झारखंड आज एक ऐसे अत्यंत संवेदनशील चौराहे पर खड़ा है, जहाँ का संकट केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था या चुनावी जोड़-तोड़ तक सीमित नहीं रह गया है। यह विषय सीधे तौर पर भारत की सीमा सुरक्षा, हमारी नागरिकता की पवित्रता, मतदाता सूची की शुचिता और अंततः राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। दुर्भाग्य से, राज्य की वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार इस गंभीर राष्ट्रीय संकट के प्रति या तो पूरी तरह आँखें मूंदे बैठी है या फिर राजनीतिक लाभ के लिए इसे अनदेखा कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में संथाल परगना से लेकर राज्य के शहरी औद्योगिक केंद्रों तक अवैध घुसपैठ का दायरा जिस तेज़ी से फैला है, उसने यह साबित कर दिया है कि राज्य में डेमोग्राफी बदलाव (जनसांख्यिकी परिवर्तन) का एक संगठित खेल चल रहा है।
हेमंत सरकार की लचर व्यवस्था और 19 फर्जी पासपोर्ट का खुलासा
हाल ही में (सितंबर 2026) रांची स्थित क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय से सामने आया मामला राज्य सरकार के खुफिया और पुलिस तंत्र की घोर विफलता को उजागर करता है। जनवरी से अगस्त 2026 के बीच 19 ऐसे मामले पकड़े गए, जहाँ विदेशी नागरिकों ने भारत के फर्जी दस्तावेजों के बल पर भारतीय पासपोर्ट हासिल कर लिए।
इनमें से सबसे अधिक 9 मामले जमशेदपुर से सामने आए, जबकि धनबाद, रांची, बोकारो और साहिबगंज जैसे संवेदनशील जिलों से भी फर्जीवाड़े की पुष्टि हुई। जमशेदपुर से गिरफ्तार अफगान नागरिक (मोहम्मद इब्राहिम) सहित असलम और आसिल खान जैसे नाम यह बताने के लिए काफी हैं कि पिछले 26 वर्षों से विदेशी नागरिक बिना किसी खौफ के यहाँ अवैध रूप से रह रहे थे। सवाल यह उठता है कि स्थानीय पुलिस, पंचायत और निकाय स्तर के अधिकारी इतने सालों तक क्या कर रहे थे? जन्म प्रमाणपत्र, पैन कार्ड और आधार कार्ड जैसे मूल दस्तावेज किस प्रशासनिक शह पर तैयार हो गए? यदि कोई विदेशी नागरिक भारतीय पासपोर्ट तक पहुँच जाता है, तो यह हेमंत सोरेन सरकार के पूरे सत्यापन तंत्र के खोखलेपन को दर्शाता है।
मतदाता सूची में सेंध: लोकतंत्र पर सीधा प्रहार
फर्जी पासपोर्ट के साथ-साथ जमशेदपुर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान तीन अफगान नागरिकों के नाम प्रारूप मतदाता सूची में पाए जाना एक बड़ा झटका है। जब विदेशी नागरिकों के नाम भारत की मतदाता सूची में दर्ज होने लगें, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं रह जाती। यह लोकतंत्र के साथ सीधा खिलवाड़ है। आखिर किसके दबाव या लापरवाही के कारण विदेशी नागरिकों को मताधिकार देने की कोशिश की गई? क्या राज्य प्रशासन वोट बैंक को साधने के चक्कर में राष्ट्रीय पहचान पत्र बांटने का माध्यम बन चुका है?
संथाल परगना: ‘जमीन जिहाद’ और हाईकोर्ट में राज्य सरकार का ढुलमुल रवैया
संथाल परगना (साहिबगंज, पाकुड़, दुमका, गोड्डा, जामताड़ा और देवघर) में बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण स्थानीय आदिवासी आबादी की हिस्सेदारी में भारी गिरावट आई है। यहाँ भूमि पर अवैध कब्जे, ‘जमीन जिहाद’ और ‘लव जिहाद’ के मामलों की बाढ़ आ गई है। वर्ष 2024 में झारखंड उच्च न्यायालय ने जब इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए छह जिलों के उपायुक्तों को आधार, वोटर कार्ड और भूमि अभिलेखों का मिलान करने का निर्देश दिया, तब भी राज्य सरकार का रवैया निराशाजनक रहा। जहाँ केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में संथाल परगना (विशेषकर साहिबगंज और पाकुड़) में घुसपैठ की भयावहता को स्वीकार किया, वहीं राज्य के जिला प्रशासनों ने बड़े पैमाने पर घुसपैठ से इनकार करने की ढुलमुल कोशिश की। यह रवैया दर्शाता है कि सोरेन सरकार समस्या का समाधान करने के बजाय उस पर पर्दा डालने में अधिक रुचि रखती है।
फर्जी कागजातों का समानांतर उद्योग और ईडी का पर्दाफाश
जून 2026 में पाकुड़ से फर्जी जन्म प्रमाणपत्र बनाने वाले गिरोह का पकड़ा जाना और सरकारी नागरिक पंजीकरण प्रणाली जैसी नकली वेबसाइटों का इस्तेमाल सामने आना यह सिद्ध करता है कि राज्य में फर्जी दस्तावेजों का एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है। इसके अलावा, नवंबर 2024 में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा रांची और पश्चिम बंगाल के 17 ठिकानों पर की गई छापेमारी में फर्जी आधार, जाली पासपोर्ट, प्रिंटिंग मशीनें और खाली प्रपत्र बरामद हुए थे। ईडी की जांच ने स्पष्ट किया कि बांग्लादेश से मानव तस्करी और अवैध घुसपैठ कराने वाला एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है, जो घुसपैठियों को तुरंत भारतीय नागरिकता के फर्जी कागजात मुहैया कराता है।
अब आगे क्या?
झारखंड को इस सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संकट से उबारने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है जैसे कि राज्यव्यापी डिजिटल और फिज़िकल ऑडिट: जन्म प्रमाणपत्र, निवास और स्थानीय पहचान पत्र जारी करने वाले सभी सरकारी पोर्टल और स्थानीय निकायों का तुरंत डिजिटल और फॉरेंसिक ऑडिट कराया जाए। जवाबदेही तय हो: जिन अधिकारियों या कर्मचारियों के हस्ताक्षर और सत्यापन से विदेशी नागरिकों के आधार, पैन या वोटर आईडी बने हैं, उन पर सख्त देशद्रोह और आपराधिक मामले दर्ज किए जाएं। हाईकोर्ट के निर्देशों का समयबद्ध पालन: संथाल परगना के 6 जिलों सहित पूरे राज्य में भूमि रिकॉर्ड (RoR), मतदाता सूची और आधार का मिलान कर अवैध नागरिकों की पहचान की जाए।
कड़ा कानून और विशेष टास्क फोर्स: राज्य में घुसपैठियों द्वारा आदिवासियों की जमीनों पर किए जा रहे अवैध कब्जों को छुड़ाने के लिए सख्त कानून बनाया जाए और एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन हो। भारत की पहचान केवल कागजों का पुलिंदा नहीं है। यदि हम अपनी सीमा और नागरिकता की सुरक्षा नहीं कर सकते, तो हमारी संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी। झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और वोट बैंक की नीतियों से ऊपर उठकर ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति अपनानी होगी, अन्यथा इतिहास इस लापरवाही को कभी क्षमा नहीं करेगा।

















