कभी-कभी कोई घटना छोटी दिखती है… लेकिन उसका असर बहुत गहरा होता है। केरल में हुआ एक अनूठा निकाह — जहाँ दूल्हा और दुल्हन ने संविधान को गवाह और बराबरी को आधार बनाया! हसन और असीना ने धार्मिक रस्मों के साथ भारतीय संविधान की प्रस्तावना पढ़कर और एक-दूसरे को संविधान की प्रति उपहार में देकर शादी रचाई। यह सिर्फ एक शादी नहीं — यह संदेश है कि मजहब और संवैधानिक अधिकार साथ-साथ चल सकते हैं। क्यों इस शादी ने कट्टरपंथ को चुनौती दी? कौन से संवैधानिक प्रावधानों से कुछ मजहबी समूह असहज होते हैं? मुस्लिम महिलाओं को संविधान कैसे देता है समान अधिकार? इस अंक में संपादक हितेश शंकर ने केरल की अनोखे निकाह की परख की है. 👉 यह निकाह एक पुकार है… कि हम भारत के लोग — आस्था के साथ-साथ समानता, स्वतंत्रता और बंधुता को भी निभाएँ!
















