तो, 'काफिर' है Pakistan! तालिबान ने बम से उड़ाया 'दोस्ती का दरवाजा', कहा-कोई रिश्ता नहीं रखेंगे 'काफिरों' से!
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तो, ‘काफिर’ है Pakistan! तालिबान ने बम से उड़ाया ‘दोस्ती का दरवाजा’, कहा-कोई रिश्ता नहीं रखेंगे ‘काफिरों’ से!

तस्वीर यही बता रही है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते अब काफी खटास भरे हो चले हैं जो आगे बढ़कर खुले टकराव की दिशा में जा सकते हैं

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Oct 16, 2025, 12:17 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
तालिबान सैनिकों ने इसी चमन सीमा द्वार को आईईडी धमाके से उड़ाया और कई पाकिस्तानी फौजियों को पकड़ा है (File Photo)

तालिबान सैनिकों ने इसी चमन सीमा द्वार को आईईडी धमाके से उड़ाया और कई पाकिस्तानी फौजियों को पकड़ा है (File Photo)

मीडिया में खबरें भले ही अफगानिस्तान और जिन्ना के देश के बीच संघर्षविराम की आ रही हैं, लेकिन दोनों के बीच तनाव कम होने के आसार फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं। खासकर सोशल मीडिया में आई जानकारी के अनुसार, कल जिस प्रकार तालिबान सैनिकों ने चमन सीमा द्वार को आईईडी धमाके से उड़ाया और कई पाकिस्तानी फौजियों को पकड़ा है, उससे लगता नहीं कि संघर्ष थमने वाला है। चमन स्थित ‘दोस्ती का दरवाजा’ चकनाचूर करने के बाद, तालिबान सैनिकों की तरफ से बयान दिया गया कि हमें ‘काफिरों’ से कोई नाता नहीं रखना है। जिन्ना के उस देश को ‘काफिर’ यानी ‘ईमान में यकीन न रखने वाला’ कहना सीधे सीधे उसका घोर ‘अपमान’ ही कहा जाएगा, जो खुद को मुस्लिम जगत का स्वयंभू खलीफा कहकर शेखी बखारता है। भले ही शर्म अल शेख में परसों उसका प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने उसकी तारीफों के पुल बांधते हुए सभी मर्यादाएं तोड़कर बिछ—बिछ गया था।

ऐतिहासिक, राजनीतिक और कारोबारी दृष्टिकोण से दोनों देशों के बीच वर्तमान संघर्ष कई मायने रखता है। तोड़ गया चमन सीमा द्वार न केवल लोगों की आवाजाही और कारोबार का रास्ता था, बल्कि दोनों देशों के बीच ‘दोस्ती’ और ‘रणनीतिक सहयोग’ का प्रतीक भी बताया जाता था। परंतु कल तालिबान ने जिस प्रकार इस द्वार को बम से उड़ाया है उससे सीधा संकेत जाता है कि ‘काफिर’ पाकिस्तान की अब तालिबान की नजरों में कोई इज्जत नहीं बची है। यह कदम दोनों देशों के संबंधों में आए तनाव की गहराई को दर्शाता है।

चमन सीमा बलूचिस्तान (पाकिस्तान) और अफगानिस्तान के कंधार प्रांत को जोड़ती है। यह द्वार न केवल व्यापार के लिए अहम था, बल्कि अमेरिका और नाटो सेनाओं के यहां जमे होने के दौरान अफगानिस्तान में सप्लाई के लिए भी इसका इस्तेमाल होता था। पाकिस्तान के लिए यह द्वार अफगानिस्तान में अपनी ‘रणनीतिक जरूरत’ बनाए रखने का जरिया भी रहा है।

दोनों देशों के बीच इस दरवाजे को बार-बार बंद और फिर से खोलने की प्रक्रिया चलती रही है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ एक दरवाजे के टूटने का नहीं है, बल्कि ये दोनों देशों के बीच विश्वास की अंतिम डोर के टूटने जैसा लगता है।

पाकिस्तान की ओर से वहां हवाई हमले करना स्थिति की गंभीरता को दिखाता है

तालिबान का यह कहना कि ‘हमें काफिरों से कोई रिश्ता नहीं रखना’, यह जिन्ना के मजहबी देश को सीधे तौर पर ‘काफिर’ करार देने के साथ ही मुस्लिम जगत में उसकी स्थिति को भी गहरा आघात पहुंचाने वाला है। यह बयान केवल मजहबी कट्टरता नहीं है, बल्कि तालिबान की राजनीतिक सोच और सत्ता में बने रहने की इच्छा को भी दर्शाता है।

उल्लेखनीय है कि जिन्ना के देश ने कभी खुलकर यह न स्वीकार किया हो, लेकिन इसी देश ने 1990 के दशक में तालिबान को सहयोग देकर सत्ता में लाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। लेकिन अब दूसरी बार तालिबान के सत्ता में आने के बाद से वहां की हुकूमत स्वतंत्र रूप से फैसले ले रही है और पाकिस्तान के प्रभाव को पूरी तरह नकार रही है।

दरअसल तालिबान-पाकिस्तान के बीच तनाव की कुछ वजहें हैं। उनमें से प्रमुख हैं, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को लेकर पाकिस्तान लंबे समय से अफगान तालिबान पर आरोप लगाता रहा है। उसका यही आरोप रहा है कि अफगान तालिबान टीटीपी को अपने यहां शरण देते हैं, जो पाकिस्तान में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देती है।

दूसरे, पाकिस्तान डूरंड रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है, लेकिन अफगानिस्तान इसे बिल्कुल स्वीकार नहीं करता। तालिबान ने भी अब तक इसे मान्यता नहीं दी है। चमन सीमा पर अक्सर इसी मुद्दे को लेकर झड़पें होती रही हैं।

तीसरे, पाकिस्तान की अफगानिस्तान में रणनीतिक विफलता उसे मुंह चिढ़ा रही है।पाकिस्तान ने तालिबान को सत्ता में आने के लिए रणनीतिक समर्थन तो दिया, लेकिन सत्ता में आने के बाद वह उसे अपनी सेना की कठपुतली बनाकर नहीं रख पाया। इसका उसे बहुत मलाल है, क्योंकि तालिबान नेता अब पाकिस्तान के खिलाफ बोलने और कार्रवाई करने से बिल्कुल भी नहीं हिचकते। गत दिनों भारत आए अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी ने भी पाकिस्तान को सही रास्ते पर आने की सलाह दी।

बहरहाल, तालिबान द्वारा चमन सीमा द्वार उड़ाने और पाकिस्तानी सैनिकों को पकड़ने के बाद पाकिस्तान की ओर से कल रात वहां हवाई हमले करना स्थिति की गंभीरता को दिखाता है। यह कदम सिर्फ सैन्य जवाब नहीं, बल्कि पाकिस्तान की कूटनीतिक बेचारगी और बढ़ती हुई कसमसाहट को दर्शाता है। इन हवाई हमलों का एक अन्य पहलू यह भी हो सकता है कि पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दिखाना चाहता है कि वह अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के प्रति ‘गंभीर’ है।

भारत के लिए यह स्थिति रणनीतिक दृष्टि से लाभकारी हो सकती है। एक ओर पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति कमज़ोर हो रही है, दूसरी ओर तालिबान का व्यवहार उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग कर रहा है।

उधर इस स्थिति से चीन का चिंतित होना साफ समझा जा सकता है। उसने CPEC में अरबों डॉलर का निवेश किया हुआ है। तालिबान-पाकिस्तान तनाव से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है, जो चीन के लिए स्वाभाविक ही चिंता का विषय बनेगी।

फिलहाल तो तस्वीर यही बता रही है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते अब काफी खटास भरे हो चले हैं जो आगे बढ़कर खुले टकराव की दिशा में जा सकते हैं।
शायद यह पाकिस्तान की उस रणनीतिक भूल का नतीजा है जिसमें उसने सोचा था कि तालिबान हमेशा उसकी कठपुतली की तरह उसके इशारों पर नाचेगा। परंतु कट्टरपंथ की राजनीति में माहिर पाकिस्तान के अपरिपक्व नेता समझ की बात कर भी नहीं सकते हैं। रणनीति में माहिर तालिबान के नेता यह बखूबी जानते हैं।

Topics: अफगानिस्तानislamicतालिबानChaman Borderचमन सीमाpakistan afghanistan tensionपाकिस्तान अफगानिस्तान जंगपाक अफगान जंगपाकिस्तानshahbaz shariftaliban
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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