मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला एक बार फिर धार्मिक और कानूनी बहस के केंद्र में आ गई है। इस ऐतिहासिक स्थल के धार्मिक स्वरूप को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है, जिसकी सुनवाई वर्तमान में हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में जारी है। एक पक्ष इसे प्राचीन सरस्वती मंदिर मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे मस्जिद के रूप में देखता है। इसी विवाद को लेकर दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क अदालत के सामने रख रहे हैं।
हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान मंदिर पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील मनीष गुप्ता ने विस्तार से अपने पक्ष को प्रस्तुत किया। उन्होंने इस्लामिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी जमीन पर जबरन कब्जा करके मस्जिद का निर्माण किया गया हो, तो उसे इस्लाम में भी वैध नहीं माना जाता। उन्होंने हदीस का उल्लेख करते हुए बताया कि इस्लाम न्यायपूर्ण तरीके से प्राप्त भूमि पर ही धार्मिक निर्माण की अनुमति देता है। उनके अनुसार, यदि भोजशाला की भूमि पर कभी बलपूर्वक निर्माण हुआ है, तो वह इस्लामिक मान्यताओं के विरुद्ध होगा।
मनीष गुप्ता ने हिंदू धार्मिक मान्यताओं का भी जिक्र करते हुए कहा कि जिस स्थान पर एक बार मंदिर स्थापित हो जाता है, वह सदा मंदिर ही रहता है। उन्होंने दावा किया कि भोजशाला मूल रूप से मां सरस्वती का मंदिर था और आज भी उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। अपने तर्कों को मजबूत करने के लिए उन्होंने ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों का सहारा लिया। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित वाग्देवी (सरस्वती) की एक प्रतिमा पर अंकित शिलालेख से यह संकेत मिलता है कि इसका निर्माण राजा भोज के काल में हुआ था। इसके अतिरिक्त, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट में भी स्थल पर देवी-देवताओं की मूर्तियां, नक्काशी और हवन कुंड जैसे अवशेष मिलने की बात कही गई है, जो मंदिर होने की ओर इशारा करते हैं। वर्तमान में इस मामले से जुड़ी चार याचिकाएं और एक अपील हाई कोर्ट में विचाराधीन हैं, जिन पर एक साथ सुनवाई हो रही है। आने वाले दिनों में अन्य याचिकाकर्ताओं के तर्क भी अदालत के सामने रखे जाएंगे।
















