दंतेश्वरी छत्तीसगढ़ : सबका मान हो समान
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दंतेश्वरी डायलॉग: सबका मान हो समान

सामाजिक समरसता सत्र में कथावाचक आचार्य पं. युवराज पांडेय ने अपने विचार रखे। उसे यहां लेख के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 9, 2025, 12:11 pm IST
inविश्लेषण, धर्म-संस्कृति, छत्तीसगढ़, पाञ्चजन्य इवेंट
आचार्य पं. युवराज पांडेय

आचार्य पं. युवराज पांडेय

समरसता कोई विषय नहीं, यह जीवन है। हमें जीवन को जीना है। समरसता का अर्थ है कि मेरे साथ बैठने वाला व्यक्ति अपने बारे में ‘मैं छोटा हूं’ ऐसा महसूस न करे। बड़ा कौन है? यदि इस प्रश्न का सीधा उत्तर दें तो बड़ा वह है जिसके साथ बैठने वाला कोई भी व्यक्ति अपने आप को छोटा न समझे। धर्म और अध्यात्म में हमारे सभी शास्त्र, पुराण, महर्षि वेदव्यास जी द्वारा रचित ग्रंथ और भगवान के अवतार- चाहे राम हों या कृष्ण-सभी ने समरसता का ही संदेश दिया है। रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं, ‘भगवान कहते हैं- ‘सब मम प्रिय’ अर्थात् भगवान सबको समान प्रेम देते हैं, चाहे वनांचल में रहने वाली जनजाति हो, ब्राह्मण हों, ऋ षि हों, क्षत्रिय या राजा।

समरसता और राम

राम जी का जन्म केवल रावण-वध के उद्देश्य से नहीं हुआ था। उनके जन्म के अनेक कारण थे-राम जन्म के हेतु अनेका। परम विचित्र एक ते एका। वनवास काल में भगवान ने सबसे पहले ऋ षि भारद्वाज से भेंट की, फिर वाल्मीकि जी के चरणवंदन किए। बाद में जब वे श्रृंगवेरपुर में निषादराज से मिले तो उन्हें ‘मित्र’ बनाया। निषादराज को भगवान ने अपने समकक्ष स्थान दिया। रामजी के छोटे भाई भरत ने भी निषादराज को ‘बड़े भैया’ कहकर सम्मान दिया। वनांचल में रहने वाले कोल-भीलों के साथ भी भगवान ने समय बिताया, उनके यहां कंद-मूल-फल खाए, माता शबरी के झूठे बेर स्वीकार किए। इससे बड़ा समरसता का उदाहरण क्या होगा! कृष्ण जी ने सुदामा के चरणों में झुककर उन्हें सम्मान दिया। वृंदावन में ग्वाल बालों के साथ 11.5 वर्ष तक रहे, अनेक लीलाएं कीं। यह दिखाता है कि भगवान का प्रेम सबके लिए समान था।

समरसता और श्री जगन्नाथ

कलयुग के प्रत्यक्ष भगवान श्री जगन्नाथ समरसता के जीवंत स्वरूप हैं। जगन्नाथ पुरी आने से पहले वे नयागढ़ के कंठिलो में ब्रह्मगिरि पर्वत पर नील माधव रूप में निवास करते थे। भगवान जगन्नाथ ने सबसे पहले पूजा किसी ब्राह्मण से नहीं, बल्कि वनांचल में रहने वाले विश्वावसु साबर के हाथ से प्राप्त की। विश्वावसु द्वारा दिए गए कंद-मूल-फल भगवान ने ग्रहण किए। इसी कारण उन्हें पहले ‘साबरनाथ’ कहा गया, बाद में ‘जगन्नाथ’। जगन्नाथ पुरी के श्रीमंदिर में आज भी कोई जाति-भेद नहीं है। सभी लोग एक पटरी पर बैठकर भोजन करते हैं। जहां तक मैं प्रवेश कर सकता हूं, वहां तक सभी वर्णों के लोग प्रवेश कर सकते हैं। यह समरसता की सबसे बड़ी मिसाल है।

परमपिता परमेश्वर एक ही हैं। जैसे मैं एक हूं लेकिन सभी लोग मुझे अलग-अलग कोण से देखते हैं। उसी प्रकार परमात्मा एक हैं, नाम अनेक हैं। जगन्नाथ जी के भक्ति-पथ में समरसता अनिवार्य है, क्योंकि वे ‘समरसता के मूर्त रूप’ हैं। मार्गशीर्ष माह में महालक्ष्मी जी की विशेष पूजा की जाती है। महालक्ष्मी जी के अपमान के कारण वे श्रीमंदिर से बाहर चली गई थीं। 12 वर्ष तक भगवान जगन्नाथ दर-दर भटकते रहे। अंत में जब महालक्ष्मी जी ने शर्त रखी कि श्री मंदिर में किसी भी प्रकार का छुआछूत या जातिभेद नहीं रहेगा, तब भगवान उन्हें सम्मानपूर्वक श्रीमंदिर वापस लाए। तब से मंदिर में सभी के लिए समान व्यवस्था है।

जीवन को बनाएं समरस

समरसता स्थापित करने के लिए सबसे पहले स्वयं को दृढ़ संकल्प लेना पड़ता है। समरसता को बोलना नहीं, उसे जीना है। जब हम समरसता को व्यवहार में लाते हैं तो लोग हमें देखकर सीखते हैं- परिवार, गांव, जिला, राज्य और देश- सब इसका अनुकरण करते हैं। ‘मैं अकेला अखंड भारत का निर्माण करूंगा’- यह सोचकर अखंड भारत नहीं बनेगा। पहले स्वयं में समरसता का भाव लाना पड़ेगा। सोशल मीडिया या कैमरे के सामने समरसता की बातें कहना एक बात है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसे जीना सबसे महत्वपूर्ण है।
सबसे बड़ा धर्म—इंसानियत और प्रेम
सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है। किसी के दुख को देखकर हमारे भीतर दुख होना चाहिए और किसी के सुख को देखकर खुशी। यदि कोई 400 रुपए की कमीज पहनता है तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि उसकी कमीज मैं फाड़ दूं, बल्कि सोचना चाहिए कि ‘ऐसा क्या करूं कि मैं 800 रुपए की कमीज पहन सकूं।’ किसी का नुकसान नहीं करना है-कर्मप्रधान विश्व में सभी का विकास होना चाहिए।

 

समग्र और बहुआयामी संवाद

‘पाञ्चजन्य’ का यह आयोजन विशेष था, क्योंकि यह छत्तीसगढ़ के गठन की रजत जयंती है। यह अटल जी का शताब्दी वर्ष भी है, जिन्होंने इस राज्य की नींव रखी थी। वे ‘पाञ्चजन्य’ के प्रथम संपादक भी थे। ‘पाञ्चजन्य’ के संपादक हितेश शंकर ने कार्यक्रम की प्रस्तावना में नया रायपुर के अटल नगर में ‘पाञ्चजन्य’ की वैचारिक परंपरा का स्मरण करते हुए इसके प्रथम संपादक अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की जिजीविषा और संकल्प को चित्रित किया-

हार नहीं मानूंगा,
रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं।
गीत नया गाता हूं।

उन्होंने कहा कि ‘दंतेश्वरी डायलॉग’ इसलिए एक समग्र और बहुआयामी संवाद है, क्योंकि यह केवल एक विषय तक सीमित न रहकर छत्तीसगढ़ की संपूर्ण यात्रा-अतीत, वर्तमान और भविष्य-को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर समझने का प्रयास है।

यह आयोजन छत्तीसगढ़ के विकास, नक्सल चुनौती, सुरक्षा रणनीतियों, जनजातीय समाज की भूमिका, संस्कृति-परंपरा, सामाजिक समरसता और भविष्य की तकनीकी औद्योगिक संभावनाओं के परस्पर संबद्ध विमर्श की कड़ियां जोड़ने का उपक्रम है। ‘दंतेश्वरी डायलॉग’ की पृष्ठभूमि में यह विचार है कि यह मंच शोधकर्ताओं और नीति-निर्धारकों को प्रशासन, समाज, संस्कृति और विचार, इन सभी आयामों को जोड़ते हुए राज्य की परिवर्तन यात्रा को व्यापक दृष्टि से समझने का अवसर देगा।

राष्ट्रीय सुरक्षा चिंतन का केंद्र बना छत्तीसगढ़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

छत्तीसगढ़ के नया रायपुर में 29 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 60वें अखिल भारतीय डीजीपी-आईजीपी सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में गृह मंत्री अमित शाह भी थे। सम्मेलन का उद्देश्य देश की आंतरिक सुरक्षा प्रणाली को ‘विकसित भारत, सुरक्षित भारत’ की व्यापक दृष्टि के अनुरूप नए सिरे से तैयार करना था। इस आंतरिक सुरक्षा बैठक में फॉरेंसिक तकनीक, कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

प्रधानमंत्री मोदी ने सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के डीजीपी और आईजी से नवाचारी पुलिसिंग तरीकों, बेहतर समन्वय तथा नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ड्रग्स के गलत इस्तेमाल से निपटने के लिए सरकार का नजरिया जरूरी है, जिसमें कानून लागू करना, पुनर्वास और सामुदायिक स्तर पर दखल शामिल हो।

पुलिस के प्रति लोगों, खासकर युवाओं की सोच बदलने के लिए पेशेवर अंदाज, संवेदनशीलता, जवाबदेही बढ़ाने, शहरी व पर्यटक पुलिसिंग मजबूत करना होगा। उन्होंने प्रतिबंधित किए गए संगठनों की निगरानी, लाल आतंक से मुक्त इलाकों के विकास और तटीय सुरक्षा के लिए नए मॉडल अपनाने पर जोर दिया और राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस बल से खाली द्वीपों को जोड़ने के लिए नई रणनीति अपनाने के अलावा नए कानूनों को लेकर लोगों में जागरुकता बढ़ाने की अपील की।

सम्मेलन में विजन 2047 के तहत पुलिसिंग के दीर्घकालिक रोडमैप, आतंकवाद और मजहबी कट्टरता रोकने के नए तरीके, महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए तकनीक का उपयोग, विदेश में छिपे भारतीय भगोड़ों को वापस लाने, अपराध की असरदार जांच-पड़ताल एवं मुकदमे मजबूत बनाने के लिए फॉरेंसिक कौशल बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के डीजीपी अरुण देव गौतम ने ‘बस्तर 2.0’ प्रस्तुति दी, जो मार्च 2026 तक नक्सलवाद की समाप्ति के लक्ष्य के बाद बस्तर क्षेत्र के विकास का रोडमैप है। इसमें नक्सलवाद से मुक्ति के बाद सुरक्षा उपलब्धियों को स्थिर रखना, वनवासी क्षेत्रों में सड़क तथा बुनियादी ढांचा विस्तार, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसी सरकारी योजनाएं सुनिश्चित करने के साथ स्थानीय शासन एवं जनभागीदारी को प्रोत्साहन देने जैसे विषय शामिल थे।

सेवा में वाग लगाए हो मां…

सेवा में वाग लगाए लगाए हो मईया
सेवा में वाग लगाए लगाए हो मां
हस के उठे विहस के माता
जा चंदन पर ठाड़ भवानी
निंबु जटा जटा पर नरियर
आस पास नरियर के वारी
झोपा झोपा करे सुपारी
केकली केवड़ा सदा न सरवर
देखल हंस विराजे
हंस मां दाई के पहुना साजे
पहुना उपर दाई विराजे
दाई के संग मां भैरव साजे
भैरव संग लंगुर विराजे
अन्नस फन्नस कुंज निवोर
धर्म ध्वजा लगाए
लहराए हो मईया
सेवा में वाग लगाए हो मां…

Topics: रजत जयंती(Jhoothe Ber) माता शबरीदंतेश्वरी डायलॉगनक्सल चुनौतीसामाजिक/मानसिक सद्भावआचार्य पं. युवराज पांडेयवनांचल (Vananchal)समरसताजनजाति (Janjati)जगन्नाथ मंदिरआदिवासी समूहभगवान राम और कृष्णदेवदूतपाञ्चजन्य विशेषईश्वर का धरतीभगवान जगन्नाथनिष्पादराज (Nishadraj)जूठे बेर
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