भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रचार-प्रसार के लिए आरएसएस
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100 वर्ष की संघ यात्रा : भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रचार-प्रसार में आरएसएस का योगदान

‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में इस अवसर पर मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल और प्रांत संघचालक डाॅ. अनिल अग्रवाल उपस्थित थे। व्याख्यानमाला में पहले दिन एवं दूसरे दिन सरसंघचालक ने व्याख्यान दिया तथा तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ का आयोजन किया गया।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 31, 2025, 02:59 pm IST
inसंघ @100, दिल्ली

 ‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। इस अवसर पर मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल और प्रांत संघचालक डाॅ. अनिल अग्रवाल उपस्थित थे। व्याख्यानमाला में पहले दिन एवं दूसरे दिन सरसंघचालक ने व्याख्यान दिया तथा तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ का आयोजन किया गया। यहां व्याख्यानमाला के संपादित अंश दिए जा रहे हैं-

प्रश्न-

  1. भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रचार-प्रसार के लिए आरएसएस तथा उससे जुड़े संगठनों ने अब तक कौन-कौन से उपक्रम किए हैं?

  2. इस दिशा में उनकी क्या कार्ययोजनाएं हैं और भविष्य के लिए क्या दृष्टिकोण है?

  3. राजनेता रहते हुए जेल में रहने पर पदमुक्त करने के कानून के बारे में संघ का मत क्या है?

उत्तर-

आरएसएस की कोई अधीनस्थ संस्था नहीं है। जहां-जहां स्वयंसेवक कार्य कर रहे हैं, वे सभी संगठन स्वतंत्र व स्वायत्त हैं तथा उनसे आत्मनिर्भर रहने की अपेक्षा की जाती है। संघ में किसी भी प्रकार की अधीनता नहीं है। एक संगठन के रूप में संघ में प्रतिदिन एकात्मता स्तोत्रम् का गान किया जाता है। एकात्मता स्तोत्रम् में पहले सच्चिदानंद रूप भगवान का वंदन है, फिर मातृभूमि का। उसके बाद भारत की नदियां, पहाड़ों और फिर ऋ षि परंपरा से लेकर वैज्ञानिकों तक सबके नामों का उल्लेख है। श्लोक है-
वैज्ञानिकाश्च कपिलः कणादः सुश्रुतस्तथा।
चरको भास्कराचार्यो वराहमिहिरः सुधीः।।
नागार्जुनो भरद्वाजः आर्यभट्टो वसुर्बुधः।
ध्येयो वेंकटरामश्च विज्ञा रामानुजादयः।।

मैं यहां ऋ षि परंपरा का उल्लेख करता हूं और उन महान मनीषियों का स्मरण करता हूं, जिन्होंने भारत की ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाया। कपिल, कणाद, सुश्रुत, चरक, भास्कराचार्य, वराहमिहिर, नागार्जुन, भरद्वाज, आर्यभट से लेकर आधुनिक काल के जगदीशचंद्र बसु, वेंकट रामन, रामानुजन आदि सभी इस अखंड परंपरा के प्रतिनिधि हैं। संघ के प्रशिक्षण वर्गों में प्रत्येक आचार्य और वैज्ञानिक के बारे में बताते हैं। समय-समय पर इसमें संशोधन और परिवर्तन कर इसे वर्तमान संदर्भ में और प्रासंगिक बनाया जाता है। बौद्धिक वर्गों में भी हमारे यहां यह विषय सदैव रहता है कि भारत की ज्ञान परंपरा क्या है—आध्यात्मिक ज्ञान से लेकर विज्ञान और प्रौद्योगिकी तक।

आज स्थिति यह है कि पहले जहां ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ कहना ही एक प्रकार का टैबू माना जाता था, अब शिक्षा सम्मेलनों, विश्वविद्यालयों, प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों-सभी के बीच इस पर खुलकर चर्चा हो रही है। शिक्षा क्षेत्र में हमारे चार बड़े संगठन सक्रिय हैं। उनके प्रयासों से ही नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा को स्थान दिया गया है। अब आवश्यकता है कि इस प्रयास को और गति दी जाए। आने वाले समय में हमारे संगठन इस दिशा में और गंभीर प्रयास करेंगे ताकि भारतीय ज्ञान परंपरा को उसका उचित सम्मान और स्थान मिल सके।

देखिए, हमारा नेतृत्व पारदर्शी और स्वच्छ होना चाहिए। यही उसका मूल तत्व है। मैं समझता हूं, इससे सब सहमत हैं। संघ का भी ऐसा ही मत है। केवल कानून बन जाने से पारदर्शिता और शुचिता पूरी तरह सुनिश्चित नहीं होती। इस विषय पर बहस चल रही है और इसका निर्णय हमारी संसद करेगी। लेकिन जो भी व्यवस्था बने, उससे लोगों के मन में यह पक्का विश्वास हो कि हमारा नेतृत्व साफ-सुथरा और पारदर्शी है। यही सबसे जरूरी है।

अब प्रश्न उठता है कि संघ अन्य राजनीतिक दलों का साथ क्यों नहीं देता? या क्यों कुछ राजनीतिक दल संघ के विरोधी दिखाई देते हैं? क्या उनके मन में परिवर्तन की संभावना है? तो मेरा अनुभव कहता है — हां, संभावना हमेशा रहती है।

1948 में जयप्रकाश नारायण जी मशाल लेकर संघ के घर को जलाने चले थे। लेकिन इमरजेंसी के बाद जब वे हमारे संघ शिक्षा वर्ग में आए, तो उन्होंने कहा कि अब देश में परिवर्तन की आशा केवल आप लोगों से है। यह तो स्पष्ट उदाहरण है कि मन बदल सकता है। संघ शताब्दी के उपलक्ष्य में निकली स्मृति-ग्रंथ शृंखला और कई आयोजनों में यह साफ दिखा। मौलाना अबुल कलाम आजाद से लेकर प्रणब दा तक—कई लोग हमारे मंच पर आए हैं। उन्होंने अपने मन नहीं बदले, मत नहीं बदले। लेकिन संघ के बारे में उनकी गलतफहमियां दूर हुईं, और इसी कारण वे आगे आए। सच यह है कि यदि मनुष्य सचमुच मनुष्य है, तो उसका मन होता है और मन में हमेशा परिवर्तन संभव है। किसी का मन जल्दी बदल जाता है, किसी का देर से। इसलिए मन परिवर्तन की संभावना को कभी भी नकारना नहीं चाहिए। यही हमारा दृष्टिकोण है।

अच्छे कार्य के लिए जो हमसे सहायता मांगते हैं, उन्हें हम सहायता देते हैं। लेकिन जिनकी सहायता करने जाते हैं और वे दूर भागते हैं तो उन्हें सहायता नहीं मिलती। हम क्या करें? यदि कोई अच्छा काम है, उसे करना चाहिए, उस पर सब सहमत हों—तो हम उसे करते हैं।
अक्सर लोगों को एक  पार्टी दिखती है, जिसेहम सहयोग कर रहे हैं। लेकिन सच यह है कि यदि देश के लिए कोई अच्छा काम हो या कभी किसी राजनीतिक दल का कार्य भी लोकहितकारी हो, तो हमारे स्वयंसेवक संघ के कहने पर आगे बढ़कर मदद करते हैं।

एक उदाहरण है—नागपुर में एनएसयूआई का अधिवेशन हुआ था। उस समय राजीव गांधी स्वयं एनएसयूआई के अध्यक्ष थे। भोजन की व्यवस्था बिगड़ गई और मारपीट हो गई। लगभग 30,000 लोग वहां मौजूद थे। हालात यह हो गए कि कुछ लोग थालियां फेंकने लगे, कुछ बाजारों में लूटपाट तक करने घुस गए और फिर मार खाकर लौट आए।

मुझे फोन आया, मैं नागपुर में प्रचारक था। उस इलाके के सांसद ने मुझे फोन करके कहा, ‘‘भागवत जी, मेस (भोजन व्यवस्था) फिर से शुरू करने में आपकी मदद चाहिए।’’ वहां 11 मेस बंद हो गए थे। हमने 60 स्वयंसेवक भेजे और दोपहर 2 बजे तक भोजन की व्यवस्था फिर से सुचारू हो गई। तो यह स्पष्ट है कि हमें किसी से परहेज नहीं है। हमारा समय और सेवा सभी के लिए है। हम किसी को पराया नहीं मानते। हमारी ओर से कोई रुकावट कभी नहीं होती। हां, अगर सामने से किसी की प्रतिकूलता या अस्वीकार हो, तो हम उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए रुक जाते हैं।

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