US-Iran समझौता और Marco Rubio का Middle East दौरा, क्या निकलेगी Hormuz की फांस! क्यों चिंता में हैं UAE, Qatar, Bahrin
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US-Iran समझौता और Marco Rubio का Middle East दौरा, क्या निकलेगी Hormuz की फांस! क्यों चिंता में हैं UAE, Qatar, Bahrin

यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन और कतर में अमेरिकी सैन्य बेस हैं। अगर इनमें से कोई भी देश अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंधों पर दोबारा विचार करता है, तो इसका इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य रणनीति पर बड़ा असर पड़ सकता है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Jun 23, 2026, 02:32 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्का रूबियो (File Photo)

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्का रूबियो (File Photo)

आज से लेकर 25 जून तक अमेरिकी विदेश मंत्री मार्का रूबियो यूएई, कुवैत और बहरीन के दौरे पर रहने वाले हैं। उनकी इस यात्रा का एजेंडा स्विट्जरलैंड में ईरान के साथ हुए समझौते पर चर्चा बताया जा रहा है, लेकिन इसके पार भी कई बिन्दु हैं जो ट्रंप की ओर से मार्को रूबियो उन देशों में उठाने वाले हैं। समझौते के बाद भी ईरान ने सपना रुख नहीं छोड़ा है। खासकर होमुर्ज को लेकर उसने वहां अपना ही सिक्का चलाए रखने की घोषणा की है तो उधर ट्रंप के हवाले से खबर आई है कि उन्होंने ‘होर्मुज का कुछ भाग खोलने की ईरान को इजाजत दी है’! यानी ट्रंप उस पर अपना दबदबा न छोड़ने का संकेत दे रहे हैं। एक मुद्दा अमेरिका द्वारा ईरान को प्रस्तावित आर्थिक मदद का भी है जिसमें ईरान के फ्रीज खाते का कुछ अंश जारी करने की बात है। इन सब मुद्दों के चलते, रूबियो का मध्य पूर्व का यह दौरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अमेरिका के शीर्ष राजनयिक रूबियो सबसे अधिक मंत्रणा तो ईरान के साथ हुए समझौते (MoU) और होर्मुज स्ट्रेट की भविष्य की स्थिति को लेकर करने वाले हैं। इसके अलावा कुछ क्षेत्रीय मुद्दों पर भी चर्चा हो सकती है। अमेरिकी विदेश विभाग की विज्ञप्ति बताती है कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो 23 से 25 जून तक संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन का दौरा करेंगे।

जीसीसी से होगी चर्चा
इस बयान में कहा गया है, “विदेश मंत्री कई क्षेत्रीय प्राथमिकताओं पर चर्चा करेंगे, जिनमें ईरान के साथ समझौता (MoU), होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की पूरी और बिना किसी रुकावट के सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के प्रयास, और क्षेत्र में शांति व स्थिरता को महत्व देना शामिल है।” बताया गया है कि बहरीन में, रूबियो पूरे क्षेत्र में साझा प्राथमिकताओं पर चर्चा करने के लिए खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी से भी मिलेंगे। खाड़ी क्षेत्र के छह देशों से मिलकर बनी इस जीसीसी में सऊदी अरब, कतर और ओमान भी शामिल हैं।

ईरान के राष्ट्रपति पजेश्कियान समझौते की प्र​ति दिखाते हुए

इसमें संदेह नहीं है कि अमेरिका और ईरान उस संयुक्त समझौते (MoU) के तहत बातचीत के दौरान उभरे कई जटिल मुद्दों पर बातचीत के जरिए समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हैं। दुनिया का एक बड़ा भाग ऐसा चाहता भी है और ट्रंप के शब्दों में कहें तो अधिकांश अमेरिकी यही चाहते हैं।

हालांकि इस समझौते का मध्य पूर्व में काफी हद तक स्वागत ही किया गया, लेकिन युद्ध ने ईरान और उन पड़ोसी खाड़ी देशों के बीच संबंधों में तनाव पैदा कर दिया है जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। उन देशों पर ईरानी हमलों में नागरिक बुनियादी ढांचे भी चपेट में आए थे। इसने इन खाड़ी देशों के साथ अमेरिका की सुरक्षा साझेदारी पर भी सवाल खड़े किए हैं।

होर्मुज स्ट्रेट से आवाजाही मध्य पूर्व से तेल और गैस के लिए एक अहम पहलू है और युद्ध के दौरान इस पर खतरा बना रहा था। अभी भी यह आवाजाही युद्ध-पूर्व के स्तर से नीचे बनी हुई है, हालांकि MoU पर हस्ताक्षर के बाद इसमें कुछ सुधार दिखा है।

डेटा और एनालिटिक्स फर्म ‘केप्लर’ का कहना है कि गत शनिवार, रविवार को इस जलमार्ग से 71 जहाज गुजरे, जबकि फरवरी के आखिर में अमेरिका और इस्राएल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने से पहले यह संख्या औसतन 100 से 131 के बीच थी।

ट्रांजिट फीस की फांस
समझौते में कहा गया है कि ईरान 60 दिन की बातचीत की अवधि के दौरान पारगमन शुल्क (ट्रांजिट फीस) नहीं ले सकता है। अमेरिकी विदेश विभाग की विज्ञप्ति में स्ट्रेट से “पूरी तरह और बिना किसी रुकावट के सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के प्रयासों” पर जोर दिया गया है। ईरानी अधिकारियों की माने तो 60 दिन की अवधि खत्म होने के बाद वे ट्रांजिट फीस लेने की योजना बना रहे हैं।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स अपनी रिपोर्ट में लिखती है कि मध्य पूर्व के कुछ क्षेत्रीय अधिकारी ईरान MoU की खास शर्तों को लेकर संशय में हैं, जैसे तेहरान के लिए 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण फंड देने की बात। अमेरिकी विदेश मंत्री के सामने यह मुद्दा उठना स्वाभाविक है। संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन में इसे लेकर कई सवाल होंगे। रूबियो की इस यात्रा से ट्रम्प प्रशासन को खाड़ी के अरब सहयोगियों के सामने सीधे तौर पर अपने शुरुआती ईरान समझौते को पेश करने का मौका मिलेगा।

रूबियो की इस यात्रा से ट्रम्प प्रशासन को खाड़ी के अरब सहयोगियों के सामने सीधे तौर पर अपने शुरुआती ईरान समझौते को पेश करने का मौका मिलेगा।

अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने कल कहा भी कि बहरीन में रूबियो ‘गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल’ के साथ भी बैठक करेंगे यानी छह सुन्नी राजशाही देशों के समूह को रूबियो संबोधित करके स्थिति स्पष्ट करेंगे। हालांकि जीसीसी नेताओं ने ईरान के साथ अमेरिका-इस्राएल युद्ध को खत्म करने की कोशिशों का मोटे तौर पर समर्थन किया है, लेकिन कई नेता उस समझौता ज्ञापन की कुछ शर्तों को लेकर अस्पष्ट हैं।

जैसा पहले बताया, क्षेत्रीय अधिकारियों के बीच चिंता का एक खास मुद्दा तेहरान के लिए 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण फंड की संभावना है। खाड़ी देशों के नेताओं का मानना ​​है कि इस्लामिक रिपब्लिक इस फंड का इस्तेमाल अपनी सैन्य क्षमता को फिर से मजबूत बनाने और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों को फंड देने के लिए करेगा। MoU में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम का ज़िक्र न होने से भी वॉशिंगटन के खाड़ी देशों के सहयोगी भी चिंतित हैं, क्योंकि हाल के महीनों में उन्हें ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों का सामना करना पड़ा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन और कतर में अमेरिकी सैन्य बेस हैं, जो मध्य पूर्व में अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। अगर इनमें से कोई भी देश अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंधों पर दोबारा विचार करता है, भले ही वह बहुत मामूली स्तर पर हो, तो इसका इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य रणनीति पर बड़ा असर पड़ सकता है।

Topics: सऊदी अरबamerica iran MOUअमेरिकाUAEयूएईbahrinबहरीनकुवैतMiddle EastQuatarHormuzRubio
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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