भारत केवल भौगोलिक सीमाओं से निर्मित राष्ट्र नहीं है। यह एक ऐसी सभ्यता है, जिसकी आत्मा उसकी सांस्कृतिक निरंतरता, सामाजिक विविधता, आध्यात्मिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों में निवास करती है। इसलिए भारत की संप्रभुता का अर्थ केवल उसकी सीमाओं की सुरक्षा नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक अस्मिता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता की रक्षा भी है।
सभ्यता का मूल भाव संरक्षित रहे, इसके लिए उन सभी प्रावधानों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जो विविध माध्यमों से भारतीय संस्कृति के मूल आधार पर कहीं न कहीं प्रहार करते हैं। उन विविध माध्यमों में एक विदेशी अंशदान और विदेशी वित्तपोषण की अनियंत्रित व्यवस्था भी है। विदेशी धन यदि पारदर्शी और वैधानिक उद्देश्यों के लिए आता है तो वह सहयोग का माध्यम हो सकता है, लेकिन यदि उसका उपयोग राजनीतिक हस्तक्षेप, सामाजिक अस्थिरता, धार्मिक प्रभाव-विस्तार अथवा भारत की आंतरिक नीतियों को प्रभावित करने के लिए किया जाए, तो यह राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए गंभीर प्रश्न उत्पन्न करता है।
भारत में एनजीओ की भूमिका
आज जब विदेशी फंडिंग के नियमन को लेकर बहस होती है, तब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, यदि कोई व्यवस्था विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकने, वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाने और भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया को बाहरी प्रभाव से सुरक्षित रखने का प्रयास करती है, तो उसका विरोध क्यों किया जाना चाहिए। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण, जनजाति कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अनेक संस्थाएं उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। लेकिन जब इन संस्थाओं की आर्थिक गतिविधियों का संबंध विदेशी स्रोतों से जुड़ता है, तब प्रश्न केवल आर्थिक पारदर्शिता का नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय हित, नीति-निर्माण, सामाजिक स्थिरता और संप्रभुता का भी बन जाता है। प्रस्तावित Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 ने इस बहस को एक नए चरण में पहुंचा दिया है। यह विधेयक 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया और अभी लंबित है। इसका प्रमुख उद्देश्य उन संस्थाओं द्वारा विदेशी अंशदान और उससे निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन की व्यवस्था करना है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, समाप्त हो जाता है या जिनका नवीनीकरण नहीं होता।
क्या विदेशी धन केवल आर्थिक सहायता है?
प्रस्तावित व्यवस्था में ऐसी परिसंपत्तियों के लिए एक नामित प्राधिकारी (Designated Authority) की भूमिका निर्धारित की गई है। इस प्रस्तावित बिल का महत्व एवं इसके समर्थन तथा विरोध का तर्क इसलिए भी है क्योंकि सामान्य नागरिक समाज में यह प्रश्न उठता है कि क्या विदेशी धन केवल आर्थिक सहायता है, या वह कभी-कभी विचारों, प्राथमिकताओं और सामाजिक प्रभाव का माध्यम भी बन सकता है? इसी प्रश्न के उत्तर में FCRA 2026 का व्यापक महत्व छिपा हुआ है।
विदेशी धन पर पारदर्शिता क्यों है जरूरी?
राष्ट्रीय संप्रभुता का सामान्य अर्थ है कि किसी राष्ट्र को अपने आंतरिक और बाहरी मामलों पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार हो। लोकतंत्र में यह अधिकार केवल सरकार तक सीमित नहीं होता, बल्कि जनता, संसद, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज भी इसके महत्वपूर्ण अंग होते हैं। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक देश में विदेशी वित्तीय सहायता को पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता। अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और विदेशी दाता विकास तथा मानवीय कार्यों में योगदान देते हैं। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब विदेशी वित्त पोषण का उपयोग पारदर्शी सामाजिक सेवा के बजाय राजनीतिक प्रभाव, नीतिगत दबाव, सामाजिक विभाजन या किसी विशेष वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया जाए। यही कारण है कि भारत का गृह मंत्रालय FCRA व्यवस्था को इस उद्देश्य से जोड़ता है कि विदेशी योगदान का उपयोग ऐसे कार्यों में न हो जो राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल हों और संस्थाएं एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य के मूल्यों के अनुरूप कार्य करें। 2026 का प्रस्तावित संशोधन विशेष रूप से FCRA पंजीकरण समाप्त होने के बाद विदेशी अंशदान और उससे निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन को स्पष्ट करने का प्रयास करता है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, पंजीकरण रद्द होने, स्वेच्छा से समर्पित किए जाने या नवीनीकरण न होने जैसी स्थितियों में विदेशी योगदान और उससे निर्मित परिसंपत्तियां नामित प्राधिकारी के अधीन आ सकती हैं। कुछ परिस्थितियों में यह अधिग्रहण स्थायी भी हो सकता है। यदि ऐसी परिसंपत्ति किसी पूजा स्थल से संबंधित हो, तो उसके धार्मिक चरित्र को बनाए रखने का प्रावधान भी प्रस्तावित है।
यदि किसी विदेशी वित्त पोषित संस्था द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य या सामाजिक सेवा के माध्यम से सकारात्मक कार्य किए जाते हैं, तो यह लोकतांत्रिक समाज के लिए उपयोगी है। लेकिन यदि किसी संस्था की गतिविधियां किसी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने, सामाजिक संघर्ष को बढ़ाने या किसी बाहरी वैचारिक दृष्टिकोण को स्थापित करने के उद्देश्य से संचालित हों, तो लोकतांत्रिक राज्य को उसकी वैधता और पारदर्शिता की जांच करने का अधिकार होना चाहिए।
जवाबदेही के विरुद्ध क्यों खड़ा है विपक्ष
FCRA का विरोध करने वाले संगठनों और राजनीतिक समूहों से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि वे विदेशी वित्त पोषण की पारदर्शिता और जवाबदेही के विरुद्ध क्यों खड़े हैं। हालांकि, यह कहना कि प्रत्येक विरोधी संगठन विदेशी चंदे के बल पर भारत को अस्थिर करना चाहता है, एक व्यापक आरोप होगा, जिसे प्रमाणित करने के लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं। वास्तविक बहस यह होनी चाहिए कि विदेशी धन प्राप्त करने वाली प्रत्येक संस्था चाहे वह किसी भी वैचारिक धारा से जुड़ी हो अपने वित्तीय स्रोत, दानदाता और धन के उपयोग का पूर्ण विवरण सार्वजनिक करे। राष्ट्रीय संप्रभुता के प्रश्न पर किसी भी संगठन को विशेष छूट नहीं मिलनी चाहिए।
क्या कहते हैं आधिकारिक आंकड़े
गृह मंत्रालय से संबंधित संसदीय जानकारी के अनुसार, 2019 से 2022 के बीच 13,520 संगठनों को कुल ₹55,741 करोड़ का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ। यानी औसतन लगभग ₹18,580 करोड़ प्रतिवर्ष विदेशी योगदान भारत में आया। 15 जुलाई 2026 के आसपास उपलब्ध FCRA पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, 14,449 सक्रिय FCRA प्रमाणपत्र, 22,498 रद्द प्रमाणपत्र और 15,212 ऐसे प्रमाणपत्र जो समाप्त माने गए, दर्ज थे। इसका अर्थ है कि FCRA व्यवस्था के दायरे में आने वाली संस्थाओं की संख्या और उनके माध्यम से संचालित वित्तीय गतिविधियां व्यापक हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना होगा कि हर विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्था राष्ट्रविरोधी नहीं होती और हर FCRA कार्रवाई को विदेशी प्रभाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन जब हजारों करोड़ रुपये की विदेशी राशि भारत में आती है, तो पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हित की निगरानी लोकतांत्रिक शासन की स्वाभाविक आवश्यकता बन जाती है फिर उसका विरोध क्यों हो रहा है l
विदेशी वित्तपोषण यदि किसी वैध सामाजिक सेवा में लगता है तो वह स्वागत योग्य है, यदि वही धन सामाजिक विभाजन, सांस्कृतिक संघर्ष या पहचान-आधारित ध्रुवीकरण को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल हो, तो सरकार की निगरानी आवश्यक हो जाती है। जैसा कि बहुत से संगठन इस धनराशि के माध्यम से कन्वर्जन का कार्य करते हैं। प्रस्तावित विधेयक का एक विशेष पहलू धार्मिक स्थलों से जुड़ा है। यदि विदेशी योगदान से निर्मित ऐसी परिसंपत्ति किसी पूजा स्थल के रूप में हैं और वह नामित प्राधिकारी के अधीन आती है, तो प्रस्तावित व्यवस्था उसके धार्मिक चरित्र को बनाए रखने की बात करती है। यह प्रावधान महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका उद्देश्य परिसंपत्ति के प्रशासनिक नियंत्रण और उसके धार्मिक चरित्र के बीच संतुलन बनाए रखना है।
जांच के दायरे में कई अंतरराष्ट्रीय एनजीओ
पिछले वर्षों में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन जांच के दायरे में आए। ‘ग्रीनपीस इंडिया’ पर यह आरोप लगा कि उसने विदेशी निधि के माध्यम से भारत की विकास परियोजनाओं के खिलाफ अभियान चलाए, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा। इसी प्रकार, ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ को वित्तीय अनियमितताओं के कारण अपने संचालन को सीमित करना पड़ा। नीतिगत संस्थानों में ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ और ‘ऑक्सफैम इंडिया’ जैसे अनेक संगठनों पर अब तक कार्रवाई हुई, जहां विदेशी निधि के उपयोग को लेकर सवाल उठे हैं। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और उससे जुड़े रिहैब इंडिया फाउंडेशन पर कट्टरपंथ और विदेशी निधि के दुरुपयोग के आरोप सिद्ध हुए। वहीं इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन, जिसकी स्थापना जाकिर नाइक ने की थी, पर वैचारिक कट्टरता फैलाने के आरोप सामने आते रहे हैं। 2020 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 13 बड़े ईसाई मिशनरी संगठनों को विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम के तहत मिली चंदा लेने की अनुमति रद कर दी। इनमें से अधिकतर संगठन झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तर पूर्व के राज्यों में सक्रिय थे और इन पर आरोप है कि ये विदेशी चंदे का दुरुपयोग कन्वर्जन में कर रहे थे। FCRA Amendment Rules में सरकार ने धार्मिक गतिविधियों के संबंध में अधिक स्पष्टता लाने की बात कही है। सरकार के अनुसार धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों के रखरखाव और विभिन्न समुदायों की वैध धार्मिक/कल्याणकारी गतिविधियां विदेशी धन प्राप्त कर सकती हैं, लेकिन proselytisation यानी धर्म-परिवर्तन के उद्देश्य से की जाने वाली गतिविधियों को अनुमत धार्मिक गतिविधियों से बाहर रखा गया है।
राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से मिला पैसा
कांग्रेस से जुड़े राजीव गांधी फाउंडेशन का FCRA पंजीकरण गृह मंत्रालय ने 2022 में रद्द किया। सरकार ने संसद में इसका कारण FCRA की धारा 11 और पंजीकरण की शर्तों के उल्लंघन को बताया। 2020 में गृह मंत्रालय ने RGF, राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट (RGCT), राजीव गांधी इंस्टीट्यूट फॉर कंटेम्परेरी स्टडीज (RGICS), इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट, और राजीव गांधी फाउंडेशन से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच के लिए एक अंतर-मंत्रालयी समिति गठित की थी। इसके बाद FCRA अनुपालन को लेकर कार्रवाई हुई। चीनी दूतावास की अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर 28 जनवरी 2006 को प्रकाशित जानकारी के अनुसार, तत्कालीन चीनी राजदूत Sun Yuxi ने चीन चैरिटी फाउंडेशन (China Charity Foundation) की ओर से RGF को 10 लाख रुपये का दान दिया था। दूतावास के अनुसार यह राशि RGF की धर्मार्थ गतिविधियों (charitable activities) के लिए थी। RGF को लेकर राजनीतिक विवाद का एक अन्य पहलू कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच 2008 में हुए समझौते (MoU) से जुड़ा है, यह समझौता किस उद्देश्य के लिए हुआ तथा इसके माध्यम से RGF को कितने और धन की प्राप्ति हुई, अभी भी जांच का विषय है।
जॉर्ज सोरोस की भूमिका
जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF) की आधिकारिक जानकारी के अनुसार उसने भारत में 1999 से काम किया और 2014 से भारतीय संगठनों को अनुदान देना शुरू किया । RGF के सहयोगी संगठन ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क (HRLN), के OSF से वित्तीय संबंधों का उल्लेख मिलता है। सोरोस की OSF के अनुसार 2014 के बाद भारत से संबंधित अनुदान का कुल मूल्य 11.9 मिलियन डॉलर था । इतना अधिक धन भारत में किस मूल उद्देश्य के लिए आया, यह निश्चित रूप से जांच का विषय है। अब यह प्रश्न निश्चित तौर पर उठना चाहिए कि यदि किसी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार से जुड़ी संस्था को विदेशी धन मिलता है, तो उसके स्रोत और उपयोग की पारदर्शिता महत्वपूर्ण है या नहीं, और यदि सरकार उस दिशा में कार्य कर रही है तो फिर उसका विरोध क्यों।
सख्ती पर सरकार का तर्क
प्रस्तावित बिल का विरोध करने वाले सवाल उठा रहे हैं कि समाजसेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और राहत कार्य करने वाले एनजीओ तथा अन्य गैर-लाभकारी संगठनों पर सरकार लगातार सख्ती क्यों बढ़ा रही है। इस संदर्भ में केंद्र सरकार का तर्क है कि पिछले कुछ सालो में सुरक्षा एजेंसियं के इनपुट, विदेशी फंडिंग के बढ़ते दायरे और दुनिया के कई देशों में विदेशी प्रभाव (Foreign Influence) को लेकर बढ़ी चिंताओं ने निगरानी को जरूरी बना दिया है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, 2012 में 52159 संस्थाएं FCRA के तहत पंजीकृत थीं, लेकिन समय के साथ नियमों के उल्लंघन, नवीनीकरण न होने और अन्य कारणों से बड़ी संख्या में लाइसेंस खत्म या रद्द हुए। वर्तमान में करीब 14455 संस्थाओं के पास ही लाइसेंस है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन संस्थाओं को हर साल लगभग 22 हजार करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिलता है। वहीं 2019-20 से 2021-22 के बीच 13500 से ज्यादा संस्थाओं को कुल 55700 करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी फंडिंग मिली। इतनी बड़ी मात्रा में आने वाले विदेशी धन का इस्तेमाल पूरी तरह घोषित उद्देश्यों के अनुरूप और पारदर्शी होना चाहिए। इसी वजह से विदेशी फंडिंग की निगरानी और जवाबदेही को और मजबूत करने के लिए संशोधन लाया जा रहा है।
दूसरे देशों में क्या है कानून
भारत के अलावा बाकी दुनिया में भी इस विषय पर सख्त कानून है।अमेरिका का फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA), जहां विदेशी सरकार या संस्था की ओर से राजनीतिक गतिविधियां करने वालों को रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है। ब्रिटेन की फॉरेन इन्फ्लूएंस रजिस्ट्रेशन स्कीम, जहां नियम तोड़ने पर जेल तक का प्रावधान है। यूरोपीय संघ (EU) भी विदेशी लॉबिंग को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में कदम उठा रहा है। सरकार का कहना है कि भारत को भी वैश्विक मानकों के अनुरूप अपने कानून को अपडेट करना जरूरी है।
क्या कहती है भारत सरकार
गृह मंत्रालय का कहना है कि FCRA का उद्देश्य विदेशी चंदे पर प्रतिबंध लगाना नहीं बल्कि उसे पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। सरकार का दावा है कि यदि कोई संस्था कानून के तहत निर्धारित नियमों का पालन करती है तो उसे विदेशी फंड प्राप्त करने में कोई बाधा नहीं होगी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 16200 संस्थाएं FCRA के तहत सक्रिय रूप से पंजीकृत थीं, जिन्हें विदेशी योगदान के रूप में 22963 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।
सरकार का कहना है कि यह कानून विदेशी फंडिंग को रोकने के लिए नहीं बल्कि उसके नियमन के लिए बनाया गया है। वास्तव में भारत विदेशी सहयोग का विरोध नहीं करता, भारत विदेशी नियंत्रण का विरोध करता है। विदेशी धन यदि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा में पारदर्शी तरीके से उपयोग होता है तो वह सहयोग है। लेकिन यदि विदेशी वित्तपोषण का उपयोग भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया, सामाजिक एकता, धार्मिक स्वतंत्रता अथवा राष्ट्रीय हित को प्रभावित करने के लिए होता है, तो उसकी निगरानी आवश्यक है। FCRA का मूल प्रश्न यही है कि भारत की सामाजिक और राजनीतिक दिशा का निर्धारण भारतीय नागरिक करेंगे या विदेशी वित्तीय स्रोत।

















