वीर सावरकर द्वारा अपनी पुस्तक “हिन्दू पद पादशाही” में छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रयास को हिन्दवी स्वराज्य के लिए संघर्ष बताया जाना समुचित है। हिन्दू पद पादशाही के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज का दुर्घर्ष प्रयास भारतीय इतिहास की अविस्मरणीय गाथा है। कठिनतम परिस्थितियों में असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को संपन्न कर पाने के कारण वे प्रातः स्मरणीय हैं और भारतीय इतिहास की महानतम विभूतियों में स्थान रखते हैं। महर्षि अरविन्द शिवाजी को विभूति अर्थात दैवीय शक्ति का प्रकटीकरण कहा है। वह मात्र सामरिक कौशल संपन्न ही नहीं थे, भीषण संकट के समय भारत की सस्कृति को भी नष्ट होने से बचाया।
स्वतंत्रता आंदोलन के काल में उनका जीवन और कार्य प्रमुख प्रेरणा स्रोत रहे थे तथा वर्तमान में भी कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी राष्ट्र के सम्मुख आने वाली चुनौतियों का संगठित होकर मुकाबला करने और हिन्दू समाज को सामाजिक समरसता और जबरन और लोभ लालच से इस्लाम या ईसाइयत में परावर्तित हुए लोगों की शुद्धि द्वारा घर वापसी के लिए प्रयास रत होने की प्रेरणा देते हैं ।
बंकिम चंद्र चटर्जी ने सभी जातियों के लोगों को आततायी के साथ संघर्ष में संगठित करने में छत्रपति शिवाजी महाराज की सफलता का अपनी पत्रिका ‘बंगदर्शन’ और अपने लेखों में उल्लेख किया। लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजों के विरुद्ध जनजागरण के लिए 15 अप्रैल 1895 को शिवाजी उत्सव प्रारम्भ किया। इस उत्सव को उन्होंने राजनैतिक सम्मेलनों पर थोपे गए सरकारी प्रतिबन्ध से बचते हुए क्रांतिकारी भावना फ़ैलाने का माध्यम बना लिया। शिवाजी के राजतिलक को स्मरण करवाने के लिए रबीन्द्रनाथ टैगोर ने 1904 में “शिवाजी उत्सव” नाम से एक प्रसिद्ध बंगाली कविता को रचना की।
जदुनाथ सरकार टिप्पणी करते हैं कि शिवाजी ने ” अपनी सफलता से सिद्ध कर दिया कि हिन्दू समाज एक राष्ट्र का गठन करने, राज्य का निर्माण करने और शत्रुओं को पराजित करने में समर्थ हैं…..”
वीर सावरकर द्वारा 16 वर्ष की उम्र में स्थापित गुप्त संगठन ,’मित्र मेला’, द्वारा 1899 में पहला उत्सव मनाया गया, वह छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्मदिन था। युवा सावरकर ने उनकी अर्चना में 1902 में “जयदेव जयदेव जय जय शिवराया, या या अनन्य शरणा आर्यां ताराया” आरती लिखी। इसे आज भी महाराष्ट्र में शिव जयंती पर बहुत उत्साह के साथ गाया जाता है।
जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि उन्हें परतन्त्रता के विलासिता के जीवन की अपेक्षा स्वत्नत्रता का जीवन ख़ुशगवार प्रतीत हुआ (Sarkar, p. 29 Shivaji and his Times)।
शिवाजी के जन्म के समय महाराष्ट्र की राजनैतिक अवस्था :
सत्रहवीं सदी में उत्तर भारत अत्याचारी मुग़ल साम्राज्य और दक्षिण भारत उतनी ही अत्याचारी निज़ामशाही, आदिलशाही और कुतुबशाही के शासन से त्रस्त था और सुदूर दक्षिणं मे विजयनगर का हिन्दू राज्य अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। बादशाह बनने से पहले औरंगज़ेब दक्कन (महाराष्ट्र, आंध्र और कर्नाटक) में, लम्बे काल तक (1636-1642 और 1652-1657) सूबेदार था। खेद की बात यह है कि दक्षिण के मुस्लिम राज्य अपने आपसी युद्धों या मुगलों से संघर्ष के लिए तथा हिन्दू प्रजा पर अधिकार बनाये रखने के लिए कुछ हिन्दू देशमुखों या जागीरदारों के सहयोग पर निर्भर रहते थे।
ये देशमुख पाटिलों के माध्यम से किसानों से बहुत अधिक लगान वसूलते थे और इसका बड़ा भाग मुस्लिम शासकों को मिलता था। वे उनके सहयोग के लिए सेना भी रखते थे और किलों की किलेदारी भी करते थे। उनके ऐसे ही सहयोगियों में बीजापुर के आदिलशाह के देशमुख शिवाजी महाराज के पितामह मालोजी भोंसले और पिता शाहजी और पश्चिमी विदर्भ के सिंदखेड में अहमदनगर के निज़ामशाह के जागिरदार लेखूजी जाधव भी थे, जो अपनी योग्यता के बल पर निज़ामशाही सल्तनत के सबसे शक्तिशाली देशमुखों में गिने जाने लगे। जावली के मोरे बीजापुर के आदिलशाह के अधीन ताक़तवर शासक थे। घोरपड़े, निम्बालकर, शिर्के, आदि बीजापुर के आदिलशाह के अधीन अन्य देशमुख थे।
छत्रपति शिवाजी महाराज एक शक्तिशाली देशमुख के पुत्र थे। वे अपने पिता के पदचिन्हों पर चलकर सुखमय, निरापद जीवन अपना सकते थे। किन्तु इसके बजाय उन्होंने बचपन से ही देश के समस्त उत्पीड़ित और भयाक्रांत लोगों के हितार्थ स्वराज्य स्थापना हेतु खतरों से खेलने का कंटकों से भरा मार्ग अपनाने का निश्चय किया।
शैशव काल से ही जीजाबाई द्वारा रामायण, महाभारत आदि के उदाहरणों से शिवाजी के मन में आतताई मुस्लिम शासकों की नौकरी करने के बजाय देश को उनसे मुक्त करके स्वराज्य स्थापना के संस्कार उत्पन्न किये गए। 1629 में, जिस समय शिवाजी गर्भ में थे, निजामशाह के आदेश से लेखुजी द्वारा आदिलशाह के अधीनस्थ दौलताबाद (देवगिरि) के महत्वपूर्ण दुर्ग की विजय के पश्चात, उनकी बढ़ती शक्ति से भयाक्रान्त होकर, षड़यंत्र करके उनकी उनके पुत्र-पौत्रों सहित हत्या कर दी गई। इस बात ने निश्चित ही जीजाबाई के मन पर गहरा प्रभाव डाला होगा।
शिवाजी का दृष्टिकोण अखिल भारतीय था और उनकी सफलता के प्रभाव का व्याप भी अखिल भारतीय रहा। यह बात अनेक उदाहरणों से प्रमाणित है; जैसे 1668 में जब बुंदेलखंड के युवाशासक छत्रसाल ने शिवाजी की सेना में रहकर उनकी सेवा करने की इच्छा व्यक्त की तो शिवाजी ने उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और क्षमता को देखकर उन्हें सुदूर अपने पैतृक क्षेत्र बुंदेलखंड में स्वतंत्रता का संघर्ष प्रारंभ करने की सलाह दी। आगे चलकर छत्रसाल मुग़लों के प्रबल शत्रु सिद्ध हुए।
शिवाजी ने लोगों के न्यायपूर्ण मानवीय अधिकारों की रक्षार्थ हथियार उठाये। शिवाजी से पहले भी सैकड़ों वीर योद्धाओं ने देश-धर्म के लिए बलिदान दिया था । किन्तु शिवाजी के कौशल, चातुर्य, दृढ़ आत्मविश्वास, योजनापूर्वक खतरों से खेलने की क्षमता अद्भुत थी। उनकी इस सफलता ने भारत के इतिहास को स्थायी रूप से प्रभावित किया।
राज्य स्थापना का प्रारम्भ:
शिवाजी ने 15 वर्ष की अल्पायु में पूना के समीप सह्याद्रि पर्वत माला के पर्वतीय क्षेत्र के मावल युवकों को स्वराज्य निर्माण के लिए संगठित करने का अभियान प्रारम्भ किया। यह अभियान इतना सफल रहा कि एक वर्ष बाद ही 1646 में उन्होंने समुद्रतल से लगभग 4600 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित तोरणा के दुर्गम दुर्ग को जीतने में सफलता प्राप्त की। इसे उन्होंने प्रचंडगढ़ नाम दिया। यहां उन्हें बड़ा खजाना प्राप्त हुआ जिसका उपयोग राजगढ़ दुर्ग के निर्माण में किया गया। राजगढ़ उनकी पहली राजधानी बना और 1670 तक उनके राज्य का केंद्र रहा। इस विजय के साथ शिवाजी के 370 दुर्गों पर अधिकार के अभियान का प्रारम्भ हुआ। अगले दो वर्षों में उन्होंने पूना के समीप पुरन्दर और कोंडाणा के पहाड़ी दुर्गों और चाकण के मैदानी दुर्ग सहित कई महत्वपूर्ण दुर्गों पर अधिकार किया।
शिवाजी की इन गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए आदिलशाह ने शाहजी को बंदी बना लिया। 1649 में शिवाजी को अपने पिता की मुक्ति के बदले कोंडाणा का महत्वपूर्ण दुर्ग आदिलशाह को लौटाना पड़ा । 1649 से 1655 तक राजनैतिक परिस्थितियों के कारण शिवाजी ने अपनी आक्रामक गतिविधियों पर नियंत्रण रखा। इस काल में उन्होंने अपने राज्य में व्यवस्था स्थापित करने और जीते हुए क्षेत्रों पर अपने अधिकार को सुदृढ़ करने की ओर ध्यान दिया। इस काल में उन्होंने कई देशमुखों और उनके मातहत पाटिलों से अच्छे सम्बन्ध बनाये।
1656 के पश्चात् राज्य विस्तार :
1656 में उन्होंने 18 वर्ष के युवक अली आदिलशाह के बीजापुर की गद्दी पर बैठने के पश्चात मुग़लों द्वारा इस राज्य के विरुद्ध अभियान प्रारम्भ किये जाने का लाभ उठाकर पुनः विजय अभियान प्रारम्भ किया। इस समय अवसर देखकर दक्षिण में नियुक्त मुग़ल सूबेदार औरंगज़ेब ने बीजापुर राज्य पर आक्रमण किया और बीदर पर अधिकार कर लिया। तभी मुग़ल राज्य में शाहजहां के पुत्रों के बीच गृह युद्ध प्रारंभ होने से औरंगज़ेब का अभियान समाप्त हो गया।
1656 में उन्होंने आदिलशाह के एक शक्तिशाली देशमुख जागीरदार चन्द्रराव मोरे को मारकर महाबलेश्वर के निचले इलाके में जावली पर अधिकार कर लिया। जावली का क्षेत्र सामरिक दृष्टि के अत्यंत महत्वपूर्ण था। यह पश्चिमी महाराष्ट्र के पहाड़ी क्षेत्र से लेकर अरब सागर के किनारे कोंकण प्रदेश तक फैला हुआ था। मोरे के अधीनस्थ इस क्षेत्र में सामरिक महत्त्व के 13 दुर्ग थे। यह पहाड़ी वनांचल भविष्य में संभावित छापामार युद्ध के लिए बहुत उपयुक्त था।
अरब सागर से लगा हुआ होने से नौसैनिक शक्ति के विस्तार के लिए भी इस क्षेत्र का महत्त्व था। प्रत्यक्ष युद्ध करके मोरे के अधीन क्षेत्र को जीतना बहुत कठिन था इस कारण इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बल के साथ छल का सहारा लेना पड़ा। शिवाजी के विश्वस्त दूतों ने मोरे भाइयों की हत्या की और उसके बाद शिवाजी ने नेतृत्व विहीन जागीर पर अधिकार कर लिया। इस विजय के परिणामस्वरूप अन्य दुर्गों के साथ रायगढ़ भी शिवाजी के अधिकार में आया। सह्याद्रि पर्वत श्रंखला के सुरक्षित अंचल में अवस्थित इस दुर्ग को अंग्रेजों ने भारत के ज़िब्राल्टर की संज्ञा दी है। शिवाजी द्वारा इस में निर्माण कार्य करवा के आगे चलकर राजधानी बनाया गया।
इसके पश्चात् कुछ समय शिवाजी ने बिना युद्ध के अपने प्रभाव का विस्तार किया। भोंसले और मोरे परिवारों के अतिरिक्त कई अन्य, जैसे सावंतवाड़ी के सावंत, मुधोल के घोरपड़े, फलटण के निम्बालकर, तथा शिर्के, माने, मोहिते आदि देशमुख परिवार आदिलशाह की सेवा में थे। शिवाजी ने इन्हे वश में करने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार की रणनीति अपनाई। कुछ के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये, कुछ के विरुद्ध बल प्रयोग किया और कुछ के अधीन पाटिलों के साथ सीधे संपर्क स्थापित कर उन्हें आदिलशाह के विरुद्ध संगठित होने को तैयार किया।
छत्रपति शिवाजी महाराज की सफलताओं से घबराकर आदिलशाह ने उनके विरुद्ध अफजल खाँ को विशाल सेना देकर भेजा। उसने शिवाजी को नव निर्मित प्रतापगढ़ किले में घेर लिया और उन्हें किले से बाहर निकल कर सामना करने को उकसाने के लिए अनेक मंदिरों को भृष्ट किया। वह सबसे पहले तुलजापुर आया और यहां तुलजा भवानी के प्रसिद्द मंदिर को, जिसे 51 शक्ति पीठों में गिना जाता है, गौ हत्या करके भृष्ट किया और शिवाजी के भोंसले परिवार की कुलदेवी की मूर्ति को तोड़ा। उसने दक्षिण कैलाश माने जाने वाले शिखर सिंघणा मंदिर और पंढरपुर के प्राचीन विट्ठोबा मंदिर को अपवित्र किया और लोगों पर अकथनीय अमानुषिक अत्याचार किये।
अंत में उसने प्रतापगढ़ से लगभग 50 किलोमीटर दूर वाई में अपनी सेना के तम्बू गाड़े जो अपने लगभग 100 मंदिरों के कारण दक्षिण काशी के नाम से प्रसिद्ध है। इस भीषण परिस्थिति में भी शिवाजी ने अपना संयम और संतुलन बनाये रखा क्योंकि प्रत्यक्ष खुले युद्ध में विशाल आदिलशाही सेना का मुकाबला करना असंभव था। अंत में उन्होंने 10 नवम्बर 1659 को किले के नीचे संधि वार्ता के लिए मिलने का खतरा उठाकर अफजल खाँ की हत्या की।
अफजल खां द्वारा अपने दूत कृष्णाजी भास्कर को भेजकर संधि वार्ता करने और उसके बाद शिवाजी की अफ़ज़ल खान से भेंट और उसकी हत्या की घटना सर्व-ज्ञात है। शिवाजी अफजल खाँ की धोखा देने की नीयत के प्रति सावधान थे क्योंकि वह कुछ समय पूर्व कर्नाटक में सीरा के कस्तूरी रंगा नायक की संधि के बहाने बुलाकर हत्या कर चुका था। इसके पश्चात हुए युद्ध में शिवाजी को निर्णायक विजय प्राप्त हुई और आदिलशाह की अधिकांश सेना नष्ट हुई ।
इस महत्वपूर्ण विजय के पश्चात शिवाजी ने महत्वाकांक्षी विजय अभियान छेड़ा और आदिलशाही सल्तनत के अनेक दुर्गों पर उनका अधिकार हो गया। शीघ्र ही कोल्हापुर के निकट तक उनका राज्य फैल गया और पन्हाला और खेलना पर उनका अधिकार हो गया। पन्हाला आगे चलकर रायगढ़ के पश्चात शिवाजी के राज्य का दूसरा प्रमुख केंद्र बन गया।
जुलाई 1660 में शिवाजी के आदिलशाह की विशाल सेना द्वारा पन्हाला दुर्ग में घेर लिए जाने पर जब इस दुर्ग को शत्रु सेना द्वारा जीत लिया जाना निश्चित हो गया तो वे दुर्ग से छिपकर निकल गए। जब आदिलशाही सेना उनका पीछा कर रही थी तब इस सेना को बाजीप्रभु और उनके सैनिकों द्वारा अपनी छोटी सी सेना के बल पर घोडखिंड नामक संकड़ी घाटी में मरते दम तक 18 घंटे के लिए रोक कर शिवाजी की रक्षा की, यह घटना इतिहास प्रसिद्ध है। घोडखिंड को शिवाजी द्वारा पावनखिंड नाम दिया गया। बाजी प्रभु के बलिदान पर पर महर्षि अरबिंद घोष ने एक विस्तृत अंग्रेजी कविता लिखी और सावरकरजी ने एक काव्यगाथा की रचना की।
मुग़ल साम्राज्य से संघर्ष :
शिवाजी की बढ़ती शक्ति से औरंगज़ेब के कान खड़े हो गए। सत्ता पर अधिकार स्थिर होते ही उसने उनकी शक्ति का दमन करने के लिए जनवरी 1660 में अपने मामा शाइस्ता खाँ को एक लाख की विशाल सेना देकर दक्कन का सूबेदार बनाकर भेजा। उसके शिवाजी के पूना के महल को निवास बनाने और लगभग तीन वर्ष तक महाराष्ट्र में आतंक का राज्य स्थापित किये जाने और तत्पश्चात शिवाजी द्वारा 5 अप्रैल 1663 को खतरा उठाकर उस पर सफल रात्रि आक्रमण कर उसके पुत्र की हत्या और स्वयं के भागते हुए के अंग भंग आदि की घटना की बारीकियां भली प्रकार ज्ञात हैं।
शाइस्ता खाँ की सूबेदारी के दौरान शिवाजी के राज्य में कृषकों और व्यापारियों को बहुत हानि उठानी पड़ी थी और परिणामस्वरुप राजकोष को भारी क्षति हुई थी। इसकी भरपाई के लिए शिवाजी ने मुग़ल साम्राज्य के सबसे समृद्ध नगर सूरत के व्यापारियों से धन वसूलने के लिए जनवरी 1664 में सफल अभियान किया।
अब औरंगज़ेब ने शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति के दमन के लिए 1665 में जयपुर के राजा जयसिंह को विशाल सेना देकर भेजा। महाराष्ट्र में अनेक दुर्गों को जीतने के पश्चात मुग़ल सेना ने शिवाजी को पुरन्दर के दुर्ग में घेर लिया। इस समय शिवाजी ने जयसिंह को मुग़लों का साथ छोड़ने और हिन्दू शक्तियों को संगठित करने का प्रयास करने हेतु परामर्श देते हुए एक विस्तृत पत्र लिखा जो एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। किंतु जयसिंह ने इस पर ध्यान नहीं दिया। संकट की स्थिति में उन्होंने मुग़लो को अपने 23 किले और काफ़ी बड़ा इलाका देकर समझौता किया। अब उनके पास केवल 12 दुर्ग ही बचे। इसके पश्चात् औरंगज़ेब द्वारा आमंत्रित किए जाने और महाराजा जयसिंह द्वारा सुऱक्षा की ज़िम्मेदारी दिए जाने पर शिवाजी आगरा गए। उनके बंदी बनाये जाने और घोर संकट में धैर्य और आत्मविश्वास रखते हुए 17 अगस्त 1666 को पुत्र सहित आगरा से निकल कर 40 दिन में मुग़ल साम्राज्य से गुजरते हुए राजगढ़ पहुँचने की घटना सुप्रसिद्ध है। नौ वर्ष के पुत्र संभाजी को साथ रखने पर पहचान लिए जाने का भय था, इस कारण उसे मथुरा में छोड़ने की युक्ति अपनाई गई।
इसके पश्चात् उन्होंने मुग़लो के धनी नगरों पर अभियान चलाया और दो वर्ष के भीतर ही खोया हुआ क्षेत्र वापस जीत लिया। सेना को पुनर्गठित किया और नवाचार के रूप में सामरिक और व्यापारिक उद्देश्यों के लिए नौसेना का गठन किया।
शिवाजी ने 1665 में समझौते के अंतर्गत जो दुर्ग मुग़लों को दिए गए थे, उनमें कोंडाणा (सिंहगढ़) का अत्यंत महत्वपूर्ण दुर्ग भी था। 4 फ़रवरी 1670 को तानाजी मालसुरे द्वारा अपने प्राण देकर इस पर विजय की घटना अविस्मरणीय है।
1670 में एक बार पुनः शिवाजी ने सूरत के व्यापारियों से धन वसूलने के लिए सफ़ल अभियान किया और पुनः प्रभूत धन की प्राप्ति हुई। 1670 के पश्चात् शिवाजी की शक्ति में तीव्र गति से विस्तार हुआ। फ़रवरी 1672 को उन्होंने नासिक के समीप साल्हेर के आमने-सामने के मैदानी युद्ध में मुग़लों की विशाल सेना को बुरी तरह से पराजित किया। इससे शिवाजी के छत्रपति बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया।
शिवाजी द्वारा राज्यारोहण
6 जून 1674 को राजगढ़ में शिवाजी द्वारा भव्य समारोह के साथ राज्यारोहण और छत्रपति की उपाधि धारण करना भारतीय इतिहास की महान घटना है। अनेक सदियों से भारत में नए हिन्दू राजवंश के राजा का सिंहासनारोहण नहीं हुआ था, इस कारण सिंहासनारोहण की परंपरा का ही लोप हो गया था। शिवाजी के सिहांसनारोहण से देश भर के हिन्दुओं में नई आशा का संचार हुआ। यह मुग़ल साम्राज्य के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी।
इसके पश्चात उन्होंने 6 वर्ष और शासन किया। उन्होंने 1677 में दक्षिण का अभियान किया। इस दौरान उन्होंने गोलकुण्डा के कुतुबशाह से भेंट की और बैंगलोर, होस्कोट, जिंजी, वेल्लोर आदि महत्वपूर्ण क्षेत्रों को जीता। इस अभियान में मिली सफलता से सुदूर दक्षिण में मराठा राज्य का सुदृढ़ आधार बन गया, जिससे भविष्य में मुग़ल आक्रमण होने पर इसका मुक़ाबला करने में आसानी हुई।
शिवाजी की नौ सेना:
शिवाजी की सफलताओं का जिक्र करते हुए उनके द्वारा शक्तिशाली नौसेना के गठन का उल्लेख समीचीन है। इसका प्रारम्भ 1654 में कल्याण के समीप एक संकरी खाड़ी में कुछ जलयानों के निर्माण से हुआ। 1665 में उन्होंने स्वयं के नेतृत्व में 3000 की जलसेना के बल पर उडुपी के पास बसरूर में पुर्तग़ाली सेना को पराजित कर इस बंदरगाह को मुक्त करवाया। 1670 के पश्चात मराठा जलसेना उत्तरी कोंकण क्षेत्र में सक्रिय हो गयी। 1679 में शिवाजी ने मुंबई के पास खाण्डेरी द्वीप पर एक दुर्ग बनाना प्रारम्भ किया तो अंग्रेजों ने इसे रोकने के लिए आक्रमण किया। इस पर शिवाजी की जल सेना ने लेफ्टिनेंट फ्रांसिस थॉर की सेना को पराजित किया। इस समय मराठों की जल सेना में करीब 5000 सैनिक और 57 युद्ध पोत थे।
शिवाजी मध्य युगीन भारत में पहले स्थानीय शासक थे, जिन्होंने जलपोतों का निर्माण करवाया। इससे पहले भारतीय शासकों के पास यूरोपीय ताकतों को समुद्र में चुनौती देने या उनसे देश के भीतरी क्षेत्रों की रक्षा के लिए जलशक्ति का अभाव था। जल शक्ति के निर्माण के सम्बन्ध में शिवाजी की प्रशंसा में महान इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार लिखते हैं “एक जन्मजात दूरदर्शी राजनेता (स्टेट्समन ) के रूप में शिवाजी की प्रतिभा को कोई अन्य बात इतना अधिक स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं करती जितनी उनके द्वारा नौसेना और नौ सैनिक अड्डों का निर्माण। “
जजिया के विरोध में औरंगज़ेब को पत्र :
छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1679 में, औरंगज़ेब के द्वारा घृणित जज़िया आरोपित करते ही यह कर लगाए जाने की भर्त्सना करते हुए एक पत्र लिखा। उनके चिटनिस लीला प्रभु द्वारा फ़ारसी में लिखा यह पत्र श्रेष्ठ ऐतिहासिक दस्तावेज है और कूटनीतिक भाषा का सुन्दर नमूना है। उन्होंने इस कर को अन्यायपूर्ण, आर्थिक दृष्टि से विनाशकारी और पूर्ववर्ती मुग़ल शासकों की समावेशी नीति का उल्लंघन करने वाला बताया।
शुद्धि-आंदोलन का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया
शिवाजी ने शुद्धि-आंदोलन के लिए अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया, जिसकी आज हिन्दू समाज को नितान्त आवश्यकता है। उन्होंने नेताजी पालकर, जिन्हें मुग़ल सेना द्वारा मुसलमान बना लिया गया था, वापस हिन्दू बनाकर पुनः सेना में बड़े पद पर नियुक्त किया। इसी तरह जबरन मतांतरित किये गए बालाजी निम्बालकर की घर-वापसी करवाकर उनके पुत्र से अपनी पुत्री का विवाह कराया।
हिन्दू पद पादशाही के लिए शिवाजी का यह संघर्ष हमारे इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। अनेक उतार-चढाव के पश्चात इसमें सफ़लता का रहस्य उनका पारदर्शी चरित्र, बड़े से बड़े खतरे से खेलने के अदम्य साहस, स्वराज्य निर्माण के लिए उत्कट अभिलाषा और इस अभिलाषा से अपने सैनिकों और जनसामान्य को संक्रमित कर पाना था।
देश के बाहर भी शिवाजी की महानता की कहानी पहुंच रही है। 8 मार्च 2025 को हिन्द-जापान स्वराज रथ यात्रा के पश्चात् घोड़े पर आसीन शिवाजी की 10 फिट ऊँची प्रतिमा का, एडोगवा, टोक्यो में अनावरण हुआ। इसके एक वर्ष पूरा होने पर 8 मार्च 2026 को यहाँ एक भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ।
लता मंगेशकर द्वारा गया गया, पंडित ह्रदयनाथ मंगेशकर द्वारा मराठी में लिखा सुन्दर गीत, “है हिन्दू नृसिंहा प्रभो शिवाजी राजा” मराठी नहीं जानने वालों को भी भाव विभोर कर देता है।
















