यह विश्व भर के मूल निवासियों के लिए कितना दुखद और भयानक है कि जिस दिन उनके पूर्वजों का नरसंहार हुआ था उसी दिन को ईसाई मिशनरियां और वैश्विक शक्तियां विश्व मूल निवासी दिवस मनवाती हैं। इसकी दुर्गन्ध भारतवर्ष में भी फैलायी गई है, भोले-भाले जनजाति समाज को बहकाया गया। उन्हें सच्चाई नहीं बताई गई।
इतिहास यह है कि 9 अगस्त 1610 में अमेरिका के मूल निवासियों के पांच कबीलों का नरसंहार किया गया था। मूलनिवासी कबीलों के विनाश का दिन है 9 अगस्त। यह शोक व्यक्त करने का दिन है, जिसे बड़ी चतुराई से संयुक्त राष्ट्र संघ के मंचों का उपयोग करते हुए जातीय रूप से प्रस्तुत किया गया। संयुक्त राष्ट्र को 9 अगस्त को जहां मूल निवासी नरसंहार दिवस और मूल निवासी शोक दिवस घोषित करना चाहिए था वहां मिशनरियों और वैश्विक शक्तियों के दवाब में मूल निवासी दिवस घोषित करते हुए उत्सव बना डाला।
भारत में मिशनरियों और वैश्विक शक्तियों का मूल निवासी दिवस मनाए जाने की आड़ में जनजातियों को मतांतरित कर उनके अस्तित्व को समाप्त कराने का षड्यंत्र कदापि सफल नहीं हो सकेगा। क्योंकि फड़ापेन (बड़ा देव) ही महादेव हैं, वही ‘सत्यम् शिवम सुंदरम्’ के रूप में प्रकाशित होकर भारत के मूल का शक्तिपुंज हैं। हम भगवान् बिरसा मुंडा के देश के हैं, वो हमारे पूर्वज हैं, इसलिए हम उनकी जयंती पर जनजाति गौरव दिवस मनाते हैं। अतः भारत में मूल निवासी दिवस मनाए जाने का कोई औचित्य नहीं है? ये तो भारत के विरुद्ध षड्यंत्र है।
भारत का हर निवासी है मूल निवासी
भारत का हर निवासी है मूल निवासी और आत्मा है जनजाति, यही है सनातन की थाती, जिससे मिशनरियों की छाती फट जाती है। इसलिए मिशनरियों के इशारे पर वैश्विक शक्तियों के सहारे मूल निवासी दिवस मनाए जाने का भारत में षड्यंत्र रचा गया। यह भारत को विभाजित करने की साजिश है।
85 देशों के मूल निवासियों का किया सफाया
भारत का दुर्भाग्य देखिए कि यहां के तथाकथित सेक्युलर विश्व मूल निवासी दिवस मनाए जाने की पैरवी कर रहे हैं। इसलिए ईसाई मिशनरियों के साथ वैश्विक शक्तियों का मूल निवासी दिवस मनाए जाने के षड्यंत्र का खुलासा करना अनिवार्य हो जाता है। गौरतलब है कि ईसाई मिशनरियों ने प्रथम चरण में नरसंहार और द्वितीय चरण में सेवा की आड़ में 85 देशों के मूल निवासियों का सफाया कर ईसाई देश बना डाला और आधी दुनिया को चपेट में ले लिया। वहीं कट्टर इस्लामवादियों ने तलवार के दम पर 58 मुस्लिम देश बना डाले। अब शेष दुनिया और विशेष कर भारत निशाने पर है।
ईसाई मिशनरियों की चालाकी समझिये
ईसाई मिशनरियों के षड्यंत्र से पहले ईसाई मिशनरियों के दुष्कर्मों को जानना होगा। इस संदर्भ में नोबेल पुरस्कार विजेता अफ्रीकी आर्कबिशप डेसमंड टुटू का कथन मार्गदर्शी है, उन्होंने ईसाई मिशनरियों पर तंज कसते हुए कहा था, ‘जब मिशनरी अफ्रीका आए तो उनके पास बाइबिल थी और हमारे पास धरती।’ मिशनरी ने कहा, ‘हम सब प्रार्थना करें। हमने प्रार्थना की। आंखें खोलीं तो पाया कि हमारे हाथ में बाइबिल थी और भूमि उनके कब्जे में। (’When the missionaries came to Africa they had the Bible and we had the land. They said “Let us pray.” We closed our eyes. When we opened them we had the Bible and they had the land.)
वहीं केन्या के पहले प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जोमो केन्याटा को 1914 में ईसाई मत में बपतिस्मा दिया गया और उनका नाम जॉन पीटर रखा गया, जिसे उन्होंने जॉनस्टोन में बदल दिया। बाद में उन्होंने 1938 में अपना नाम बदलकर जोमो रख लिया।
उन्होंने अपना पहला नाम किकुयू शब्द “जलते हुए भाले” से लिया और अपना अंतिम नाम मसाई शब्द से लिया, जिसका अर्थ है मनका बेल्ट जिसे वे अक्सर पहनते थे। उन्होंने ईसाई मिशनरियों पर डेसमंड टुटू की तरह तंज कसते हुए कहा, “जब मिशनरी आये, तो अफ्रीकियों के पास जमीन थी और मिशनरियों के पास बाइबिल थी । उन्होंने सिखाया कि आंखें बंद करके प्रार्थना कैसे की जाती है। जब हमने उन्हें खोला, तो उनके पास जमीन थी और हमारे पास बाइबिल थी। हमारे बच्चे अतीत के नायकों के बारे में सीख सकते हैं।”( When the Missionaries arrived, the Africans had the land and the Missionaries had the Bible. They taught how to pray with our eyes closed. When we opened them, they had the land and we had the Bible. Our children may learn about the heroes of the past.”)।
नृशंस तरीके से मूल निवासियों का नरसंहार किया
अब अमेरिका की ओर चलें तो वहां मूल निवासियों की संख्या 15वीं सदी में 14.5 करोड़ से 18वीं सदी तक मात्र 70 लाख रह गई थी। लेकिन विस्तारवादी शक्तियां इतने से संतुष्ट नहीं हुईं। आगे इन 70 लाख मूल निवासियों को ‘इंडियन रिमूवल एक्ट 1830’ के द्वारा अमेरिका से खदेड़कर मिसिसिपी नदी के पश्चिम में बंजर इलाकों में धकेल दिया गया। अमेरिकी इतिहास में इसे ‘आंसुओं की नदी’ कहा जाता है। दुनिया के दूसरे हिस्सों जैसे, दक्षिण अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व अन्य द्वीप समूहों में भी ऐसे ही नृशंस तरीके से वहां के मूल निवासियों का नरसंहार किया गया और इस तरह ये बर्बर लोग विश्व के सबसे सभ्य लोग बने।
मूल निवासी दिवस का इस तरह खेला खेल
पश्चिम में कोलंबस डे को ‘डे ऑफ रेस’ भी कहा जाता है। पहला कोलंबस दिवस 12 अक्टूबर 1792 को मनाया गया था। उल्लेखनीय है कि कोलंबस 12 अक्टूबर सन् 1492 को अमेरिका पहुंचा था और मूल निवासियों के लिए विनाश के द्वार खोल दिए थे। इस दिन अमेरिका सहित सभी औपनिवेशिक ताकतों के अधिकांश क्षेत्रों में राष्ट्रीय अवकाश होता है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कोलंबस दिवस को बड़ी भव्यता से मनाने का आदेश दिया था। परंतु मूल निवासियों के विरोध करने पर मिशनरियों के इशारे पर इन वैश्विक शक्तियों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र संघ की आड़ में 9 अगस्त को मूल निवासी नरसंहार दिवस को मूल निवासी दिवस उत्सव के रूप घोषित करवा दिया।
ईसाई मिशनरियों की दाल नहीं गलेगी
मिशनरियों और वैश्विक शक्तियों की दाल नहीं गलने वाली क्योंकि “जय सेवा-जय जोहार-सेवा जोहार -का मूल-कोयापुनेम अर्थात् मानव धर्म और प्रकृति की शाश्वतता में निहित है, जो” वसुधैव कुटुम्बकम् “के रूप में भारतीय संस्कृति का अमृत तत्व है। “शम्भू महादेव दूसरे शब्दों में शम्भू शेक-महादेव की 88 पीढ़ियों का उल्लेख मिलता है। प्रथम-शंभू-मूला, द्वितीय-शंभू-गौरा और अंतिम शंभू-पार्वती, ही हैं”।
मध्य प्रदेश के जबलपुर में भगवान् श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम उप ज्योतिर्लिंग, को सावन माह में एक दिन भील स्वरूप में सजाया जाता है जिसे गुप्तेश्वर दिव्य “भील श्रृंगार दर्शन ” के नाम से अभिहित किया जाता है। यही तो है, भारत के हर वासी हैं मूल निवासी के एकत्व का प्रतीक।

















