भारत एक संस्कृति संपन्न देश है। भारत की सांस्कृतिक विरासत ही भारत की वास्तविक संपदा है। यह संपदा हमें देश के गौरवशाली मूल्यों और मतों का बोध कराती है। यहाँ प्रत्येक प्रांत की भिन्न-भिन्न संस्कृतियों में एक वैशिष्ट्य देखने को मिलता है। यह सांस्कृतिक वैशिष्ट्य उस प्रांत या समाज के मूल्यों और मान्यताओं को प्रकट करता है। भारत में अनेक प्रांत, अनेक भाषाओं और अनेक पंथों का संगम देखने को मिलता है। यहाँ अपार सांस्कृतिक विविधता के साथ ही एक सांस्कृतिक समभाव भी देखने को मिलता है, यह समभाव ही “विविधता में एकता” के विचार को पुष्ट करता है और इसका संवर्धन करता है।
काशी-तमिल संगमम् का आयोजन
विविधता में एकता के विचार को साकार रूप देता एक आयोजन है “काशी-तमिल संगमम्।” इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन वर्ष 2022 से भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है। इसका प्रमुख उद्देश्य भारत के उत्तर और सुदूर दक्षिण क्षेत्र के बीच प्राचीन एवं पौराणिक काल के सतत् संबंधों को संरक्षित और संवर्धित करना है। यह आयोजन “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” की संकल्पना पर आधारित एक अनूठा कार्यक्रम है जो भारत की साझी संस्कृति और साझी विरासत को प्रतिबिंबित करता है।
प्रधानमंत्री मोदी का दृष्टिकोण
हाल ही के अपने कार्यक्रम “मन की बात” में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी-तमिल संगमम् के चौथे संस्करण पर व्यापक चर्चा की। उन्होंने कहा कि यह आयोजन भाषा और संस्कृति का अद्भुत संगम है। विश्व की प्राचीन भाषाओं में से एक तमिल और विश्व के प्राचीन नगरों में से एक काशी जब एकसाथ एक मंच पर होते हैं तो यह संगम अपने आप में बहुत अद्भुत होता है।
इस वर्ष का थीम और तमिल भाषा का महत्व
इस बार काशी के नमों घाट से शुरू होने वाले इस आयोजन का थीम “लेट्स लर्न तमिल-तमिल करकलम” है, जो हम सब को भारत की महान भाषाओं में से एक तमिल भाषा को सीखने के लिए प्रोत्साहित करता है। तमिल भाषा का एक समृद्ध इतिहास है। प्राचीन काल से ही इस भाषा में प्रचुर मात्रा में सुंदर ग्रंथ मिले हैं। ये ग्रंथ और शास्त्र दक्षिण भारत के सामाजिक, धार्मिक, राजकीय और शैक्षणिक पक्ष को दर्शाते हैं। प्राचीन भारत का संगम् काल इस भाषा का स्वर्ण काल माना जाता है, जिसमें राजकीय सहयोग से बड़े स्तर पर “संगम् साहित्य” की रचना हुई। शास्त्रीय आधार पर विद्वत्जन तमिल भाषा को देव भाषा संस्कृत के समतुल्य मानते हैं।
तमिल और संस्कृत का संबंध
शोध से ज्ञात होता है कि तमिल और संस्कृत भाषा में गहरा संबंध है और संस्कृत भाषा के अनेक शब्द तमिल साहित्य, विशेषकर तमिल काव्य में पाए जाते हैं। जैसे यह संबंध भाषाओं में दिखाई देता है, वैसे ही गहरा और अटूट संबंध उत्तर और दक्षिण की संस्कृतियों में भी दिखाई देता है। यह संबंध आज भी सतत सांस्कृतिक प्रवाह के माध्यम से बना हुआ है। प्राचीन काल से ही अनेक तीर्थयात्री, विद्वान और साधक उत्तर से दक्षिण तथा दक्षिण से उत्तर की यात्रा कर योग, विद्या और दर्शन का प्रचार-प्रसार करते रहे हैं।
महार्षि अगस्त्य का योगदान
इस सांस्कृतिक एकता को सूत्रपात करने में महार्षि अगस्त्य ने अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने उत्तर और दक्षिण के बीच सेतु का कार्य किया और अपनी आध्यात्मिक यात्रा से संपूर्ण समाज को आलोकित किया। ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरू जग्गी वासुदेव के अनुसार, सप्तऋषियों में महार्षि अगस्त्य ने पूरे भारत में योग विज्ञान का विस्तार किया। दक्षिण भारत में योग, आध्यात्मिक ज्ञान और रहस्यवाद के प्रचार में उनका योगदान अतुलनीय रहा।
काशी और दक्षिण भारतीय संत परंपरा
काशी सदियों से धर्म और ज्ञान की नगरी रही है। यहाँ के संतों, साधकों और मनीषियों के विचार आज भी जीवंत हैं। काशी भक्ति आंदोलन के अनेक संतों का केंद्र रही है। विशेष रूप से दक्षिण भारत से आए संतों के प्रसंग अत्यंत मार्मिक और अविस्मरणीय हैं। केरल के कालड़ी ग्राम से आए आद्य जगतगुरु शंकराचार्य को काशी में अद्वैत मत की शिक्षा दी गई और आगे चलकर वे इसके प्रतिपादक बने। भक्ति आंदोलन और तमिल पृष्ठभूमि के संत रामानुजाचार्य का काशी से संबंध रहा, जहाँ उन्होंने विशिष्टाद्वैत मत का प्रचार किया। आगे चलकर रामानन्दाचार्य ने इन्हीं से प्रेरणा लेकर रामानंदी संप्रदाय की स्थापना की।
त्रैलंग स्वामी और काशी के संत
19वीं सदी में तमिल से काशी आए महान रहस्यमयी संत त्रैलंग स्वामी की कथाएँ प्रसिद्ध हैं। उनके समकालीन संतों ने काशी जाकर उनसे भेंट की, जिनमें स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद प्रमुख हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने त्रैलंग स्वामी को “काशी के सचल शिव” की उपाधि प्रदान की।
ऋषि अगस्त्य वाहन अभियान और इतिहास
काशी-तमिल संगमम् के इस संस्करण के प्रमुख अभियानों में “ऋषि अगस्त्य वाहन अभियान” भी शामिल है। इसमें तमिल के तेनकाशी से 100 प्रतिभागी कार रैली में काशी पहुँचे। यह अभियान 13वीं सदी की पांड्या राजा पराक्रम पांड्या की यात्रा को दर्शाता है। यात्रा पूर्ण होने के उपरांत पांड्या राज्य में भगवान शिव का भव्य मंदिर बनवाया गया, जो “काशी विश्वनाथ मंदिर” के नाम से सुप्रसिद्ध है। तेनकाशी पांड्या राज्य की अंतिम राजधानी भी रही।
साझी परंपराओं और विरासत का संदेश
साझी परंपराओं और विरासत के प्रमाणों के बावजूद आज कुछ लोग निहित राजनीतिक स्वार्थों के लिए उत्तर और दक्षिण में भेद करने का प्रयास करते हैं। वे देश की एकता और अखंडता को बाधित करने का प्रयास करते हैं।
देश के उपराष्ट्रपति का दृष्टिकोण
देश के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि यह मंच गंगा और कावेरी दोनों परंपराओं को एक साथ लाकर उत्तर और दक्षिण की साझी सभ्यतागत विरासत को प्रदर्शित कर रहा है। यह आयोजन आज़ादी का अमृत महोत्सव के समय और भी महत्वपूर्ण बन जाता है, क्योंकि यह देश की सांस्कृतिक विरासत और स्वर्णिम इतिहास की पुनर्व्याख्या कर इसकी पुनरावृत्ति सुनिश्चित करता है और देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्य बनाए रखता है।
















