हिन्दू बहुल भारत के पड़ोसी जिन्ना के देश पाकिस्तान में मंदिरों और गुरुद्वारों की दुर्दशा हो रही है। यह कहना है कि पाकिस्तान की अल्पसंख्यक कॉकस संसदीय समिति के सामने हाल में पेश की गई एक हैरान करने वाली रिपोर्ट का। इसमें बताया गया है कि जिन्ना के देश में कुल 1,817 हिंदू मंदिरों और सिख गुरुद्वारों में से केवल 37 ही ठीकठाक हैं और उनके देवी—देवता या ग्रंथ साहिब स्थापित हैं। इसमें 1,285 हिंदू मंदिर हैं और 532 गुरुद्वारे। इनमें से अधिकांश इस्लामवादी सरकार की लापरवाही, रखरखाव की कमी अथवा मजहबी जुल्मों, जैसे अपहरण, बलात्कार, हिंसा आदि के कारण जान से गए या पलायन कर गए हिन्दुओं और सिखों की आबादी घटने से जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं।
वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) ने भी अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि 98 प्रतिशत हिंदू मंदिर और गुरुद्वारे इस्लामवादी सरकार की उपेक्षा के शिकार हो चुके हैं, वे या तो वीरान पड़े हैं या मजहबी उन्मादियों के अवैध कब्जे में हैं, जहां कोई हिन्दू—सिख जाने की जुर्रत नहीं कर सकता।

रिपोर्ट में इस तथ्य के विभिन्न स्रोतों से एकत्रित हैरान करने वाले आंकड़े पेश किए गए हैं। रिपोर्ट में लिखा है—कुल मंदिर-गुरुद्वारे: 1,817 (कुछ रिपोर्ट में 1,867 या 1,800 के करीब)। इनमें से कार्यरत/सक्रिय: केवल 37, जहां पूजा-अर्चना की जा रही है। इस संख्या में हिंदू मंदिर 1,285 हैं तो गुरुद्वारे हैं 532.
ये आंकड़े पाकिस्तान के मशहूर अंग्रेजी दैनिक द डॉन और पाकिस्तानी संसदीय समिति की बैठक से प्राप्त किए गए हैं, जो विभाजन के बाद हिन्दू—सिखों के उस देश से पलायन करने से उत्पन्न समस्या को रेखांकित करते हैं।
आखिर खुद को सभी मत—पंथों की चिंता करने वाली बताकर अपनी पींठ थपथपाने वाली वहां की सरकारों ने मंदिरों और गुरुद्वारों के प्रति इतनी लापरवाही क्यों बरती? पता चला है कि इस उदासीनता की मुख्य वजह है इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) द्वारा इन संपत्तियों के रखरखाव में असफल रहना।

ये आंकड़े सामने आने के बाद, हिंदू काउंसिल के पूर्व मंत्री डॉ. रमेश कुमार वंकवानी ने ईटीपीबी की आलोचना की है और कहा है कि उस विभाग की जिम्मेदारी किसी हिन्दू या सिख को सौंपी जाए। इसके अलावा, घटती आबादी, फंड की कमी, अतिक्रमण, तोड़फोड़ और सुरक्षा से जुड़े खतरे भी इस बदहाली के जिम्मेदार हैं। सदियों पुराने ये धार्मिक स्थल ढहने की कगार पर पहुंचा दिए गए हैं।
पाकिस्तान की अल्पसंख्यक कॉकस समिति ने मंदिरों और गुरुद्वारों की तत्काल सुरक्षा व्यवस्था करने और उनके जीर्णोद्धार के कदम उठाने की मांग की है। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल ने नीतिगत सुधारों की मांग की ताकि न्याय और समानता सुनिश्चित हो सके। इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी हस्तक्षेप करने की अपील की गई है। कहा गया है कि यह स्थिति मजहबी कट्टरवाद को और गहरा कर रही है। बेशक, इस रिपोर्ट ने शाहबाज सरकार के उन दावों की पोल खोल दी है कि उनके देश में हर मत—पंथ की चिंता समान रूप से की जाती है।

पाकिस्तान में वर्तमान के अल्पसंख्यकों यानी हिन्दू, सिखों की आबादी 1 करोड़ से कुछ कम है। इनके लिए महज 37 मंदिर, गुरुद्वारे ठीकठाक हालत में हैं जहां पूजा हो पा रही है, जबकि 1,780 से अधिक खंडहर बनाए जा चुके हैं। पिछले दिनों जारी हुई यह रिपोर्ट जिन्ना के देश की पांथिक असहिष्णुता को सीधे तौर पर उजागर करती है। इसमें संदेह नहीं है कि देखभाल की कमी ऐसी ही बनाए रखी गई तो वहां के बचे—खुचे मंदिर और गुरुद्वारे भी देखते देखते ढह जाएंगे।
















