पुतिन की भारत यात्रा : मित्रता, विश्वास और साथ
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पुतिन की भारत यात्रा : मित्रता, विश्वास और साथ

रूस के साथ भारत के संबंध ऐतिहासिहक और अटूट हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के काल में भारत-रूस संबंधों में प्रगाढ़ता और ताजगी आई। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का दो दिवसीय भारत दाैरा संबंधों को नया आयाम देगा। द्विपक्षीय वार्ता के दाैरान दोनों देशों ने नौकरियों, व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, कनेक्टिविटी से लेकर कूटनीति तक, हर मोर्चे पर महत्वपूर्ण फैसले लिए

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 6, 2025, 11:37 am IST
inभारत, विश्व, विश्लेषण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पालम हवाईअड्डे से अपने साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फॉर्च्यूनर में लेकर आए। ऐसे मौकों पर अमूमन प्रमुख वैश्विक हस्तियां यूरोपीय गाड़ियों को प्राथमिकता देती हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जापानी कार के चयन को पश्चिम के लिए एक संदेश माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पालम हवाईअड्डे से अपने साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फॉर्च्यूनर में लेकर आए। ऐसे मौकों पर अमूमन प्रमुख वैश्विक हस्तियां यूरोपीय गाड़ियों को प्राथमिकता देती हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जापानी कार के चयन को पश्चिम के लिए एक संदेश माना जा रहा है।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया भारत यात्रा ने दोनों देशों के बीच विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिवेश में यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब यूरोप रूस तनाव चरम पर है, पश्चिम एशिया और यूरेशिया में सुरक्षा चुनौतियां बनी हुई हैं और वैश्विक बहुध्रुवीय व्यवस्था की मांग अधिक मुखर है। भारत और रूस, दोनों के लिए यह यात्रा द्विपक्षीय समीकरणों की पुनःसमीक्षा और अगले दशक के मार्ग निर्धारण का अवसर प्रदान करती है।

पुतिन की भारत यात्रा : संबंधों को नया आयाम

पुतिन के दौरे ने साफ कर दिया कि उनका यह दौरा केवल राजनयिक नहीं था, बल्कि भारत-रूस द्विपक्षीय संबंधों को नया आयाम देने वाला था, जिसमें नौकरियों, व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, कनेक्टिविटी से लेकर कूटनीति तक, हर मोर्चे पर दोनों देशों ने महत्वपूर्ण फैसले लिए। द्विपक्षीय वार्ता के दौरान ‘मैनपावर मोबिलिटी एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर हुए। इससे भारतीय कामगारों के लिए रूस में नौकरी और कौशल आधारित अवसरों के नए दरवाजे खुलेंगे। दोनों देश व्यापार को आसान बनाने के लिए राष्ट्रीय मुद्रा में लेन-देने तेजी से बढ़ाएंगे।

भारत-रूस संबंधों का यह नया अध्याय एक ऐसे समय शुरू हो रहा है, जब दुनिया तीव्र बदलावों से गुजर रही है। 30 दिन का फ्री वीजा, भारतीयों के लिए रूस में नौकरी के अवसर, राष्ट्रीय मुद्रा में व्यापार और 2030 का आर्थिक रोडमैप, यह सब दर्शाते हैं कि यह साझेदारी एशिया-यूरेशिया की रणनीतिक दिशा तय करेगी। इस रोडमैप में व्यापार, निवेश, लॉजिस्टिक्स, नई तकनीक, ऊर्जा और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में विस्तार की योजना शामिल है।

बैठक की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी भाषा में राष्ट्रपति पुतिन का स्वागत किया तो यह सिर्फ प्रोटोकॉल नहीं, बल्कि उस भरोसे का संकेत था जो दोनों देशों के संबंधों को दशकों से मजबूत बनाए हुए है। बैठक के बाद दोनों नेताओं ने संयुक्त बयान जारी किया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दुनिया जितनी अनिश्चितताओं से गुजर रही है, उतनी ही मजबूती से भारत-रूस रिश्ते ‘ध्रुव तारे की तरह स्थिर’ बने हुए हैं। वहीं राष्ट्रपति पुतिन ने कहा कि रूस और भारत के आपसी संबंध काफी मजबूत हैं। रूस सबसे बड़े भारतीय न्यूक्लियर प्लांट के निर्माण के प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहा है।

महत्वपूर्ण समझौते और घोषणाएं

  • भारतीय कामगारों के लिए मैनपावर मोबिलिटी एग्रीमेंट
  •  रूसी नागरिकों के लिए 30 दिन की मुफ्त वीजा घोषणा
  •  स्वास्थ्य क्षेत्र में दो अहम समझौते : स्वास्थ्य सहयोग, प्रशिक्षण, तकनीकी साझेदारी
  •  कृषि-उर्वरक क्षेत्र में संयुक्त यूरिया उत्पादन
  •  ऊर्जा क्षेत्र में निर्बाध ईंधन आपूर्ति का आश्वासन
  • व्यापार में तेजी के लिए राष्ट्रीय करेंसी में लेन-देन
  • यूरोपीय-यूरेशियाई मुक्त व्यापार समझौते पर प्रगति
  •  पोत निर्माण में सहयोग-‘मेक इन इंडिया’ को बड़ा प्रोत्साहन
  •  अनियमित प्रवासन से निपटने में सहयोग
  •  एक-दूसरे के क्षेत्र में अस्थायी श्रम गतिविधि को बढ़ावा
  •  खाद्य सुरक्षा, उपभोक्ता अधिकार संरक्षण व मानव कल्याण पर सहयोग
  •  ध्रुवीय जल पोतों के विशेषज्ञ प्रशिक्षण पर समझौता ज्ञापन
  •  माल-वाहन आगमन पूर्व सूचना आदान-प्रदान प्रोटोकॉल
  •  डाक सेवाओं पर द्विपक्षीय समझौता
  •  वैज्ञानिक-शैक्षणिक सहयोग

संबंधों की निरंतरता

भारत-रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी वर्ष 2000 में औपचारिक रूप से स्थापित हुई। इसके बाद 2001 की मास्को यात्रा ने साझेदारी को नेतृत्व स्तर पर विश्वसनीयता प्रदान की। यहीं से वार्षिक शिखर बैठक का प्रारूप लागू हुआ, जिसने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्थिरता सुनिश्चित की।

भारत-रूस संबंध शीतयुद्ध के काल से ही रक्षा, तकनीकी सहयोग, शिक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में मजबूत रहे हैं। सोवियत संघ के विघटन के बाद भी यह संबंध कमजोर नहीं पड़ा, बल्कि समय के साथ नए ढांचों और प्रावधानों के साथ और व्यापक होते गए।

संस्थागत ढांचा

भारत-रूस संबंधों की सबसे मजबूत कड़ी उनका औपचारिक संस्थागत ढांचा है, जो वार्षिक शिखर सम्मेलनों, 2+2 विदेश-रक्षा मंत्रियों, संवादों और अंतर-सरकारी आयोग (आईआरआईजीसी) जैसे मंचों पर आधारित है। आईआरआईजीसी दो प्रमुख प्रभागों में काम करता है। पहला, व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीय और सांस्कृतिक सहयोग प्रभाग जिसकी सह अध्यक्षता भारत के विदेश मंत्री और रूस के प्रथम उप-प्रधानमंत्री करते हैं। दूसरा, सैन्य और सैन्य तकनीकी सहयोग प्रभाग, जिसकी अध्यक्षता दोनों देशों के रक्षा मंत्री करते हैं।

दिसंबर 2021 में दोनों देशों ने 2+2 संवाद प्रारूप जोड़ा, जिसके तहत विदेश और रक्षा मंत्री समवेत रूप से द्विपक्षीय रणनीतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं। यह प्रारूप भारत-रूस संवाद को और अधिक केंद्रित और समन्वित बनाता है। अक्तूबर 2025 में रणनीतिक साझेदारी के 25 वर्ष पूरे होने पर इन संरचनाओं की मजबूती पर जोर दिया गया।

शिखर कूटनीति

दोनों देश अब तक 23 बैठकें कर चुके हैं। 2024 में मॉस्को में आयोजित 22वें भारत-रूस शिखर सम्मेलन में 9 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हुए और 2030 तक रणनीतिक-आर्थिक सहयोग पर संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ। इसी यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रूस के सर्वोच्च राजकीय सम्मान ‘सेंट एंड्रयू द एपोस्टल द फर्स्ट कॉल्ड’ से सम्मानित किया गया।

इसके बाद कजान ब्रिक्स शिखर बैठक और तियानजिन एससीओ राष्ट्राध्यक्ष बैठक में भी दोनों नेताओं की भेंट हुई। इन मुलाकातों का उद्देश्य विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को समकालीन वैश्विक परिवर्तनों के अनुरूप दिशा देना रहा। वर्तमान यात्रा उसी कूटनीतिक शृंखला का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहां दोनों देशों ने व्यापार रक्षा ऊर्जा विज्ञान और उभरती प्रौद्योगिकियों में प्रगति की समीक्षा की। यह यात्रा उन परिस्थितियों में हुई, जब यूरोपीय देशों ने भारत रूस समीकरणों पर सार्वजनिक टिप्पणी की थी जिसे भारत ने राजनयिक शिष्टाचार के विरुद्ध माना।

कूटनीतिक परिवेश और दबाव

यूरोप-रूस युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद वैश्विक व्यवस्था में नया ध्रुवीकरण दिखाई देता है। इसी पृष्ठभूमि में यूरोप के कुछ देशों के मंत्रियों ने संयुक्त लेख जारी कर भारत की रूस के साथ ऊर्जा और व्यापारिक साझेदारी पर प्रश्न उठाए। भारत सरकार ने इसका स्पष्ट प्रतिवाद किया और कहा कि भारत की विदेश नीति स्वायत्त है और किसी गुट या दबाव की अधीन नहीं। भारत ने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्रीय घटनाओं या यूरोपीय दृष्टिकोण के आधार पर भारत रूस संबंधों की वैधता प्रभावित नहीं होगी। वैश्विक दक्षिण के लिए सामरिक स्वायत्तता आज प्राथमिक आवश्यकता है और भारत इस सिद्धांत का पालन जारी रखेगा।

ऊर्जा सहयोग

रूस भारत का प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बन चुका है। कच्चे तेल की स्थिर आपूर्ति ने भारत की घरेलू महंगाई और उत्पादन लागत को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भुगतान प्रणाली शिपिंग बीमा और लेन-देन के वैकल्पिक ढांचों की आवश्यकता बढ़ी। दोनों देशों ने ऐसे समाधानों पर चर्चा की, जिनसे ऊर्जा व्यापार बाधित न हो। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी सहयोग जारी है। ऊर्जा सप्ताह के दौरान दोनों देशों ने छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर और हाइड्रोजन आधारित ऊर्जा तंत्र पर संयुक्त कार्य के विकल्पों पर विचार किया।

अवसर और असंतुलन

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत-रूस व्यापार 68.07 अरब डॉलर के करीब पहुंचा। इसमें आयात का हिस्सा निर्यात से कई गुना अधिक रहा। भारत, रूस को फार्मा, रसायन, लोहा, इस्पात, समुद्री उत्पाद निर्यात करता है, जबकि रूस से तेल, उर्वरक, कोकिंग कोल और कीमती धातु आयात करता है। दोनों देशों ने 2030 तक 100 अरब डॉलर व्यापार लक्ष्य निर्धारित किया है। इसे प्राप्त करने के लिए भारत के निर्यात विविधीकरण, लॉजिस्टिक ढांचे के आधुनिकीकरण, रुपया-रूबल भुगतान व्यवस्था में स्थिरता, आईटी मशीनरी और कृषि आधारित उत्पादों के लिए रूस में बाजार विस्तार की आवश्यकता है।

मजबूत स्तंभ और नई दिशा

रक्षा क्षेत्र भारत-रूस संबंधों का सबसे दृढ़ आधार है। 2021 में संपन्न 10 वर्षीय सैन्य तकनीकी सहयोग समझौता संयुक्त अनुसंधान उत्पादन और प्लेटफॉर्म विकास को बढ़ावा देता है। भारत में अनेक रक्षा प्रणालियां रूसी तकनीक पर आधारित हैं। टी-90 टैंक, सुखोई-30 एमकेआई विमान, ब्रहमोस मिसाइल और अनेक नौसैनिक प्लेटफॉर्म इस संयुक्त ढांचे के उदाहरण हैं। सैन्य अभ्यास भी रक्षा साझेदारी का महत्वपूर्ण आयाम है। इंद्र 2025 का 14वां संस्करण राजस्थान के बीकानेर में आयोजित हुआ, जिसमें दोनों देशों के सैनिकों ने आतंकवाद रोधी और संयुक्त अभियान में प्रशिक्षण किया। इसी वर्ष भारतीय सैनिकों ने रूस में आयोजित जैपद सैन्य अभ्यास में भाग लिया। भारत-रूस ने चेन्नई और बंगाल की खाड़ी में द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास भी संपन्न किया।

कूटनीतिक अड़चनें

द्विपक्षीय संबंधों में तीन प्रमुख तकनीकी अड़चनें दर्ज की गई हैं। पहली, भुगतान तंत्र की जटिलता, जिसका कारण पश्चिमी प्रतिबंध और बैंकिंग अनुपालन है। दूसरी, रक्षा क्षेत्र में स्पेयर पार्ट और एमआरओ के स्थानीयकरण की कमी, जिसके कारण विरासत प्रणाली पर निर्भरता रहती है। तीसरी, व्यापार असंतुलन जो भारत के निर्यात को सीमित रखती है। नीति स्तर पर समन्वय आवश्यक है ताकि भारत-रूस संबंध पश्चिम के साथ भारत के संबंधों पर अनुपयुक्त प्रभाव न डाले। भारत ने लगातार संकेत दिया है कि उसकी विदेश नीति संतुलन और स्वायत्तता पर आधारित है।

प्रोटोकॉल तोड़कर हवाईअड्डा पहुंचे मोदी

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 4 दिसंबर को 23वें भारत-रूस वार्षिक बैठक के लिए दो दिवसीय दौरे पर जब भारत आए, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर गर्मजोशी से पालम हवाईअड्डे पर उनका स्वागत किया। इसके बाद दोनों एक ही गाड़ी में प्रधानमंत्री आवास पहुंचे। प्रधानमंत्री मोदी के इस कदम ने पुतिन और क्रेमलिन को हतप्रभ किया। क्रेमलिन ने बयान जारी कर कहा, ‘हमें जानकारी नहीं थी कि प्रधानमंत्री मोदी आगवानी करेंगे।’

समीकरण स्थिरता और भविष्य की दिशा

पुतिन की वर्तमान यात्रा भारत रूस संबंधों की निरंतरता और विस्तार का संकेत है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में यह साझेदारी भारत की सामरिक स्वायत्तता और रूस की एशियाई उपस्थिति दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। यूरोपीय आलोचनाओं और वैश्विक दबावों के बावजूद भारत और रूस ने यह संकेत दिया है कि उनके द्विपक्षीय संबंध बाहरी हस्तक्षेप से नियंत्रित नहीं होंगे। ऊर्जा, रक्षा प्रौद्योगिकी और व्यापार के क्षेत्रों में साझा प्राथमिकताएं दोनों देशों को अगले दशक में भी मजबूत सहयोग की दिशा में ले जाएंगी।

भारत-रूस साझेदारी अब केवल ऐतिहासिक विरासत नहीं, बल्कि उभरती वैश्विक संरचना में एक स्थिर धुरी के रूप में देखी जा रही है। यह संबंध बहुध्रुवीय विश्व में संतुलन और स्थिरता का व्यावहारिक आधार प्रस्तुत करता है और आने वाले वर्षों में इसकी रणनीतिक भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण होने की संभावना है।

भविष्य के समीकरण

भारत-रूस के बीच भविष्य में सहयोग के कई नए आयाम उभर रहे हैं। आर्कटिक समुद्री सहयोग जहां रूस के तकनीकी अनुभव और भारत की समुद्री क्षमता का संयोजन संभव है। इंडो यूरोप कनेक्टिविटी के लिए नॉर्थ साउथ कॉरिडोर का विस्तार, जो रूस को भारतीय बंदरगाहों से खाड़ी क्षेत्र और यूरोप तक जोड़ता है। डिजिटल भुगतान और व्यापार प्लेटफॉर्म, जहां भारत की डिजिटल संरचना रूस के लिए उपयोगी हो सकती है। फार्मा, स्वास्थ्य तकनीक और खाद्य सुरक्षा क्षेत्र, जहां भारत की विनिर्माण और शोध क्षमता रूस के लिए दीर्घकालिक अवसर प्रस्तुत करती है। शिक्षा और अनुसंधान में संयुक्त विश्वविद्यालय और तकनीकी केंद्र दोनों देशों की ज्ञान अर्थव्यवस्था की दिशा मजबूत कर सकते हैं।

परस्पर आवश्यकता और कूटनीतिक संतुलन

भारत और रूस, दोनों एक-दूसरे के लिए परस्पर उपयोगी साझेदार हैं। रूस के लिए भारत एशिया का विश्वसनीय बाजार है और वैश्विक दक्षिण का प्रमुख रणनीतिक संवादकर्ता। भारत के लिए रूस ऊर्जा, रक्षा, तकनीक और बहुपक्षीय सहयोग का आधार स्तंभ है। भारत ने यह स्पष्ट किया है कि वह रूस के साथ सहयोग जारी रखेगा, जबकि पश्चिमी देशों के साथ भी अपने संबंध संतुलित रखेगा। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत रूस का संबंध वैश्विक संतुलन के लिए आवश्यक है।

 

 

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