जॉर्जिया की राजधानी त्बिलिसी इस वक्त आग में जल रही है। शनिवार को हजारों प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन का सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की। स्थिति बेकाबू होते ही पुलिस ने आंसू गैस, पेपर स्प्रे और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। बताया जा रहा है कि यह प्रदर्शन पिछले 311 दिनों से चल रहा आंदोलन का विस्फोट है- जो अब सीधे सत्ता पलट की दिशा में बढ़ गया है।
प्रधानमंत्री का बड़ा आरोप
प्रधानमंत्री इराकली कोबाखिद्जे ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यूरोपीय संघ के झंडे लेकर दंगाइयों ने प्रेसिडेंशियल पैलेस के बाहर आगजनी की, और देश की संवैधानिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री इराकली कोबाखिद्जे ये बयान सीधा-सीधा उस बाहरी हस्तक्षेप की ओर इशारा करता है, जो पिछले कुछ सालों से श्रीलंका, बांग्लादेश में भी देखा गया।
श्रीलंका में टूलकिट स्क्रिप्ट की शुरुआत
बता दें कि श्रीलंका में महिंदा राजपक्षे की सरकार के खिलाफ आंदोलन में सोशल मीडिया आधारित टूलकिट का वही पैटर्न दिखा-भ्रष्टाचार, महंगाई और जनता की आवाज़ के नाम पर भीड़ को उकसाना, सरकारी भवनों पर धावा बोलना, फिर विदेश से मीडिया कवरेज और NGO सपोर्ट।
बांग्लादेश में दोहराई गई पटकथा
वहीं बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन में भी यही फॉर्मूला- यूरोपीय समर्थन, अमेरिकी दबाव और विपक्ष को नायक बनाना अपनाया गया।
अब वही रणनीति जॉर्जिया में भी उतर रही है— फ्रीडम स्क्वायर से लेकर राष्ट्रपति भवन तक भीड़ को भड़काना, EU के झंडे लहराना, और सत्ता को रूस-समर्थक करार देकर जनता को बांटना, फिर प्रदर्शन की आड़ में दंगे और आगजनी कर सत्ता को बेदखल कर देना।
आज वही स्क्रिप्ट सामने है— पहले चुनाव में सवाल उठाना, फिर सड़कों पर उतरना, उसके बाद विदेशी मीडिया की सुर्खियाँ और अंत में “लोकतंत्र बचाओ” के नाम पर सरकार गिराओ का अभियान।
सरकार पर हमले और हिंसा के आरोप
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों पर पुलिस पर हमला, हिंसा का आयोजन और संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव की साजिश जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। करीब 14 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। सरकार ने कहा है कि यह केवल “लोकतांत्रिक आंदोलन” नहीं बल्कि बाहरी एजेंसियों द्वारा रची गई साजिश है ताकि जॉर्जिया को रूस और यूरोप के बीच की नई जंग में मोहरा बनाया जा सके।
2024 चुनावों से शुरू हुई पृष्ठभूमि
बता दें कि असल में कहानी 2024 के संसदीय चुनाव से शुरू हुई थी- जब विपक्ष ने धांधली का आरोप लगाया, अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने भी चुनाव परिणामों को “दोषपूर्ण” बताया, और इसके बाद से ही सरकार विरोधी आंदोलन शुरू हो गया। सरकार ने यूरोपीय संघ में शामिल होने की बातचीत रोक दी, जिससे पश्चिमी खेमे की नाराज़गी और बढ़ी।
‘टूलकिट ब्लूप्रिंट’ की वैश्विक रणनीति
जॉर्जिया में जो हो रहा है, वह कोई अलग घटना नहीं- ये वही टूलकिट ब्लूप्रिंट है जो एशिया के कई देशों में आज़माया जा चुका है। फर्क सिर्फ इतना है कि हर बार रंग, झंडा और नारा बदल जाता है- लेकिन स्क्रिप्ट वही रहती है।
क्या यह जनता की आवाज़ है या वैश्विक एजेंडा.?
अब सवाल यह है- क्या ये आंदोलन सचमुच जनता की आवाज़ हैं या किसी वैश्विक रणनीति का हिस्सा, जो छोटे देशों को अपनी दिशा में मोड़ने का नया तरीका बन चुकी है..? क्योंकि इतिहास गवाही दे रहा है- जब-जब किसी देश ने अपने हितों में स्वतंत्र निर्णय लेने की कोशिश की, तब-तब “लोकतंत्र बचाने” के नाम पर तख्तापलट की आंधी भेज दी गई।

















