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औपनिवेशिक मानसिकता : गुलाम सोच अस्वीकार

औपनिवेशिक मानसिकता ने राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक स्वाधीनता में बाधा डाली। स्वतंत्रता के बाद भी शिक्षा, शासन, विज्ञान और समाज में विदेशी दृष्टिकोण छाया रहा। प्रधानमंत्री मोदी का 2035 तक इस मानसिकता से मुक्ति का आह्वान राष्ट्र को उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक जड़ों से पुनः जोड़ने का प्रयास है

Written byप्रणय कुमारप्रणय कुमार
Dec 3, 2025, 08:15 am IST
inभारत, विश्लेषण
Pranav Kumar

Pranav Kumar

विभाजनकारी वृत्तियां और औपनिवेशिक मानसिकता ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की सबसे बड़ी बाधा रही हैं, क्योंकि इन्हीं से देश की अधिकांश समस्याएं जन्म लेती हैं। देश को बांटने वाली प्रवृत्तियों ने जहां राष्ट्रीय एकता व शक्ति को कमजोर किया, वहीं औपनिवेशिक मानसिकता ने भारत को उसकी जड़ों, धर्म की व्यापक संकल्पना और सनातन संस्कृति से जुड़ने नहीं दिया। नतीजा, न प्रगति का सशक्त मार्ग बन सका और न मौलिक राष्ट्रीय पहचान बनी। स्वतंत्रता के बाद अपेक्षा थी कि भारत अपनी संस्कृति, विरासत और आदर्शों के अनुरूप शिक्षा, शासन, विज्ञान, शोध, चिकित्सा और विकास के नए प्रतिमान गढ़ेगा, पर केवल सत्ता बदली, उसका चरित्र और औपनिवेशिक ढांचा बड़े पैमाने पर यथावत रहा। परिणामस्वरूप शिक्षा, कला, साहित्य, सिनेमा, शासन, न्याय, वास्तु, विज्ञान, चिकित्सा और पर्यटन तक पर आज भी विदेशी सोच और तंत्र का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। जब तक इस औपनिवेशिक तंत्र और मानसिकता में मूलभूत परिवर्तन नहीं होगा, विकसित भारत की मजबूत नींव रखना संभव नहीं है।

औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति

भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग में थॉमस बैबिंगटन मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा-व्यवस्था और मानसिकता गहरी जड़ें जमा चुकी हैं, जिससे हर सकारात्मक बदलाव के मार्ग में यह बाधा बनती हैं। 2014 के बाद शासन तंत्र, नीतियों और समाज में औपनिवेशिक मानसिकता को बदलने के प्रयास शुरू हुए। अब प्रधानमंत्री ने 2035 तक मैकाले की शिक्षा प्रणाली से उपजी गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का आह्वान किया है, पर इसे ‘मनुवाद’ बताने की कोशिश हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने छठे रामनाथ गोयनका व्याख्यान में भारत के विकास मॉडल को दुनिया के लिए आशा का प्रतीक बताते हुए कहा कि मैकाले द्वारा 1835 में स्थापित औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली ने भारत की सांस्कृतिक और शैक्षिक नींव को तोड़ दिया। उन्होंने अगले 10 वर्ष में इस गुलामी की मानसिकता से पूरी मुक्ति पाने का राष्ट्रीय संकल्प लिया है। उन्होंने बताया कि मैकाले ने भारत के हजारों साल के ज्ञान, कला और संस्कृति को नकार दिया और विदेशी तरीकों को श्रेष्ठ बताया। उन्होंने स्वदेशी शिक्षा प्रणाली को पुनर्स्थापित करने और भारतीय ज्ञान-परंपरा पर गर्व करने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि यह मुक्ति ही भारत के विकास और इसे आत्मनिर्भर बनने की कुंजी है।

दरअसल, स्वतंत्रता के बाद भी आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं पश्चिमी मानकों पर आधारित हैं और भाषा, पहनावा, सांस्कृतिक प्रतीक, इतिहास की अनदेखी होती रही। ज्ञान एवं योग्यता का पैमाना कार्यकुशलता की बजाय अंग्रेजी भाषा की दक्षता माना जाने लगा, जिससे भारतीय युवाओं में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति हीन भावना विकसित हुई। पश्चिमी उच्चारण और भाव-भंगिमाओं की नकल का चलन भी इसी मानसिकता को दर्शाता है। इस मानसिकता को त्यागने और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है, तभी देश का समग्र विकास संभव है।

ब्रिटिश-अमेरिकी अंग्रेजी बोलने पर अत्यधिक जोर देने से भारतीय महान व्यक्तित्व और नेताओं, जैसे रवींद्रनाथ ठाकुर, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसी विभूतियों की संप्रेषण कला की अनदेखी होती है। यह ‘शिष्टाचार’ और ‘ड्रेसिंग सेंस’ के नाम पर भारतीयों को उनकी संस्कृति और मूल से कटने पर मजबूर करता है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने कौशल और प्रतिभा का अवमूल्यन कर ‘सूट-बूट वाली कुलीन संस्कृति’ को बढ़ावा दिया है। बहुत से बुद्धिजीवी पश्चिमीकरण को ही आधुनिकता मानते हैं और भारतीय परंपराओं पर अनावश्यक संदेह जताते हैं। पश्चिमी त्योहारों को बढ़ावा देना और भारतीय त्योहारों को कम महत्व देना भी औपनिवेशिक मानसिकता के हिस्से है। वैश्वीकरण व उपभोक्तावाद भी इस मानसिकता का एक रूप हैं।

दुर्भाग्य यह है कि स्वतंत्र भारत में भी भारतीय अवधारणा के विकास, कलात्मकता और उत्कृष्टता को जीवन के सभी क्षेत्रों से लगभग बाहर कर दिया गया है। योग, आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र जैसे पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक धरोहरों को तब जागरूकता मिली, जब पश्चिम ने उन्हें स्वीकार किया। इसके अलावा, भारतीय ज्ञान पद्धतियां, जैसे कालगणना, ग्रह-नक्षत्र और सांस्कृतिक विविधता अधिक तार्किक और समृद्ध हैं, पर इन्हें अधिकतर केवल रस्मी तौर पर पूजा-धर्म या त्योहार तक सीमित समझा जाता है। हमारे नगर-नियोजन, वास्तुकला, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर से लेकर सौंदर्य, रंग, रस, रूप और गंध की समग्रता और विविधता भी पश्चिम से अधिक विकसित और समृद्ध हैं। लेकिन पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण ने भारतीय समाज में सरलीकरण और एकरूपता को बढ़ावा दिया है, जबकि भारत ने दुनिया को केवल काले-गोरे में विभाजित करके नहीं देखा।

भारत की समावेशी परंपरा

हमारी विविधवर्णी परंपरा में जीवन के सभी रंगों को सम्मान मिलता है। हमारे सांस्कृतिक नायक राम, कृष्ण जैसे श्याम वर्ण के थे, जो सौंदर्य एवं आचरण के आदर्श हैं। द्रौपदी अपने समय की सुंदरतम स्त्रियों में से एक थीं। उनका दूसरा नाम ही ‘कृष्णा’ था। गौर वर्ण को प्रधानता देना औपनिवेशिक मनोवृत्ति का परिणाम है। हमारा खान-पान और जीवनशैली प्रकृति के अनुकूल और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील है, लेकिन हम अभी भी पश्चिमी सतत विकास लक्ष्यों से पूरी तरह आगे नहीं बढ़ पाए। मध्यकालीन संघर्षों को हिंदू-मुस्लिम संघर्ष बनाना भी औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है। ऐतिहासिक किरदारों को असामान्य पोशाक में प्रस्तुत करना भी इस मानसिकता का परिणाम है। उदाहरण के लिए, अलाउद्दीन खिलजी तथा अकबर जैसे किरदारों के लिए सिनेमा में रणवीर सिंह और ऋ तिक रोशन जैसे लंबी कद-काठी वाले भारतीय अभिनेताओं का चयन किया जाता है, जबकि उन्हें तुर्क, चीनी या मंगोलों जैसा दिखाना अधिक स्वाभाविक होता। रणवीर सिंह ने ‘पद्मावत’ फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी का पात्र निभाया, जो भारतीय कद का है, जबकि खिलजी का वास्तविक स्वरूप इस से अलग था।

यह औपनिवेशिक सोच है कि तुर्क-मुगलों-अफगानों के आक्रमण को इस्लामिक और ब्रिटिश-यूरोपीय आक्रमण को ईसाई आक्रमण नहीं माना जाता। पिछले आठ दशकों में शिक्षा और बौद्धिक विमर्श ने विदेशी संस्कृति को श्रेष्ठ मानते हुए अपनी भाषा, भोजन, भजन और सोच में हीनता पैदा की। युवाओं को यह पढ़ाया गया कि पश्चिमी संस्कृति ही वैज्ञानिक और प्रगति का मार्ग है, जबकि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश बिना ब्रिटिश तंत्र के भी विकसित हुए। ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजी शासन का दावा कि वे भारत को ‘सभ्य और सुसंस्कृत’ बनाने आए थे, आज भी कई तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा दोहराया जाता है जो मानसिक गुलामी का प्रतीक है। यह सरासर झूठ है कि भारत का विकास अंग्रेजों और अंग्रेजी के बिना संभव नहीं था। सच यह है कि भारत की प्राचीन सभ्यता, उद्योग, शिक्षा और सांस्कृतिक विविधता अंग्रेजों के आने से पहले ही विकसित और समृद्ध थी। अंग्रेजों द्वारा फैलाई गई कई झूठी धारणाएं, जैसे भारत का राजनीतिक एकीकरण अंग्रेजों के कारण हुआ, भारत की राष्ट्रीयताएं केवल अंग्रेजों के बाद बनीं, आर्य बाहर से आए और धर्म, रिलीजन, मजहब एक ही हैं-बड़ा झूठ और कुप्रचार है। सही ज्ञान के लिए अंग्रेज अधिकारियों के अभिलेखों और सर्वेक्षण रिपोर्टों का अध्ययन आवश्यक है, जो भारत की प्राचीन और समृद्ध सामाजिक व्यवस्था को दर्शाते हैं। ये झूठे नैरेटिव्स मार्क्स और मैकाले जैसे लोगों द्वारा फैलाए गए थे, जबकि भारतीय सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक व्यवस्था अंग्रेजों के आने से कई गुना बेहतर थी।

भारतीय ज्ञान परंपरा को कमतर आंका

यह कहना गलत है कि अंग्रेज और अंग्रेजी के बिना भारत का विकास संभव नहीं। भारत का विकास अंग्रेजों के आने से पहले भी हुआ था। अंग्रेज अधिकारियों के अभिलेखों के अनुसार 18वीं-19वीं शताब्दी में भारत में 10,000 से अधिक लौह-भट्ठियाँ थीं, जहां इंग्लैंड से बेहतर इस्पात बनाया जाता था। यह दिखाता है कि भारत की शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था, कृषि, औद्योगिक और तकनीकी क्षमताएं बहुत विकसित थीं। धर्मपाल की पुस्तकों में इन तथ्यों का प्रमाण मिलता है कि भारत का प्राचीन विज्ञान और तकनीक अंग्रेजों की तुलना में अधिक उन्नत थी। इतिहासकार धर्मपाल ने अपनी दो पुस्तकों ‘द ब्यूटीफुल ट्री- इंडिजिनस इंडियन एजुकेशन इन द एटीन्थ सेंचुरी’ तथा ‘इंडियन साइंस एंड टेक्नोलॉजी- इन द एटीन्थ सेंचुरी’ में इस ऐतिहासिक सच्चाई को अंग्रेज अभिलेखों के आधार पर स्पष्ट किया है। उन्होंने 18वीं-19वीं सदी के अंग्रेज अधिकारियों द्वारा एकत्रित भारतीय शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, औद्योगिक स्थिति, कृषि, चिकित्सा और धातु विज्ञान आदि पर विस्तृत प्रमाण दिए हैं। वे लिखते हैं कि अंग्रेजों की औद्योगिक क्रांति का अंहकार भारत की प्राचीन तकनीकी उपलब्धियों के सामने ध्वस्त हो गया था। भारत की लौह-इस्पात तकनीक अंग्रेजों से कहीं अधिक उन्नत थी और 18वीं-19वीं सदी में भारत में 10,000 से अधिक लौह-भट्टियां थीं।

कृषि, सिंचाई, सूती वस्त्र उत्पादन आदि क्षेत्र में भारत की व्यवस्था अत्यंत प्राचीन और प्रगतिशील थी। खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, फल, फूल, सब्जी, बागवानी, दुग्ध उत्पादन आदि में भारत की स्थिति तत्कालीन इंग्लैंड से बेहतर थी। 1800 ई. के आसपास भारतीय खेती की उपज इंग्लैंड से लगभग दोगुनी-तिगुनी थी। भारत किसान स्वयं खेती करते थे, जबकि कथित आधुनिक, उदार और लोकतांत्रिक इंग्लैंड में यह काम दासों और श्रमिकों से करवाया जाता था। भारत में गांवों से लेकर शहरों तक छोटे-बड़े जलाशयों की भरमार थी, जो जल संरक्षण की जागरूकता का प्रमाण था। मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर के आस-पास ही एक लाख से अधिक जलाशय थे। 18वीं सदी तक सूती वस्त्रों का निर्यात इतना हुआ कि ब्रिटेन में भारतीय वस्त्रों के खिलाफ विरोध शुरू हो गया था। यही नहीं, 18वीं सदी तक भारत में चेचक के देसी टीके भी उपलब्ध थे। शल्य चिकित्सा में ग्रामीण वैद्य यूरोपीय चिकित्सकों से बेहतर थे। अंग्रेज अधिकारियों के सर्वेक्षण औपनिवेशिक मानसिकता से परे भारत की प्राचीन और समृद्ध शिक्षा-परंपरा दिखाते हैं।

अंग्रेजों के आने से पहले शिक्षा हर परिवार की प्राथमिक जिम्मेदारी थी। कोई जाति भेद नहीं था और महिलाएं भी साक्षर थीं

विश्व की शिक्षा प्रणाली भारत की देन 

ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी विलियम एडम ने 1830-35 ई. में बंगाल और बिहार की शिक्षा की व्यवस्था पर एक सर्वेक्षण कराया था। इसके अनुसार, ऐसा कोई गांव नहीं था, जहां कम से कम एक छोटी-बड़ी पाठशाला न हो। इन क्षेत्रों में लगभग 1 लाख विद्यालय थे, जहां औसतन हर 400 विद्यार्थियों पर एक स्कूल था, जबकि दोनों प्रांतों की सम्मिलित जनसंख्या लगभग 4 करोड़ थी। ये स्कूल मंदिरों, खुले आंगन बरगद के विशाल वृक्षों की छाया और शिक्षकों के घरों में संचालित होते थे। एडम के अनुसार, बिना किसी आर्थिक या सामाजिक भेदभाव के गरीब बच्चों को भी शिक्षा में समान अवसर मिलते थे। इसी तरह, एडम से पूर्व मद्रास के गवर्नर जनरल थॉमस मुनरो ने 10 मार्च, 1826 को ‘द अर्ली मेजर्स फॉर एजुकेशन इन द मद्रास प्रेसीडेंसी-सर थॉमस मुनरोज मिनट्स ऑन एजुकेशन इन 1822 एंड 1826’ शीर्षक से मद्रास प्रेसीडेंसी की सर्वेक्षण रिपोर्ट दी थी। इसमें मुनरो ने प्रेसीडेंसी के सभी गांवों में पाठशाला होने की बात कही थी। इसी रिपोर्ट के सातवें अध्याय में मुनरो ने लिखा है, “मद्रास प्रेसीडेंसी में शिक्षा का स्तर हमारे देश (इंग्लैंड) की तुलना में भले ही कम है, किंतु यह लगभग सभी यूरोपीय देशों के शिक्षा-स्तर से बेहतर है।” रिपोर्ट के अनुसार, मद्रास प्रेसीडेंसी में 11,575 विद्यालय और 1,094 महाविद्यालय थे, जिनमें क्रमश: 1,57,195 और 5,431 विद्यार्थी पढ़ते थे। कई ब्रिटिश अधिकारियों और मिशनरियों ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को इंग्लैंड से बेहतर माना। इन रिपोर्टों ने उपनिवेशी मानसिकता की गलतफहमियों को दूर करते हुए भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता को उजागर किया।

जनरल मुनरो के मद्रास सर्वेक्षण के समय बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गवर्नर (1819-1827) माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टन ने भी 10 मार्च, 1824 में दक्कन के कमिश्नर तथा गुजरात व कोंकण के कलेक्टरों को शिक्षा के व्यापक सर्वेक्षण के आदेश दिए थे। एलफिंस्टन की समिति ने बताया कि हमारे क्षेत्र के लगभग सभी गांवों में कम से कम एक विद्यालय था, जबकि बड़े गांवों मं एक से अधिक। इसी तरह, ब्रिटिश अधिकारी डॉ. जी.डब्ल्यू. लिटनर के अनुसार, पंजाब में 1850 में लगभग 3.30 लाख विद्यार्थी पढ़ते थे, जो 1882 तक औपनिवेशिक नीतियों की वजह से घटकर 1.90 लाख रह गए। यह दर्शाता है कि ब्रिटिश हस्तक्षेप से पूर्व भारत में विकेंद्रीकृत, समृद्ध और उच्चस्तरीय शिक्षा व्यवस्था मौजूद थी। लिटनर ने कुछ सर्वेक्षणों की रिपोर्ट के आधार पर अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिजिनस एजुकेशन इन पंजाब : सिंस एनेक्ससेशन एंड इन 1882’ में लिखा है, “भारत में बड़ी अच्छी विकेंद्रित शिक्षा व्यवस्था है। लगभग प्रत्येक गांव की अपनी पाठशाला है, जो गांव वाले चलाते हैं। इन पाठशालाओं को जमीन आवंटित है, जिसकी आमदनी से पाठशाला का खर्चा निकलता है। इनमें से अनेक स्कूलों का स्तर तो हमारे ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के बराबर का है। शिक्षकों को अच्छा वेतन दिया जाता है।”

ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी अलेक्जेंडर वॉकर (1764-1831) ने मलाबार क्षेत्र की शिक्षा-व्यवस्था का अध्ययन किया और लिखा, “यहां की शिक्षा प्रणाली प्राकृतिक संसाधनों से विकसित हुई है। उसने बताया कि मलाबार का साहित्य और शिक्षा ब्राह्मणों से मिली और यह प्रणाली भारत से यूरोप तक पहुंची। इसी के आधार पर संसार के सभी प्रबुद्ध देशों के राष्ट्रीय विद्यालयों की नींव रखी गई। शिक्षा हर परिवार की प्राथमिक जिम्मेदारी थी, कई महिलाएं भी साक्षर थीं। बच्चे बिना किसी हिंसा के सरल विधि से सीखते थे और विद्यार्थी आपस में मॉनिटर होते थे। मिशनरियों ने भी स्वीकार किया कि ब्रिटिश विद्यालयों की पढ़ाई की प्रणाली भारत से ही ली गई है।”

मार्क्स-मैकाले के अनुयायियों ने यह झूठ फैलाया कि भारत में अंग्रेजों से पहले शिक्षा केवल ब्राह्मणों या कुछ खास जातियों तक सीमित थी। आगामी 10 वर्ष में औपनिवेशिक और गुलामी की मानसिकता से छुटकारे के प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद एक बार फिर उसी झूठ को दुहराया जा रहा है। लेकिन अंग्रेज अधिकारियों की रिपोर्टों से पता चलता है कि गुरुकुल प्रणाली में 80 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी उन जातियों के थे, जिन्हें आज कथित तौर पर पिछड़ा, दलित और वंचित-शोषित बताया जाता है। मद्रास प्रेसीडेंसी में केवल 13 प्रतिशत छात्र द्विज थे, जबकि 76.19 प्रतिशत निचली जाति के थे। यही स्थिति लगभग पूरे केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, उड़ीसा के कुछ जिलों की थी।

केवल तेलुगु भाषी क्षेत्र में द्विज छात्रों की संख्या 46 प्रतिशत थी, जबकि अवर्ण छात्र 41 प्रतिशत थे। विलियम एडम की रिपोर्ट में भी छात्रों-शिक्षकों की जातीय संरचना के बारे में यही तथ्य मिलते हैं। एडम ने तो जातियों का विवरण भी दिया है। उसकी बंगाल और पंजाब की रिपोर्ट उस झूठ को ध्वस्त करता है, जिसमें कहा गया कि अध्यापन पर केवल ब्राह्मणों का अधिकार था। इन रिपोर्टों में बताया गया कि अध्यापक और छात्र विभिन्न जातियों से थे। लिटनर के अनुसर, पंजाब में विद्यालयों में सभी जाति और वर्ग के बच्चे भेदभाव मुक्त माहौल में पढ़ते थे। उस समय 5 तरह के स्कूल थे- गुरुमुखी, मकतब-मदरसा व कुरान स्कूल, चटसाल, पाठशाला एवं सेकुलर हिंदू स्कूल। इनमें फारसी, वर्नाकुलर और एंग्लो वर्नाकुलर स्कूल तथा सिखों, मुसलमानों और हिंदू लड़कियों के स्कूल थे। ये रिपोर्टें अंग्रेजों द्वारा तैयार की गई थीं, जो भारत की प्राचीन समृद्ध और समावेशी शिक्षा व्यवस्था को साबित करती हैं। इसके बावजूद उपनिवेशवादी मानसिकता ने हमें पिछड़ा और असाक्षर बताया, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत थी।

इसलिए भारत की पारंपरिक शिक्षा और समाज को समझने के लिए हमें औपनिवेशिक चश्मे और मार्क्स-मैकाले प्रेरित विकृत सिद्धांतों को छोड़ना होगा, जिन्होंने हमारे आत्मबोध और ऐतिहासिक स्मृति को कमजोर किया है। प्रधानमंत्री मोदी का 2035 तक औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का आह्वान शिक्षा के माध्यम से भारत को उसके स्वत्व से पुनः जोड़ने का राष्ट्रीय संकल्प है। भारत का भविष्य पश्चिमी प्रतिमानों की नकल में नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से शक्ति लेने, स्वदेशी बुद्धि और भारतीय ज्ञान-परंपरा की पुनर्स्थापना में निहित है। अतः हमें इतिहास के सत्य को निर्भीकता से सामने लाना, औपनिवेशिक मिथकों को परास्त करना और ऐसी शिक्षा-दृष्टि विकसित करना है जो विकसित भारत की संकल्पना को साकार करे।

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35 सवाल, 15 साल का डाटा और घुसपैठ का नेटवर्क: डेमोग्राफी चेंज पर गृह मंत्रालय की जांच से क्यों मची हलचल?

हरिपुर कालसी में हरिघाट के लोकार्पण अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ स्वामी चिदानंद सरस्वती और महामंडलेश्वर अरुण गिरि जी महाराज

हरिपुर : विरासत का पुनरुत्थान

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“ज्ञानेश्वरी कल, आज और कल के लिए मार्गदर्शक”: मुंबई में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने लॉन्च किया ऐप, पढ़ें बड़ी बातें

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पंजाब में ‘आधी सैलरी-पूरा धोखा’ : चंडीगढ़ में शिक्षकों का प्रदर्शन, मनीष सिसोदिया के घर के बाहर परिवार सहित दिया धरना

स्वार्थ की राजनीति: EVM और चुनाव आयोग पर बेबुनियाद सवाल उठाकर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा विपक्ष!

फ्रांस में सुधार को लेकर शुरू हुआ आंदोलन हिंसा में बदल गया। (चित्र-एआई द्वारा निर्मित )

फ्रांस के स्कूलों में क्यों भड़की हिंसा? आगजनी और गिरफ्तारियों तक कैसे पहुंचा मामला

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डॉ. भीमराव आम्बेडकर के आर्थिक विचार: कृषि, उद्योग और RBI से लेकर सामाजिक न्याय तक, आज क्यों प्रासंगिक हैं बाबा साहेब?

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2026 एशियाई खेल: स्वर्ण पदकों की लगी झड़ी, शान से लहराया तिरंगा, बेटियों ने हॉकी, तीरंदाजी और मुक्केबाजी में रचा इतिहास

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भारतीय ज्ञान संपदा की संपूर्ण विश्व को जरुरत: बोरीवली में बोले सरसंघचालक जी- ‘भारत की ओर उम्मीद से देख रही दुनिया’

कल का मौसम: 3 अक्टूबर को देश के किन राज्यों में होगी बारिश, मौसम विभाग ने जारी किया अलर्ट

PM मोदी से बोले कैप्टन मच्छार- हनुमानजी ने बचा लिया, जब भी दर्द में होता हूं ‘हनुमान चालीसा’ पढ़ता हूं

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