दत्तात्रेय जयंती पर विशेष : प्रकृति के 24 गुरुओं से शिक्षा ग्रहण कर लोक को संदेश दिया
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दत्तात्रेय जयंती पर विशेष : प्रकृति के 24 गुरुओं से शिक्षा ग्रहण कर लोक को संदेश दिया

दत्तात्रेय महर्षि अत्रि और महासती अनुसूइया के पुत्र रूप में मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को अवतरित हुए थे। प्रकृति व पर्यावरण के संरक्षण के साथ शैव, वैष्णव और शाक्त तीनों संप्रदायों में समन्वय स्थापित करने वाले भगवान दत्तात्रेय की लोकमंगलकारी शिक्षाएं वर्तमान परिस्थितियों में कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Dec 4, 2025, 04:37 pm IST
inभारत

दत्तात्रेय महर्षि अत्रि और महासती अनुसूइया के पुत्र रूप में मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को अवतरित हुए थे। प्रकृति व पर्यावरण के संरक्षण के साथ शैव, वैष्णव और शाक्त तीनों संप्रदायों में समन्वय स्थापित करने वाले भगवान दत्तात्रेय की लोकमंगलकारी शिक्षाएं वर्तमान परिस्थितियों में कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। उनका मानना था कि ईश्वर और प्रकृति दोनों एक ही हैं। उन्होंने प्रकृति के 24 गुरुओं से शिक्षा ग्रहण कर लोक को संदेश दिया कि जब तक पृथ्वी पर प्रकृति का संतुलन कायम रहेगा, तभी तक जीवन सुरक्षित रह सकेगा।

महान योगी और वैज्ञानिक भगवान दत्तात्रेय

हिंदू धर्म में भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेवों यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश के एकात्म स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण, शिवपुराण व महाभारत के साथ दत्त संहिता, अवधूत गीता, दत्तात्रेय उपनिषद् और अवधूत उपनिषद् व दत्त महात्म्य आदि ग्रन्थों में दत्तात्रेय महराज के अद्भुत जीवन दर्शन और लोकमंगलकारी शिक्षाओं का विस्तृत विवरण है। भगवान दत्तात्रेय ने वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर नाथ संप्रदाय निर्मित किया था। “दत्त महात्म्य” में इन्हें प्रथम गुरु, महानतम योगी और वैज्ञानिक बताया गया है। इन धर्मग्रंथों के उल्लेख बताते हैं कि दत्तात्रेय जी ने ही परशुरामजी को श्रीविद्या-मंत्र प्रदान किया था। शिवपुत्र कार्तिकेय को भी दत्तात्रेय ने अनेक विद्याएं दी थीं। भक्त प्रह्लाद को अनासक्ति-योग का उपदेश देकर उन्हें श्रेष्ठ राजा बनाने का श्रेय महागुरु दत्तात्रेय को ही जाता है। इसी तरह गुरु गोरखनाथ को आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि-चतुरंग योग का मार्ग भगवान दत्तात्रेय से ही प्राप्त हुआ था।

महागुरु दत्तात्रेय का दिव्य अद्वैत दर्शन

भारतीय पुरा साहित्य के शीर्ष अध्यात्म ग्रन्थों-वेद, उषनिषद्, अष्टावक्र गीता, भगवद् गीता, ब्रह्मसूत्र आदि में वेदान्त के जिस अद्वैत तत्व का विषद विवेचन मिलता है; भगवान दत्तात्रेय उसी ज्ञान को आत्मसात कर अद्वैत में स्थित हुए थे। उनके अद्वैत दर्शन के अनुसार समूची सृष्टि अखण्ड है। इसमें सर्वत्र एकत्व है। सृष्टि में दिखाई देनेवाले विभिन्न रूप एक ही परम तत्व के विभिन्न रूप मात्र हैं। इसी अद्वैत का अद्भुत वर्णन “अवधूत गीता” में मिलता है। इस महान ग्रंथ में महागुरु कहते हैं कि सर्वान्तरयामी परमात्मा ही एक चैतन्य सत्ता के रुप में सर्वत्र व्याप्त है। जिस तरह विभिन्न नदियां अलग-अलग स्रोंतो व दिशाओं से निकलने के बावजूद अंतत: समुद्र में ही मिलती हैं, उसी तरह हम चाहे अलग-अलग नाम से ईश्वर की पूजा करें किंतु ईश्वरीय तत्व एक ही है। कनफ्यूशियस, लाओत्से, थियोसोफी विचारधारा आदि दुनियाभर के श्रेष्ठतम आत्मज्ञानियों ने भी इसी ज्ञान को प्रामाणिक माना है।

“अवधूत” स्वरूप की अनोखी व्याख्या

अवधूत उपनिषद् में दत्तात्रेय महराज ने अवधूत स्वरूप की व्याख्या कर लोकमंगल की जो शिक्षा दी गयी है वह अपने आपमें अद्भुत है। इस उपनिषद् के अनुसार “अवधूत” बड़ा महत्वपूर्ण शब्द है। इस शब्द के प्रथम अक्षर “अ” का तात्पर्य है- अक्षरत्व को उपलब्ध; यानी जो कभी क्षर अर्थात नष्ट न हो। यह संसार क्षर (क्षण-भंगुर) है जबकि परमात्मा अक्षर। जिसने माया से भरे इस क्षण-भंगुर संसार में निर्लिप्त रहकर शाश्वत की डोर पकड़ ली उसी का जन्म सार्थक है। दूसरे अक्षर “व” का अर्थ है जो सिर्फ बात न करे वरन जीवन में परमात्मा को वरण(ग्रहण) कर सके। यानी जिसकी श्वास-श्वास में अक्षर का वरण हो जाए। परमात्मा का वरण तो वही कर सकता है जो खुद को मिटाने को राजी हो। इस वरण में अहंकार का त्याग अनिवार्य शर्त है। तभी प्रज्ञावान बना जा सकता है। तीसरे अक्षर “धू” में यह शिक्षा निहित है कि संसार को धूल मात्र समझें। यह बोध सोने-जागने, उठने-बैठने, जीवन की प्रत्येक गतिविधि में सतत प्रतिक्षण जागृत रहना चाहिए। आखिरी शब्द “त” का अर्थ है तत्वमसि। यानी इस संसार के प्रत्येक घटक के कण कण में परमात्मा है।

दत्तात्रेय महराज के 24 गुरुओं की लोकहितकारी शिक्षाएं

भागवत महापुराण में अवधूतोपाख्यान के रूप में अपने अन्तिम दिनों में भगवान कृष्ण ने उद्धव से दत्तात्रेय और महाराजा यदु के मध्य हुए एक रुचिकर संवाद का उल्लेख मिलता है। इस प्रसंग में दत्तात्रेय महराज के 24 गुरुओं की बेहद तार्किक व्याख्या मिलती है। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हरिण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुंआरी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट; सृष्टि के ये 24 घटक दत्तात्रेय जी के गुरु हैं।

पहली गुरु पृथ्वी और सातवें सूर्य

दत्तात्रेय जी ने महाराज यदु को बताया कि उनकी पहली गुरु पृथ्वी है। लोग धरतीमाता पर तरह-तरह के अत्याचार करते रहते हैं। फिर भी वे सब सहन कर सतत परोपकार में लगी रहती हैं। मैंने उनसे धैर्य व परोपकार की शिक्षा ली है। दूसरे गुरु वायुदेव हैं। शरीर के अन्दर रहने वाली प्राणवायु के रूप में उन्होंने सिखाया है कि आवश्यकता के अनुसार ही वस्तुओं का ग्रहण करें, इन्द्रियों की अनावश्यक चाह की पूर्ति में अपना श्रम व्यर्थ न करे। तीसरे गुरु ‘आकाश’ हैं। इस जगत में आग लगती है, बरसात होती है, सूर्य, चन्द्र अनेक खगोलीय पिंड भ्रमण करते हैं,पर वे बिना किसी भेदभाव के सबको समान रूप से उचित स्थान देते हैं। चौथा गुरु ‘जल’ है। जो हर सम्पर्क में आने वाले को सतत प्रवाहमान रहने के साथ स्वच्छता व शीतलता प्रदान करने की शिक्षा देता है। पांचवें गुरु ‘’अग्नि’’ से सीखा कि जीवन में जो कुछ मिलता है, उसे बिना संग्रह किए और विभिन्न परिस्थितियों से अप्रभावित रहते हुए प्रकाश में परिवर्तित कर देना चाहिए। छठा गुरु ‘चन्द्रमा’ सतत बढ़ता-घटता रहता है, पर अपने अस्तित्व और आकृति को कभी नहीं खोता। सातवें गुरु ‘सूर्य’ से सीखा कि विभिन्न स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करके उसे व्यावहारिक ज्ञान में परिवर्तित कर बिना भेदभाव के सबमें समान रूप से वितरित करना चाहिए।

मधुमक्खी और कुरर पक्षी से मिली सीख

आठवें गुरु ‘’कबूतर’’ से सीखा कि भले ही सकारात्मक प्रतिक्रिया क्यों न हो, मोह और भावावेश में पड़कर अपना सर्वनाश नहीं करना चाहिए। ‘’पिंगला’’ नाम की वेश्या से दत्तात्रेय ने सबक लिया कि केवल पैसों के लिए जीना नहीं चाहिए। ‘हिरण’ से यह सीखा कि मौज-मस्ती में भी लापरवाह नहीं होना चाहिए। ‘समुद्र’ ने सीख दी कि जीवन के उतार-चढ़ाव में भी खुश और गतिशील रहना चाहिए। ‘पतंगा’ ने सिखाया कि रूप-रंग के आकर्षण और झूठे मोह में उलझना नहीं चाहिए। ‘हाथी’ से सीखा कि तपस्वी पुरुष को कंचन व काम भावना से दूर रहना चाहिए। ‘मछली’ ने सिखाया कि स्वाद का लोभी नहीं होना चाहिए। ‘मधुमक्खी’ से सीखा कि आवश्यकता से अधिक चीजों को एकत्र करके नहीं रखना चाहिए। ‘कुरर पक्षी’ से सीखा कि चीजों को पास में रखने की सोच छोड़ देना चाहिए। ‘’छोटे बालक’’ से सीखा कि हमेशा चिंतामुक्त और प्रसन्न रहना चाहिए। ‘’कुमारी कन्या’’ से सीखना चाहिए कि अकेले रहकर भी काम करते रहना चाहिए।

Topics: दत्तात्रेय जयंतीभगवान दत्तात्रेयपाञ्चजन्य विशेषदत्तात्रेय के 24 गुरुमहर्षि अत्रिमाता अनुसूइयादत्तात्रेय भगवान कौन हैं
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