहीं होती। पार्टी के अंदर हमारा बहुत ही लोकतांत्रिक तरीका है काम करने का। देशभर में हमारे 16,000 मंडल हैं। हमने एक नियम बनाया है कि हम लोग उसे ही मंडल अध्यक्ष चुनेंगे, जो कि 45 साल से कम का होगा। अब इन 16,000 लोगों का फैसला दिल्ली नहीं करती है। इसलिए हम केंद्रीकृत नहीं हैं।

संगठन और व्यक्ति केंद्रित राजनीति को आप संगठन मंत्री के तौर पर कैसे देखते हैं?

जिस प्रकार से बीते 75 सालों में कांग्रेस और क्षेत्रीय राजनीति में आए हैं, उसमें व्यक्ति केंद्रित राजनीति एक प्रथा बन गई है। ऐसे में उससे जुड़कर ऊपर आने वाले उसे विचारों के होते हैं। ऐसे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि यहां ऐसा नहीं होता। क्योंकि स्कूल तो वही है, सिलेबस वही होता है। लेकिन, हमारे संगठन में आने के बाद 90 फीसदी बदल जाते हैं। यहां कोई लीडर सेंट्रिक नहीं है। कई बार वेकेंया नायडू जी बोलते थे कि प्रेसिडेंट प्रिसाइड्स, पार्टी डिसाइड। यही कारण है कि हम आगे बढ़ रहे हैं।

अगर प्रेरणा या भय के कारण कार्यकर्ता चुप रह जाते हैं तो उस चुनौती से कैसे निपटते हैं?

संगठन के उच्च कार्यकर्ताओं का ये दायित्व होता है कि वो अपने से नीचे के कार्यकर्ताओं की बात सुने। इस मामले में हम बहुत ही सफल हैं? हालांकि, मैं ऐसा नहीं कह सकता कि हमारे संगठन में वो जो चाहे वही हो। हालांकि, सभी की बात यहां सुनी जाती है और कोशिश होती है कि संगठन में सभी की बातों को सुना जाए। पिछले 10-15 सालों में हमारे संगठन का विस्तार काफी हो गया है। और इस कारण बहुत से लोगों से हम बात नहीं कर पाते हैं, लेकिन हम इसे पूरी तरह करने की कोशिश करते हैं।

विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं को आगे रखकर भाजपा पर हमले करती है कि भाजपा चुनाव आयोग को नष्ट कर देगी। आप इन आरोपों को कैसे देखते हैं?

समाज में इति और मिति नाम के दो शब्द हैं। इसका अर्थ है ऊंचा और नीचा। दुख के साथ ये कहना पड़ रहा है कि विपक्ष आज बहुत ही गिर गया है। हालत ये है कि केवल ओम बिरला की ही आलोचना करना है। बल्कि, विपक्ष तो यहां तक गिर गया है कि वो तो मेरिट में चुनी गई उनकी बेटी तक की बुराई कर रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी को टार्गेट किया गया। आज जिस तरह से संवैधानिक संस्थाओं को चोट पहुंचाने का घृणित कार्य विपक्ष कर रहा है वो संविधान और समाज के लिए सही नहीं है। वे संवैधानिक संस्थाओं को बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वो इसमें कामयाब नहीं होंगे। ये अस्थिरता लाने की कोशिश है।

अगर कहीं कोई चूक होती है को संगठन उन गलतियों से कैसे सबक लेता है?

अगर कहीं कोई समस्या होती है तो उससे निपटने के लिए एक डेकोरम है। जिस प्रकार से घर पर कोई बात होती है तो उसे रोड पर नहीं लाते हैं तो उसी प्रकार से हमारा जो मामला है, उसे हम घर के अंदर ही निपटाते हैं। हमारे यहां हर स्तर पर मुक्तता के साथ करते हैं।

आज भाजपा जिस स्थिति में है और 20 वर्ष के बाद भाजपा को आप कैसे देखते हैं?

आदेशों, अनुशासन का पालन करना ये हर संगठन का हिस्सा होता है। हमारी यात्रा कोई सीधी रेखा नहीं है, बल्कि ये नौवहन जैसा है। सूचना का पालन करना आवश्यक है, लेकिन उससे पहले विवेक का पालन करना होता है। कितनी सूचना देनी है औऱ कितनी नहीं देनी है ये भी विवेक का सवाल है। हमारे संगठन में ये दोनों ही चीजें हैं और इसलिए हमारा संगठन जिंदा है। आज से 20 साल के बाद हमारा संगठन और बढ़ेगा और विस्तार करेगा। अभी भी वैचिरक रूप से चार प्रदेश केरल, तमिलनाडु, बंगाल और पंजाब है। हमारे पास 1800 विधायक हैं, तो हम सोच रहे हैं कि 1500 में हम क्यों हारे हैं।

 

 

 

Topics: Article 370Modi ji 12 yearsआर्टिकल 370BJP ideological expansionसत्ता विचारों का साधनSagar Manthan Dialogue 4.0बीएल संतोष संवादBJPपाञ्चजन्य एक्सक्लूसिवRSSमोदी जी 12 सालभाजपा वैचारिक विस्तारसागर मंथन संवाद 4.0Power as a means of ideasभाजपाBL Santosh dialogueआरएसएसPanchjanya Exclusive
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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