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इंदौर में दत्त जयंती उत्सव बना अध्यात्म और संस्कारों का महाकुंभ, देश-विदेश से पहुंचे भक्त

अखिल भारतीय त्रिपदी परिवार, इंदौर और श्री शांतिपुरुष सेवा संस्थान, नागपुर के सहयोग से श्री दत्त जयंती हीरक जयंती और डॉ. बाबासाहेब तराणेकर अमृत महोत्सव का अनूठा उत्सव 24, 25 और 26 अक्टूबर को इंदौर के आनंद मांगलिक भवन मैदान में आयोजित किया गया।

Written byचारुदत्त कहूचारुदत्त कहू — edited by Mahak Singh
Nov 3, 2025, 03:59 pm IST
inमध्य प्रदेश
कार्यक्रम

कार्यक्रम

अखिल भारतीय त्रिपदी परिवार, इंदौर और श्री शांतिपुरुष सेवा संस्थान, नागपुर के सहयोग से श्री दत्त जयंती हीरक जयंती और डॉ. बाबासाहेब तराणेकर अमृत महोत्सव का अनूठा उत्सव 24, 25 और 26 अक्टूबर को इंदौर के आनंद मांगलिक भवन मैदान में आयोजित किया गया। इस समारोह के अवसर पर अखिल भारतीय त्रिपदी परिवार में निहित एकता की भावना, श्री करुणात्रिपदी प्रार्थना का महत्व, श्री गुरु दत्तात्रेय संप्रदाय की अनुकरणीय कार्य पद्धति, गुरु के प्रति प्रेम और भक्ति, अपनत्व की भावना, यज्ञ की पवित्रता, कार्यक्रम का सुव्यवस्थित आयोजन, अनुशासन के साथ-साथ आध्यात्मिकता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन के लिए कर्मयोगी बाबा महाराज का मार्गदर्शन, उनकी सुशिक्षित पत्नी जयश्री तराणेकर का प्रबंधन कौशल और तराणेकर परिवार का आतिथ्य एक बार फिर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। समारोह में देश-विदेश से साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा, धर्म, राजनीति और सामाजिक कार्यों के जानकार लोगों की भागीदारी ने सभी का ध्यान आकर्षित किया।

इंदौर में हुआ संस्कारों का सम्मान

समाज से आध्यात्म लुप्त हो रहा है, लोगों की ईश्वर के प्रति आस्था कम हो रही है, युवा पीढ़ी ईश्वर, देश, धर्म और गुरु-शिष्य परंपरा से दूर होती जा रही है, संतों का सम्मान दिनों-दिन कम होता जा रहा है, महिलाओं को परिवारों में उचित स्थान नहीं मिल रहा है, सामाजिक परिवर्तन को समाज स्वीकार करने को तैयार नहीं है, सामाजिक कार्यों के लिए कोई पहल नहीं हो रही है, दिव्यांगों की उपेक्षा हो रही है, गौमाता का सम्मान नहीं हो रहा है, भारतीय परिधान की उपेक्षा हो रही है और माथे पर कुमकुम-तिलक लगाने को पिछड़ापन माना जा रहा है, इंदौर में आयोजित इस समारोह ने ऐसी सोच रखने वाले और इन मुद्दों पर चिल्लाने वाले लोगों को आईना दिखाया है। मुझे भी इस समारोह का साक्षी बनने का अवसर प्राप्त हुआ। इस अवसर पर समयानुरूप बदलाव को स्वीकृत करनेवाले त्रिपदी परिवार के सदस्यों की सराहना करना उचित होगा।

दत्त जयंती उत्सव के 75 वर्ष पूर्ण

गुरुचरित्र प्रेरित दत्त सम्प्रदाय में श्री वासुदेवानंद सरस्वती का दत्तावतार के रूप में पूजन किया जाता है। गुजरात में नर्मदा तट पर स्थित उनका गरुड़ेश्वर स्थान विश्व प्रसिद्ध है। उज्जैन में दण्डग्रहण करने के बाद उन्होंने उज्जैन के निकट तराना नामक गांव में पहली दत्त प्रतिमा स्थापित की थी। श्री शंकर शास्त्री (नाना महाराज के पिता) और तत्पश्चात नाना महाराज को मंत्रदीक्षा दी थी। तराणेकर परिवार में दत्त पूजा 131 वर्षों से चली आ रही है। 1950 में, उन्होंने इंदौर के हरसिद्धि स्थित अपने निवास पर दत्त जयंती का उद्घाटन किया, जिसमें गुरुचरित्र का पाठ और सामूहिक सत्यनारायण का एक छोटा सा आयोजन किया गया। बाद में इस उत्सव ने सामूहिक रूप ले लिया और पिछले २५ वर्षों से यह उत्सव अखिल भारतीय त्रिपदी परिवार की देशभर की सभी शाखाओं और नाना महाराज की स्मृति में निर्मित १८ स्थानों पर मनाया जाता है। इस उत्सव को 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य दिव्य समारोह में राजस्थान के इटालखेड़ी से सुगंधेश्वरी देवी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी समिति के सदस्य श्री भैयाजी जोशी, राष्ट्र सेविका समिति की मुख्य संचालिका वंदनीय शांताक्का, मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय और बालाघाट से परमहंस यति श्री नरसिंह सरस्वती स्वामीजी उपस्थित थे।

नाना महाराज तराणेकर द्वारा स्थापित अखिल भारतीय त्रिपदी परिवार दत्त साधना का प्रमुख केंद्र

अखिल भारतीय त्रिपदी परिवार दत्त सम्प्रदाय में एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावशाली आध्यात्मिक परिवार माना जाता है। इस परिवार की स्थापना नाना महाराज तराणेकर ने की थी। वे स्वयं एक महान विद्वान, संत पुरुष एवं भगवान दत्तात्रेय की आराधना में पूर्णतः लीन रहनेवाले महापुरुष थे। उन्होंने दत्तात्रेय की आराधना को जन-जन तक पहुँचाने तथा साधना को सरल एवं सुगम बनाने का प्रयास किया। उन्होंने भक्तों को त्रिपदी के सिद्धान्तों, अर्थात् दत्तात्रेय की आराधना के तीन चरणों – श्रद्धा, भक्ति और साधना – पर आधारित साधना की शिक्षा दी। दत्त सम्प्रदाय की सुदृढ़ नींव रखकर उन्होंने दत्त की महिमा का सर्वत्र प्रसार किया।

गुरु परम्परा के सच्चे संवाहक: बाबा महाराज तराणेकर

इस परिवार के वर्तमान प्रमुख, बाबा महाराज तराणेकर, नाना महाराज के उत्तराधिकारी हैं और उन्होंने गुरु परम्परा की विरासत को बड़ी श्रद्धा और समर्पण के साथ आगे बढ़ाया है। दत्त सम्प्रदाय का देशभर में प्रचार-प्रसार करके उन्होंने अनेक लोगों को आध्यात्मिक जीवन का मार्ग दिखाया है। उनके उपदेशों और साधना मार्गदर्शन से असंख्य भक्तों को जीवन में स्थिरता, शान्ति और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग मिला है। पूर्व सरकारी अधिकारी और भू-विज्ञान के विशेषज्ञ बाबा महाराज, नाना महाराज के पौत्र हैं। उन्होंने बचपन से ही अपने दादा की अपने गुरु, दत्तावतार परमहंस परिव्राजकाचार्य वासुदेवानंद सरस्वती टेंबेस्वामी महाराज के प्रति अटूट भक्ति और दत्त सम्प्रदाय के प्रति उनके अत्यधिक सम्मान का अनुभव किया है।

सेवा, साधना और समर्पण की जीवित परम्परा

त्रिपदी परिवार दत्त भक्ति का एक जीवन्त सूत्र है। नाना महाराज और बाबा महाराज के माध्यम से, दत्त भक्ति केवल पूजा या अनुष्ठान तक सीमित न रहकर, जीवन जिने की एक पद्धति बन गई है। त्रिपदी परिवार ने गुरु सिद्धान्त के साथ-साथ सेवा, साधना और समर्पण की ठोस शिक्षा दी है, जिसके कारण इस परिवार को दत्त सम्प्रदाय में एक विशिष्ट, आदरणीय स्थान प्राप्त हुआ है। बाबा महाराज वेदों और संत साहित्य सहित अनेक विषयों में पारंगत हैं। उनकी साहित्यिक सम्पदा प्रचुर है। उन्होंने अनेक यज्ञों और यागों का सफल आयोजन किया है और भक्तों को उससे प्राप्त सामूहिक आनंद का लाभ मिला है। वे दत्त याग, गणेश याग, विष्णु याग, धन्वंतरि याग और गोवर्धन याग के आचार्य पद पर आसीन रहे हैं। उन्होंने न केवल यह कहा कि स्त्रियों को भी तर्पण अर्थात श्राद्ध करने का अधिकार है, बल्कि इसे कर्म द्वारा आचरण में भी उतारा। इससे अनेक बालिकाओं, विधवाओं और विवाहित स्त्रियों के लिए श्राद्ध कर्म करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। बाबा महाराज ने आदिवासी भक्तों द्वारा सप्तशती गुरुचरित्र की सेवा भी कराई है।

भव्य दिव्य कार्यक्रमों की योजना बनाना और उनका सफल क्रियान्वयन करना यह अखिल भारतीय त्रिपदी परिवार की विशेषता है। ऐसे अनेक कार्यक्रमों के गोवर्धन पर्वत का बीड़ा इस परिवार ने उठाया है। वर्ष २०१२ में नागपुर में आयोजित चैतन्य पीठ लोकार्पण समारोह की विशिष्टता आज भी स्मृति में बनी हुई है। बीआरए मुंडले स्कूल के प्रांगण में आयोजित विविध कार्यक्रम और संत यात्रा ने उस समय सभी नागपुरवासियों का ध्यान आकर्षित किया था। नाना महाराज तराणेकर की १२५वीं जयन्ती के अवसर पर इन्दौर में आयोजित विविध कार्यक्रम आज भी मनःपटल पर चिह्नित है। त्रिपदी परिवार के कार्यक्रमों की समयबद्धता, आने-जाने वालों की व्यक्तिगत पूछताछ, भक्तों की सामूहिक भागीदारी और महिलाओं को दिया जानेवाला सम्मान हमेशा चर्चा का विषय रहता है। यह आश्चर्य की बात होती यदि यह इन्दौर के कार्यक्रम में भी यह चर्चा का विषय न रहा होता। बाबासाहेब के अमृत महोत्सव और दत्त जयन्ती की हीरक जयन्ती के अवसर पर ७५० बहनों द्वारा की गई सामूहिक सत्यनारायण पूजा और नाना महाराज की राजोपचार पूजा के दौरान महिलाओं द्वारा किए गए सामूहिक रुद्राभिषेक ने मातृशक्ति को बल प्रदान किया।

दत्त जयंती हीरक महोत्सव का वैश्विक उत्सव

त्रिपदी परिवार की देश-विदेश में ३५० शाखाएं हैं और नाना महाराज द्वारा शुरू किए गए दत्त जयन्ती महोत्सव की हीरक जयंती के अवसर पर उन सभी में बड़े पैमाने पर दत्तयाग सम्पन्न हुए। सामान्यतः याग, यज्ञ, रुद्र, महारुद्र इन धार्मिक आयोजनों को एक खर्चीला कार्यक्रम मानकर अनदेखा कर दिया जाता है अथवा उसे एक अनावश्यक धार्मिक अपव्यय के रूप में टाला जाता है। लेकिन बाबा महाराज, जिनके कंधों पर आज त्रिपदी परिवार का दायित्व है, उन्होंने आह्वान किया और विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों के असंख्य भक्तों ने अपने-अपने निवास पर दत्तयाग, दान-दक्षिणादि अनुष्ठान और पारिवारिक भोजन का आयोजन किया और पूरे मन से भगवान दत्तात्रेय की पूजा की। इस अवसर पर, न केवल भारत के विभिन्न शहरों में बल्कि इंग्लैंड, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी भक्तों द्वारा ५०० से अधिक दत्तयाग सफलतापूर्वक किए गए। किसी भी कार्य का धार्मिक आधार होना आवश्यक है, और त्रिपदी परिवार के कार्यक्रमों में इस ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। दत्त जयन्ती हीरक महोत्सव के उपलक्ष्य में यति पूजा का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को कंठस्थ करनेवाले ब्राह्मणों को सम्मानित किया गया। बाबा महाराज को ११५ विभिन्न वस्तुओं से तौला गया और प्राप्त वस्तुओं को अभावग्रस्त सामाजिक संगठनों को दान कर दिया गया। आध्यात्मिक कार्य के अन्तर्गत गोवत्स धेनु का भी दान किया गया।

इस अवसर पर पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पद्मभूषण सुश्री सुमित्रा महाजन ने कहा कि यह कार्यक्रम ज्ञान और विज्ञान के बीच एक सेतु है और डॉ. बाबासाहेब इसके प्रतीक हैं। राष्ट्र सेविका समिति की मुख्य संचालिका शांताक्काजी ने सामूहिक सत्यनारायण में महिलाओं की रिकॉर्ड उपस्थिति की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, ईश्वर ने श्रेष्ठ संतानों को जन्म देने की क्षमता केवल महिलाओं को ही दी है। महिलाएँ रचनात्मक होती हैं और निःस्वार्थ भाव से कार्य करती हैं। उनके मातृत्व गुण अतुलनीय हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ भारत का जीवन दर्शन है। भारत में परिवार को समाज से, समाज को राष्ट्र से और राष्ट्र को विश्व से जोड़ने की शक्ति है। उन्होंने यह भी आशा व्यक्त की कि वसुधैव कुटुम्बकम के दर्शन के माध्यम से भारत में सामाजिक समरसता का निर्माण होगा, जिससे जातिगत भेदभाव समाप्त होगा।

वैदिक ज्ञान से ही समाज में संतुलन और सज्जनों की सक्रियता से ही राष्ट्र का उत्थान संभव

वैदिक ज्ञान, विज्ञान से श्रेष्ठ है। इसका प्रमाण हमने अनेक बार देखा है। पिछले कुछ वर्षों में, जब उज्जैन में सूखा पड़ा या वर्षा कम हुई, तो नगरवासियों ने यज्ञादि कार्यक्रम किए। परिणामस्वरूप, पूरे क्षेत्र में अच्छी वर्षा होने लगी, ऐसा स्वामी रंगनाथाचार्यजी महाराज ने कहा। उन्होंने आगे कहा कि समाज में दिखावे की प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। विवाह सबसे महंगा आयोजन बन गया है। ये सब पाश्चात्य अंधानुकरण का दुष्परिणाम है। दूसरी ओर, समाज गोमाता के प्रति उदासीन हो गया है। नदियाँ, नालों में परिवर्तित हो रही हैं। जंगलों को बेरहमी से काटा जा रहा है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। बच्चों को शिक्षा के माध्यम से मूल्यों की एक मूल्यवान विरासत मिले, यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है और साथ ही उन्हें भौतिकवादी जीवनशैली से दूर रखने की भी आवश्यकता है। अहंकारी प्रवृत्तियाँ अनावश्यक युद्धों को जन्म दे रही हैं। इस प्रकार की चीजों को रोकने की आवश्यकता है, इस ओर भी महाराजजी ने ध्यान आकर्षित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य भैयाजी जोशी के शुभहस्ते बाबा महाराज के जीवन पर प्रकाश डालनेवाली एक पुस्तक का विमोचन किया गया। हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल वी.एस. कोकजे, सांसद शंकर लालवानी और इन्दौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव इस दौरान मंच पर उपस्थित थे।

इस अवसर पर बोलते हुए, भैयाजी जोशी ने कहा कि बाबासाहेब को अपने दादा नाना महाराज से संस्कार विरासत में मिले थे। गुरु दत्तात्रेय के चित्र में हम एक गाय और एक कुत्ते को देखते हैं। गाय प्रेम का प्रतीक है, जबकि कुत्ता सावधानी का प्रतीक है। इसलिए, व्यक्ति को हमेशा सतर्क रहना चाहिए। यह समझाते हुए कि आज के समय में सज्जनों का शक्तिशाली बनना और शक्तिशाली लोगों का सज्जनता के मार्ग पर चलना बहुत आवश्यक है, भैयाजी ने यह भी कहा कि सज्जनों की निष्क्रियता समाज के लिए हानिकारक है।

तीन दिवसीय धार्मिक कार्यक्रमों का समापन सामूहिक दत्तयाग के साथ हुआ। नृत्य और कीर्तन ने भक्तों के आनंद को दोगुना कर दिया। आनंद मांगलिक भवन के प्रांगण में बनाए गए भव्य तम्बू में आध्यात्मिक और दिशात्मक कार्यक्रमों से विराम मिलने पर, सभी आयु के भक्त गुरु से मिलने के लिए स्नेहलतागंज स्थित नाना महाराज के निवास पर दौड़ते हुए दिखाई दिए। आज भी, नाना महाराज के स्नेहलतागंज स्थित निवास पर उनका बिस्तर नित्य लगाया जाता है। उस पर सफेद चादर प्रतिदिन बदली जाती है। उस परिसर में प्रतिदिन भजन और कीर्तन के कार्यक्रम होते हैं। करुणा त्रिपदी के शब्द भी इस क्षेत्र में निरन्तर सुनाई देते हैं। भक्त आज भी नाना के आशीर्वाद के लिए आतुर दिखाई देते हैं। उनका मंत्र-दीक्षा का कार्य आज बाबा महाराज द्वारा एक परम्परा के रूप में चलाया जा रहा है। नाना के प्रति न केवल उनकी अटूट श्रद्धा है, बल्कि पूरे त्रिपदी परिवार का नाना के आशीर्वाद के प्रति प्रेम तनिक भी कम नहीं हुआ है। ‘नाना! बारबार दर्शन के लिए बुलाओ नाना!’ यह नाना महाराज का दर्शन करके लौटते हुए गुरु-बहन के मुख से निकली भावपूर्ण पुकार, नाना महाराज के प्रति उनकी अटूट आस्था को प्रकट करती है। कार्यक्रम की सफलता के बाद, अनके मुख से अनायास ही ‘नाना, नाना, कृपा करा, श्रीपाद वल्लभ दिगम्बरा’ यह शब्द निकल पड़ते हैं।

Topics: Dutt SampradayaIndore NewsShri Dutt Jayanti Diamond Jayanti IndoreAll India Tripadi FamilyBaba Maharaj TaranekarNana Maharaj TaranekarDr. Babasaheb Taranekar Amrit Mahotsav
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