‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाए’, पाकिस्तान के साथ भी ऐसा ही है। वह पीओजेके में लोगों पर अत्याचार कर रहा है। वहां के लोग पाकिस्तान के अत्याचारों से मुक्ति मांग रहे हैं। बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में विद्रोह की लहर तेज हो गई है। इससे कई इलाकों में सरकार और सेना का कंट्रोल कमजोर पड़ गया है।
बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी का असर
बलूचिस्तान पाकिस्तान का करीब 45 फीसदी हिस्सा है। यहां बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और दूसरे विद्रोही गुटों ने सूबे के लगभग 70 फीसदी हिस्से पर अपना कब्जा जमा लिया है। क्वेटा, खुजदार और मस्तुंग जैसे शहरों में बीएलए के हथियारबंद लोग खुलेआम घूमते दिखते हैं। वे पुलिस थानों पर हमले करते हैं और सड़कों पर नाके लगाकर गाड़ियों से पैसे वसूलते हैं। यह पैसे उनके फंड के लिए इस्तेमाल होते हैं।
स्थानीय लोगों में चीन और अमेरिका के दखल को लेकर गुस्सा है। ग्वादर पोर्ट पर चीन का करीब तीन लाख करोड़ रुपये का निवेश है। बड़ी चीनी बोट्स के आने से स्थानीय मछुआरे बेकार हो रहे हैं। सूबे में सोना, तांबा और गैस जैसे खनिज खूब हैं, लेकिन बलूच लोगों का कहना है कि उन्हें अपने ही इलाके में दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जाता है।
बीएलए का गठन 1970 के दशक में हुआ था। पाकिस्तान, ब्रिटेन और अमेरिका इसे आतंकी संगठन मानते हैं। 1947-48 से ही कई बलूच पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे। वे अलग देश की मांग करते रहे हैं। 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत, इराक, अफगानिस्तान और सोवियत संघ पर बीएलए को मदद देने का आरोप लगाया था।
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खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी का दबदबा
अफगानिस्तान की सीमा से लगे खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का काफी प्रभाव है। यहां पाकिस्तानी कानून की बजाय तालिबान का शरिया और कबिलाई लोया जिरगा चलता है। टीटीपी के लगातार हमलों के कारण पाकिस्तानी सेना को डूरंड लाइन पर अपनी 50 फौजी चौकियां खाली करनी पड़ीं। इस साल टीटीपी के 145 से ज्यादा हमलों में कई सैनिक मारे गए। पंजाब और सिंध के कर्मचारी इस इलाके में पोस्टिंग लेने से बचते हैं।
टीटीपी की शुरुआत दिसंबर 2007 में हुई थी। बैतुल्लाह महसूद ने 13 से 40 चरमपंथी कबीलाई गुटों को मिलाकर इसे बनाया था। इसका मकसद पाकिस्तान की सरकार और सेना को हटाकर शरिया कानून लागू करना है। टीटीपी और आईएसकेपी जैसे संगठनों के तालमेल ने सरकारी तंत्र को काफी कमजोर कर दिया है।
पीओके में जनता का गुस्सा
पीओके में करीब 45 लाख लोग रहते हैं। सरकार ने यहां करीब एक लाख फौजी तैनात कर रखे हैं। पूरा इलाका फौजी नियंत्रण में है। सख्त चेकिंग और पाबंदियों के बावजूद स्थानीय लोग पीछे नहीं हट रहे। वे सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। मुख्य वजहें हैं बढ़ती महंगाई, बिजली और आटे की कमी। शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों वाला चुनावी सिस्टम भी विवाद का कारण है। लोग अपने हक के लिए सड़क पर उतरे हुए हैं।
इन तीनों इलाकों में एक साथ उठी इन समस्याओं ने पाकिस्तानी सेना और सरकार को काफी परेशान कर रखा है। सरकार इन आवाजों को संभालने में मुश्किल महसूस कर रही है।

















