वेनेजुएला ने विपक्षी नेता मारिया कोरिना माचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने के तीन दिन बाद नार्वे के ओस्लो स्थित अपने दूतावास को बंद कर दिया है। इसकी कोई खास वजह नहीं बताई गई। 58 साल की माचाडो, जिन्हें ‘वेनेजुएला की आयरन लेडी’ कहा जाता है, को ट्रंप की समर्थक माना जाता है। इसका अंदाजा तो इसी बात से लग जाता है कि नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के बाद माचाडो ने इसे ट्रंप को समर्पित कर दिया था। वो वेनेजुएला के निकट अमेरिकी सैन्य अभ्यास का भी समर्थन करती हैं। वहीं वेनेजुएला सरकार ने इसे ‘शैतानी साजिश’ करार दिया।
क्या है घटनाक्रम
सब कुछ तेजी से हुआ। करीब 10 अक्टूबर 2025 को ओस्लो में नोबेल समिति ने माचाडो को सम्मानित किया। नॉर्वेजियन नोबेल कमिटी के चेयर जॉर्गन वाट्ने फ्राइडनेस ने कहा, “ये पुरस्कार उनके अथक प्रयासों को समर्पित है, जो वेनेजुएला के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए और तानाशाही से न्यायपूर्ण शांतिपूर्ण बदलाव के लिए लड़े।” माचाडो ने पुरस्कार को “वेनेजुएला के पीड़ित लोगों” को समर्पित किया और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी श्रेय दिया, जिन्हें भी ये पुरस्कार मिलने का नामांकन था।
शनिवार को फॉक्स न्यूज पर माचाडो ने ट्रंप की तारीफ की: “वो पुरस्कार के हकदार हैं। न सिर्फ उन्होंने कुछ महीनों में आठ युद्ध सुलझाए, बल्कि उनकी कार्रवाइयों ने वेनेजुएला को आजादी के कगार पर पहुंचा दिया।” उधर, रविवार को मादुरो ने अमेरिका की खोज की सालगिरह पर एक कार्यक्रम में बोलते हुए माचाडो का नाम लिए बिना उन्हें “शैतानी चुड़ैल” कहा। वेनेजुएला में इसे ‘स्वदेशी प्रतिरोध दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। मादुरो ने जोर दिया, “हमें शांति चाहिए, और मिलेगी भी, लेकिन आजादी और संप्रभुता के साथ।”
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माचाडो की कहानी
माचाडो की कहानी 2024 के राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ी है। उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था। बाद में निकोलस मादुरो को विजेता घोषित किया गया। विपक्ष ने इसे चोरी बताया और सड़कों पर विरोध हुआ। माचाडो वो अमेरिकी सैन्य अभ्यासों का समर्थन करती हैं, जो वेनेजुएला के तटों के पास हो रहे हैं। जनवरी में मादुरो के शपथ ग्रहण से पहले एक विरोध प्रदर्शन में वो झंडे लहराती नजर आईं।
नॉर्वे की प्रतिक्रिया: संवाद की उम्मीद
नॉर्वे की विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता सिसिली रोआंग ने AFP को ईमेल में बताया, “वेनेजुएला दूतावास ने हमें सूचना दी कि वो बंद हो रहा है, बिना वजह के। ये अफसोसजनक है। मतभेदों के बावजूद, नॉर्वे वेनेजुएला के साथ संवाद खुला रखना चाहता है और आगे भी कोशिश करेगा।”

















