भारत के इतिहास में ऐसे कुछ ही व्यक्तित्व हुए हैं जिनकी चेतना ने न केवल अपने समय को, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी आलोकित किया। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा उन्हीं में से एक हैं। जनजातीय अस्मिता, आत्मगौरव और स्वतंत्रता के ऐसे प्रतीक, जिनकी ज्योति आज भी उतनी ही प्रखर है जितनी उस युग में थी, जब उन्होंने अन्याय के अंधकार को चुनौती दी थी। उनका जीवन इस बात का साक्षी है कि जब कोई व्यक्ति अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने समाज के सम्मान के लिए उठ खड़ा होता है, तो उसका संघर्ष, इतिहास के साथ भविष्य की भी दिशा बदल देता है।

रक्षा राज्य मंत्री, भारत सरकार
भगवान बिरसा मुंडा का महान आंदोलन- ‘उलगुलान’ केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह नहीं था; बल्कि वह एक सभ्यता के आत्मा की पुकार था। उन्होंने यह विश्वास जगाया कि जनजाति समाज को आत्मनिर्भर होना चाहिए। जल, जंगल, जमीन और जीवनशैली के साथ संस्कृति पर उनका स्वामित्व सुरक्षित रहना चाहिए। वे चाहते थे कि जनजातीय समाज अपने शासन और न्याय के अपने ढांचे के साथ आत्मनिर्भर बने। समाज में शोषण तथा असमानता का अंत हो। उनका यह विचार न केवल राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक था, बल्कि एक नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की घोषणा थी।
धरती आबा का सपना था- एक सुवर्ण युग, जहां न्याय, समानता और आत्मनिर्भरता समाज की आधारशिला हों। यह दृष्टि केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि आज के भारत के लिए भी मार्गदर्शन है। भगवान बिरसा मुंडा का यह संदेश हमें यह सोचने को प्रेरित करता है कि सच्चा विकास केवल आर्थिक समृद्धि में नहीं, बल्कि उस संतुलन में है जिसमें संस्कृति, प्रकृति और मानवता एक साथ आगे बढ़ते हैं।
15 नवंबर, 2024 को जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भगवान बिरसा मुंडा जी की 150वीं जयंती के उत्सव का औपचारिक शुभारंभ करते हुए कहा था, ”जनजातीय समाज वही है जिसने राजकुमार राम को भगवान राम बनाया और वही समाज जिसने भारत की संस्कृति और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सदियों तक संघर्ष किया।” यह कथन इस बात का प्रमाण है कि भारत की सांस्कृतिक चेतना की जड़ें उसकी जनजातीय परंपराओं में कितनी गहराई से समाई हुई है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 127वें संस्करण (26 अक्तूबर, 2025) में कहा, ”अगले महीने की 15 तारीख को हम जनजातीय गौरव दिवस मनाएंगे। यह भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती का सुअवसर है। देश की आजादी के लिए, आदिवासी समुदाय के अधिकारों के लिए, उन्होंने जो कार्य किया वह अतुलनीय है। मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है कि मुझे झारखंड में भगवान बिरसा मुंडा जी के गांव उलिहातु जाने का अवसर मिला। मैंने वहां की माटी को माथे पर लगाकर प्रणाम किया था।” प्रधानमंत्री के ये शब्द केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक आह्वान हैं- उस परंपरा और आत्मबल को समझने का जिसने भारत की आत्मा को संरक्षित रखा है।


आज जब भारत अपने विकास के नए युग में प्रवेश कर रहा है, तब भगवान बिरसा मुंडा का संदेश और भी सार्थक व प्रासंगिक है। केंद्र सरकार द्वारा देश के जनजातीय समाज के कल्याण के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और डिजिटल संपर्क जैसी मूलभूत सुविधाएं निरंतर विस्तार पा रही हैं। प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन) योजना जैसी पहलों ने उन क्षेत्रों तक विकास की रोशनी पहुंचाई है, जो कभी उम्मीद से भी दूर थे। आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, औषधीय परंपराओं और पर्यावरणीय दृष्टि को पुनर्जीवित करने के प्रयास, नए भारत के समग्र विकास का अभिन्न हिस्सा बन रहे हैं।
भगवान बिरसा मुंडा जी की 150वीं जयंती वर्ष और जनजातीय गौरव दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर भारत सरकार द्वारा जारी स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट उनके प्रति हमारी अदम्य श्रद्धा एवं भावना का प्रतीक है। इन प्रतीकों में केवल एक इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य की प्रेरणा छिपी है। केंद्र सरकार द्वारा देश के जनजातीय बहुल जिलों में भगवान बिरसा मुंडा जनजातीय गौरव उपवन स्थापित करने की पहल यह सुनिश्चित करती है कि आने वाली पीढ़ियां उनके विचारों, संघर्षों और आदर्शों से प्रत्यक्ष परिचित हो सकें।
धरती आबा का जीवन दर्शन इसी बात की याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल शासन परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि समाज की आत्मा के जागरण का नाम है। उन्होंने यह समझाया कि जब कोई समुदाय अपनी पहचान और गरिमा के लिए संघर्ष करता है, तो वह न केवल स्वयं को, बल्कि समाज और राष्ट्र को भी ऊंचा उठाता है। उनका संदेश आज भी हमारे सामने यह प्रश्न रखता है क्या हमारा विकास मानवीय गरिमा और सांस्कृतिक संतुलन के साथ आगे बढ़ रहा है?
प्रधानमंत्री का सूत्र—सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास-धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा के आदर्शों की आधुनिक अभिव्यक्ति के समान प्रतीत होता है। यह हमें स्मरण कराता है कि सच्चे भारत के निर्माण में हर समुदाय की भूमिका अनिवार्य है।
आज जब हम उनकी 150वीं जयंती वर्ष के समापन की ओर बढ़ रहे हैं, तो यह केवल उनके अमर बलिदान का स्मरण का क्षण नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी अवसर है। यह वह अमृत बेला है जब हम सब संकल्प लें, ”हम धरती आबा के स्वप्नों के भारत को साकार करने के लिए समर्पित रहेंगे। एक सशक्त, समृद्ध और सामर्थ्यवान भारत, एक ऐसा भारत, जहां विकास और संस्कृति साथ-साथ चलें, जहां हर व्यक्ति गरिमा, समानता और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन जी सके।” धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की यह अमर गाथा, भारतीय जनमानस की आत्मा में तब तक जलती रहेगी, जब तक उनके सपनों का सुवर्ण युग पूरी तरह मूर्त रूप नहीं ले लेगा।
भगवान बिरसा मुंडा जयंती : स्वाभिमानी समाज के प्रणेता
जबलुपर में 30 अक्तूबर से 1 नवंबर तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक आयोजित हुई। इस दौरान ‘धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा का 150 वां जन्म वर्ष’ शीर्षक से एक वक्तव्य जारी किया गया। उसी को यहां प्रकाशित किया जा रहा है—
भारत के गौरवशाली स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों व योद्धाओं की एक दीर्घ परंपरा रही है और उनका योगदान अविस्मरणीय रहा है। भगवान बिरसा मुंडा का इस स्वतंत्रता संग्राम के श्रेष्ठतम नायकों, योद्धाओं में विशेष स्थान है। 15 नवंबर, 1875 को उलीहातु (झारखंड) में जन्मे भगवान बिरसा का यह 150 वां जन्म वर्ष है। अंग्रेजों और उनके प्रशासन द्वारा जनजातियों पर किए जा रहे अत्याचारों से त्रस्त होकर उनके पिता उलीहातु से बंबा जाकर बस गए। लगभग 10 वर्ष की आयु में उन्हें चाईबासा मिशनरी स्कूल में प्रवेश मिला। मिशनरी स्कूलों में जनजाति छात्रों को उनकी धार्मिक परंपराओं से दूर कर ईसाई मत में कन्वर्ट करने के षड्यंत्र का उन्हें अनुभव आया। कन्वर्जन से न केवल व्यक्ति की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक चेतना अवरुद्ध होती है, बल्कि धीरे-धीरे समाज की अस्मिता भी नष्ट हो जाती है। केवल 15 वर्ष की आयु में ईसाई मिशनरियों के षड्यंत्रों को समझते हुए उन्होंने समाज जागरण के द्वारा अपनी धार्मिक अस्मिता और परम्पराओं की रक्षा के लिए संघर्ष प्रारंभ कर दिया।
मात्र 25 वर्ष की आयु में भगवान बिरसा ने उनके समाज में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की लहर पैदा कर दी, जो स्वयं विकट परिस्थितियों से ग्रस्त था। ब्रिटिश शासन द्वारा प्रशासनिक सुधार के नाम पर वनों का अधिग्रहण करते हुए जनजातीय समाज से भूमि का स्वामित्व छीनना तथा जबरन श्रम नीतियां लागू करने के विरोध में भगवान बिरसा ने व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया। उनके आंदोलन का नारा ‘अबुआ दिशुम-अबुआ राज’ (हमारा देश-हमारा राज) युवाओं के लिए एक प्रेरणा मंत्र बन गया, जिससे हजारों युवा ‘स्वधर्म’ और ‘अस्मिता’ के लिए बलिदान देने हेतु प्रेरित हुए। जनजातियों के अधिकारों, आस्थाओं, परंपराओं और स्वधर्म की रक्षा के लिए भगवान बिरसा ने अनेक आंदोलन व सशस्त्र संघर्ष किए। अपने पवित्र जीवन लक्ष्य के लिए संघर्ष करते हुए वे पकड़े गए और मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में कारागार में दुर्भाग्यपूर्ण और संदेहास्पद परिस्थिति में उनका बलिदान हुआ।
समाज के प्रति अपने प्रेम और बलिदान के कारण संपूर्ण जनजाति समाज उन्हें देव स्वरूप मानकर धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा कहकर श्रद्धान्वत होता है। भारत सरकार ने संसद भवन परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित कर उनका समुचित सम्मान किया है। प्रतिवर्ष 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा का जन्मदिन ‘जनजाति गौरव दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। उनका बलिदान स्वाधीनता संघर्ष में जनजातियों के महती योगदान का उदाहरण बनते हुए संपूर्ण राष्ट्र के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया है। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परम्परा, स्वाभिमान और जनजातीय समाज की अस्मिता की रक्षा हेतु भगवान बिरसा मुंडा के जीवन का संदेश आज भी प्रासंगिक है।
वर्तमान काल में विभाजनकारी विचारधारा के लोगों द्वारा भारत के संदर्भ में जनजाति समुदाय को लेकर एक भ्रांत और गलत विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे समय में भगवान बिरसा मुंडा के धार्मिक और साहसिक पराक्रम की गाथाएं अनेकानेक भ्रांतियों को दूर करते हुए समाज में स्वबोध, आत्मविश्वास और एकात्मता को दृढ़ करने में सदैव सहायक सिद्ध होंगी। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयंसेवकों सहित संपूर्ण समाज को आवाहन करता है कि भगवान बिरसा मुंडा के जीवन-कर्तृत्व और विचारों को अपनाते हुए ‘स्व बोध’ से युक्त संगठित और स्वाभिमानी समाज के निर्माण में महती भूमिका का निर्वहन करें।

















