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‘अवैध’ मस्जिद, वैध मुआवजा

उज्जैन की अल तकिया मस्जिद को लेकर पूरी दुनिया में यह दुष्प्रचार किया गया कि ‘भाजपा के राज में मस्जिदों को जबरन गिराया जा रहा है’। सच तो यह है कि मस्जिद वाले न्यायालय में कागजात तक नहीं दिखा पाए। यानी वह मस्जिद अवैध थी। इसके बाद भी राज्य सरकार ने उस मस्जिद को गिराने से पहले नियमों का पालन किया और उसके लिए मुआवजा भी दिया

Written byडी.के.दुबेडी.के.दुबे
Nov 27, 2025, 08:33 pm IST
inभारत
अवैध अल तकिया मस्जिद को ध्वस्त करते कर्मचारी

अवैध अल तकिया मस्जिद को ध्वस्त करते कर्मचारी

गत दिनों उज्जैन की अल तकिया मस्जिद को लेकर दायर एक याचिका को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय पर हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा, “राज्य ने विधि अनुसार भूमि का अधिग्रहण किया है, मुआवजा दिया है और याचिकाकर्ता पूर्व में स्वयं अधिग्रहण प्रक्रिया में सम्मिलित होकर मुआवजे को चुनौती नहीं दे पाए हैं। अतः पुनः विवाद उठाने का कोई आधार नहीं।”

यह निर्णय सिद्ध करता है कि यह विवाद मस्जिद की वैधता का नहीं, बल्कि कब्जे के आधार पर मुआवजे की वैधता का था। देखा जाए तो यह विवाद सिर्फ एक मजहबी ढांचे के ध्वस्तीकरण का नहीं, बल्कि भारत की विभाजन-उपरांत मजहबी संपत्ति व्यवस्था और राज्य के राजस्व अधिकारों से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विधिक प्रश्न बन गया। वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह मस्जिद लगभग ‘200 वर्ष पुरानी वक्फ संपत्ति’ थी, जिसे ध्वस्त करना संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मजहबी स्वतंत्रता का उल्लंघन है। राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि न तो कोई पुराना राजस्व रिकॉर्ड है और न ही 19वीं सदी या उससे पूर्व का वक्फ अभिलेख उपलब्ध है।

यह है मामला

मध्य प्रदेश सरकार ने इस वर्ष जनवरी में उज्जैन में महाकाल कॉरिडोर परियोजना के लिए अल तकिया मस्जिद की भूमि का अधिग्रहण किया। राज्य ने अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजा तय किया और भुगतान भी किया। वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह ऐतिहासिक मस्जिद है, परंतु वह अदालत के समक्ष 1840 या पूर्व का कोई वक्फ अभिलेख, नक्शा, राजस्व रिकॉर्ड आदि प्रस्तुत नहीं कर सका। यह पाया गया कि यह संपत्ति पहली बार 13 दिसंबर, 1985 को वक्फ के रूप में अधिसूचित हुई। अर्थात् अधिसूचना से पहले यह राज्य की राजस्व भूमि थी। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि राज्य ने अधिग्रहण विधि का पालन किया, मुआवजा दिया और याचिकाकर्ता पूर्व में अधिग्रहण प्रक्रिया में सम्मिलित रहे हैं। अतः पुनः राहत नहीं दी जा सकती।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1947 में भारत के विभाजन के पश्चात संपत्ति का स्वरूप ही बदल गया। जहां पाकिस्तान ने हिंदू और सिख संपत्तियों को इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ई.टी.पी.बी.) के अधीन किया, वहीं भारत ने निष्क्रांत संपत्ति अधिनियम, 1950 पारित किया। इसके तहत वे संपत्तियां, जिनके स्वामी या मजहबी प्रबंधक विभाजन के दौरान पाकिस्तान चले गए थे, राज्य के अधीन कर दी गईं। इन संपत्तियों का स्वामित्व व्यक्तिगत नहीं रहा और वे राज्य की राजस्व संपत्ति बन गईं। राज्य सरकारें ऐसी भूमि का उपयोग सार्वजनिक प्रयोजन हेतु करने लगीं, और मजहबी उपयोग के मामलों में केवल अस्थायी अनुमति दी जाती थी। यह स्थिति 1954 तक बनी रही, जब तक कि केंद्र सरकार ने वक्फ संपत्तियों की वैधानिक पहचान के लिए वक्फ एक्ट, 1954 पारित नहीं किया।

सीमाओं का निर्धारण

भारत–पाकिस्तान विभाजन के उपरांत 1951 में हुआ मिर्जा-पंत समझौता मजहबी संपत्त्यिों की स्थिति को स्पष्ट करने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बना। इस समझौते में यह तय हुआ, “केवल वे मजहबी संपत्तियों, जिनका उपयोग तत्कालीन समय में मजहबी उद्देश्यों के लिए सक्रिय रूप से हो रहा है, वही अपनी मजहबी स्थिति बनाए रखेंगी; शेष संपत्तियां राज्य की राजस्व संपत्तियां मानी जाएंगी।” इस समझौते का कानूनी अर्थ यह हुआ कि जो मस्जिदें, दरगाहें, मदरसे या कब्रिस्तान 1947 तक सक्रिय उपयोग में नहीं थे, उनका वक्फ का दावा स्वतः समाप्त हो गया, और उनका स्वामित्व राज्य को प्राप्त हुआ। इस प्रकार मिर्जा-पंत समझौता भारत में पंथनिपरेक्ष संपत्ति अधिकारों का प्रथम औपचारिक स्वरूप बना। इस तथ्य का प्रमाण स्वयं भारत सरकार के संसदीय अभिलेख से भी मिलता है। संविधान और सार्वजनिक संपत्तियां संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 पांथिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं, परंतु दोनों ही अनुच्छेद यह कहते हैं कि यह अधिकार ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और विधि के अधीन’ होगा। अर्थात् यदि कोई पांथिक संस्था सार्वजनिक भूमि पर स्थित है, तो वह उसका उपयोग तो कर सकती है, परंतु उस पर स्वामित्व का दावा नहीं कर सकती। भारत का संविधान स्पष्ट करता है कि पंथनिरपेक्ष शासन में राज्य संपत्ति का स्वामी रहेगा, और मजहबी उपयोग को अनुमति का विषय माना जाएगा न कि स्वामित्व का। यही संवैधानिक सिद्धांत अल तकिया मस्ज्दि विवाद में प्रत्यक्ष रूप से लागू हुआ।

अधिग्रहण का सिद्धांत

वाराणसी में श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के दौरान सैकड़ों संपत्तियां अधिग्रहित की गईं, जिनमें कुछ पांथिक उपयोग की थीं। राज्य सरकार ने सभी को मुआवजा दिया, परंतु किसी को भी स्वामित्व वापस नहीं किया। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है, “अधिग्रहण के बाद भूमि राज्य की होती है, चाहे उस पर धार्मिक ढांचा क्यों न हो।” अल तकिया मस्जिद विवाद में भी इसी विधिक सिद्धांत का अनुपालन किया गया, जहां राज्य ने मुआवजे के साथ वैधानिक अधिग्रहण किया, और वक्फ के दावे को ‘घटना के बाद’ का माना गया।
वक्फ एक्ट न होता तो…

यह प्रश्न इस निर्णय का केंद्रीय बिंदु है। यदि 1954 का वक्फ अधिनियम अस्तित्व में न होता, तो भारत में मुस्लिम सार्वजनिक संपत्तियां स्वतः राज्य की राजस्व संपत्ति होतीं। क्योंकि संविधान और मिर्जा-पंत समझौते दोनों के अनुसार, ‘केवल सक्रिय मजहबी उपयोग वाली संपत्तियां ही मजहबी संस्था के अधिकार में रहेंगी; अन्य संपत्तियां राज्य की होंगी।’ इसलिए वक्फ एक्ट ने भारत में निष्क्रांत ट्रस्ट प्रोपर्टी बोर्ड जैसी स्थिति बनने से रोका।

संवैधानिक संतुलन

भारत का संविधान पंथनिरपेक्ष शासन की आधारशिला पर टिका है। यह राज्य को मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने देता, परंतु सार्वजनिक व्यवस्था और संपत्ति पर उसका अधिकार सुनिश्चित करता है। अल तकिया मस्जिद पर दिया गया निर्णय इसी संतुलन की मिसाल है। न्यायालय ने न तो मजहबी उपयोग को अस्वीकार किया, और न ही राज्य के स्वामित्व अधिकार को सीमित किया, बल्कि कहा कि दोनों अपने-अपने विधिक क्षेत्र में वैध हैं।

भारत का संविधान पंथनिरपेक्ष शासन की आधारशिला पर टिका है। यह राज्य को मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने देता, परंतु सार्वजनिक व्यवस्था और संपत्ति पर उसका अधिकार सुनिश्चित करता है। अल तकिया मस्जिद पर दिया गया निर्णय इसी संतुलन की मिसाल है।
Topics: याचिका (Petition)अधिग्रहण (Acquisition)वैध (Legal / Valid)विधि अनुसारविधिक प्रश्न( राजस्व अधिकारमध्य प्रदेश उच्च न्यायालयपाञ्चजन्य विशेषसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)
डी.के.दुबे
डी.के.दुबे
वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट [Read more]
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