शक्नोती हैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।। – गीता
भावार्थ-
मन, बुद्धि, इन्द्रियां और शरीर के विकल एवं शिथिल होने से पूर्व काम, कोध के वेग को जीतने वाला मनुष्य ही सदा सुखी और सच्चा योगी होता है।
आज के लिए प्रासंगिक-
आज के समय में ‘सच्चा योगी’ वह नहीं है जो जंगल चला जाए, बल्कि वह है जो कॉर्पोरेट लाइफ, परिवार और सोशल मीडिया के बीच रहते हुए भी अपने गुस्से (Anger) और इच्छाओं (Desires) के रिमोट कंट्रोल को अपने हाथ में रखता है। वही इंसान आज ‘सदा सुखी’ है।