राजपथ से लालकिले तक संघ
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष : राजपथ से लालकिले तक संघ

1963 की गणतंत्र दिवस परेड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लगभग 3,000 स्वयंसेवकों ने भाग लिया था। इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी के निर्देश पर संघ को आमंत्रित किया गया था। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर उसे बधाई दी है। संघ की इस यात्रा से कुछ लोग बेहद परेशान हैं

Written byकृष्णानंद सागरकृष्णानंद सागर
Aug 26, 2025, 03:43 pm IST
in विश्लेषण, संघ @100
1963 में राजपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेते संघ के स्वयंसेवक

1963 में राजपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेते संघ के स्वयंसेवक

इस बार 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेेंद्र मोदी ने लालकिले से देश के नाम अपने उद्बोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष की यात्रा का उल्लेख क्या कर दिया कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों की छाती पर सांप लोटने लगे। संघ का नाम सुनने मात्र से ही उन्हें मानो बिच्छू काट लेता है और वे बिलबिलाने लगते हैं। उनके आका जवाहरलाल नेहरू की भी कई वर्ष तक यही स्थिति रही थी। वे भी संघ का नाम सामने आते ही भड़क जाते थे और संघ को ‘साम्प्रदायिक,’ ‘मुस्लिम-विरोधी’ और ‘देश द्रोही’ तक कहने से नहीं चूकते थे।

कृष्णानन्द सागर
वरिष्ठ लेखक एवं इतिहासकार

इतना ही नहीं, गांधी जी की हत्या का आरोप लगा कर उन्होंने संघ पर प्रतिबंध भी लगा दिया था। किंतु जैसे-जैसे उन्हें संघ के विषय में थोड़ा-थोड़ा ज्ञान होता गया, उनका ‘संघ-विरोध’ रूपी बुखार भी उतरता गया। अंत में स्थिति यहां तक आ गई कि 26 जनवरी, 1963 को गणतंत्र दिवस की परेड में विधिवत भाग लेने के लिए संघ को भी आमंत्रित किया जाए, ऐसा आदेश उन्होंने शासकीय अधिकारियों को दिया। उसी के अनुसार शासकीय अधिकारियों ने गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेने के लिए दिल्ली के संघ अधिकारियों को केवल तीन दिन पहले सूचित किया।

इतना कम समय होने के बावजूद 26 जनवरी को प्रात: लगभग 3,000 स्वयंसेवक परेड स्थल विजय चौक पर पहुंच गए थे। सभी स्वयंसवेक पूर्ण गणवेश (सफेद कमीज, खादी निकर, काली टोपी व पैरों में मिलिटरी वाले बूट) में थे। घोष (बैंड) सहित जब ये स्वयंसेवक कदम से कदम मिलाते हुए राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर संचलन करते हुए निकले, तो सभी देशी-विदेशी दर्शकों के लिए आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। अगले दिन के प्राय: सभी समाचार-पत्रों ने इस समाचार को छापा था।

गणतंत्र दिवस पर संघ को भी आमंत्रित किया गया है, यह जानकारी मिलने पर उस समय भी कई कट्टर संघ-विरोधी कांग्रेसियों में हलचल मच गई थी। ‘साम्प्रदायिकता विरोधी समिति’ की सर्वेसर्वा और कांग्रेस नेता सुभद्रा जोशी तो सरकार के इस निर्णय को रुकवाने के लिए नेहरू जी के पास एक शिष्टमंडल लेकर पहुंच गई थीं। किन्तु नेहरू जी ने उन्हें डांटते हुए कहा, ”संघ वालों को क्यों न बुलाया जाए, आखिर वे भी देशभक्त हैं। बेचारी सुभद्रा जोशी को मुंह लटकाए वापस आना पड़ा था। नेहरू आखिर ‘देशद्रोही संघ’ से ‘देशभक्त संघ’ के निष्कर्ष पर क्यों और कैसे पहुंचे। इसे जानने के लिए कुछ प्रसंगों को जानना जरूरी है।

नेहरू सहित केंद्रीय मंत्रियों की रक्षा

2 सितंबर, 1946 को नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ था। इस हेतु जब प्रात: सभी मंत्री शपत्र लेने वाइसराय लॉज (अब राष्ट्रपति भवन) जा रहे थे तो रास्ते में राजपथ पर मुस्लिम लीगियों ने उनके विरुद्ध काले झंडों के साथ प्रदर्शन किया व उन्हें सरेआम गालियां दीं। उनकी गाड़ियों पर सड़े टमाटर व अंडे फेंके। यहां तक कि एक लीगी ने आगे बढ़ कर नेहरू की गाड़ी में जलती सिगरेट के टुकड़े भी फेंके। यह अत्यंत अपमानास्पद स्थिति थी। और यह आगे भी नित्य प्रति होने वाला था। उस पर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन नेता तत्कालीन देशबंधु गुप्ता ने संघ के दिल्ली प्रांत प्रचारक बसन्तराव ओक से संपर्क करके उनसे प्रार्थना की कि कांग्रेस मंत्रियों की मुस्लिम लीगियों के हुड़दंग से रक्षा की व्यवस्था करें।

अगले दिन 3 सितंबर को लीगी कुछ और ही सोच कर आए थे। लेकिन उन्होंने वहां पहले ही भारी संख्या में संघ स्वयंसेवकों को उपस्थित देखा। प्रत्येक लीगी के दाएं-बाएं दो-दो स्वयंसेवक खड़े हो गए। इससे लीगियों की हिम्मत ही नहीं हुई कुछ करने की और वे वापस चले गए। नेहरू व अन्य मंत्री निर्विघ्न अपने-अपने कार्यालयों को गए। उसके बाद लीगियों का कांग्रेस मंत्रियों के विरुद्ध प्रदर्शन भी बंद हो गया।

सिंध में नेहरू जी की रक्षा

सिंध का एक बड़ा नगर है हैदराबाद। 1946 में नेहरू जी का वहां कार्यक्रम था। हैदराबाद के कांग्रेस नेताओं को गुप्त जानकारी मिली कि सभा में मुस्लिम लीग के लोग हमला करेंगे और वे नेहरू जी को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। वहां के कांग्रेस नेता चिमनदास एवं लाला किशनचन्द संघ अधिकारियों के पास गए और उनसे गुहार लगाई कि उस संभावित खतरे से नेहरू जी को बचाएं। फलत: सभा के चारों ओर संघ स्वयंसेवकों ने मोर्चे लगा लिए। लीगी गुंडे आए, किंतु वहां पहले से संघ स्वयंसेवकों को देखकर उनका सारा जोश ठण्डा पड़ गया और वे वापस चले गए। सभा पूरे सम्मान के साथ संपन्न हुई और नेहरू जी सुरक्षित वापस लौटे।

संघ सम्मेलन में नेहरू

9 मार्च, 1947 को दिल्ली में 25,000 गणवेशधारी स्वयंसेवकों का बसन्त सम्मेलन हुआ था। आजकल जहां राजघाट है, उसी स्थान पर। सायंकाल 6 बजे सरसंघचालक श्रीगुरुजी का सार्वजनिक उद्बोधन होने वाला था। इसके लिए दिल्ली के अनेक गणमान्य लोगों को भी आमंत्रित किया गया था। हजारों लोग साइकिल और अन्य वाहनों से कार्यक्रम स्थल पर पहुंच रहे थे। कार्यक्रम स्थल पर वाहन-व्यवस्था देख रहे थे श्री बल्देवराज खन्ना नाम के एक कार्यकर्ता।

लगभग 5.30 बजे एक कार वहां आई। उसमें से एक सज्जन बाहर निकले। वे थे जवाहर लाल नेहरू। बल्देवराज उन्हें देखते ही दौड़ कर उनके पास पहुंचे और नमस्कार किया। नेहरू जी ने बल्देव से पूछा ‘Where is Golvalkarji, I want to see him.’ बल्देव बोले, “जी, वे ठीक छह बजे यहां पहुंच जाएंगे। आप आइए, अंदर बैठिए। उनके आते ही आपकी भेंट उनसे करा दूंगा।”
नेहरू जी, “नहीं, नहीं। मैं इतनी देर नहीं रुक सकता। मेरी आगे और मीटिंग है।”

फिर वे थोड़ा सोच कर बोले, “अच्छा, तुम मुझे इस स्थान का एक View (परिदृश्य) दिखा सकते हो?” अवश्य, ऐसा कहकर उन्होंने पास खड़ी एक खाली बस की ओर दशारा करके कहा, “उसकी छत से पूरे कार्यक्रम-स्थल का परिदृश्य दिखायी दे जाएगा।” बल्देव के साथ ही नेहरू जी भी उस बस की छत पर चढ़ गए। चारों ओर का विहंगम दृश्य देख कर वे नीचे उतर आए। तब तक उनकी गाड़ी कार पार्किंग में जा चुकी थी। बल्देव जी ने उनकी गाड़ी का नम्बर पूछा ताकि उसे वहीं मंगवाया जा सके, लेकिन नेहरू जी को नम्बर याद नहीं था। अतः बल्देव जी ने उन्हें किसी और गाड़ी में भिजवा दिया। उनकी गाड़ी कुछ देर बाद वापस गई। नेहरू जी भले ही इस कार्यक्रम को एक विहंगम दृष्टि से ही देख पाए थे पर देखा तो था। कार्यक्रम की विशालता, अनुशासन तथा व्यवस्था का परिणाम उनके हृदय पर सद्भाव के रूप में हुआ अथवा ईर्ष्या के रूप में, यह हो वे ही जानें।

RSS के 100 साल: जनमानस में प्रवाहमय शक्ति पुंज है संघ, भारत भाग्य विधाता संगठन है RSS…

मनाली की संघ शाखा

1958-1959 की बात है। नेहरू जी कुछ दिन विश्राम के लिए मनाली (हिमाचल प्रदेश) गए थे। एक दिन शाम को सैर के लिए जा रहे थे, तो रास्ते में उन्हें एक स्थान पर 15-16 बालक खेलते हुए मिले। उस स्थान के एक तरफ भगवा झंडा लहरा रहा था। नेहरू जी जब पास से गुजरे तो बालकों ने उन्हें बारी-बारी से नमस्ते की। नेहरू जी ने सबका अभिवादन जय हिन्द कह कर स्वीकार किया और पूछा- तुम लोग यहां इतनी ठंड में क्या कर रहे हो? उत्तर मिला- ‘हम यहां संघ की शाखा लगा रहे हैं।’ पं. नेहरू ने तब तक संघ की शाखा कभी देखी नहीं थी।

अब इस ‘शाखा’ को देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे तो आगे निकल गए, किंतु उनके साथ के एक सज्जन (जो शायद उनके प्राइवेट सेक्रेटी थे) ने सबको डांटते हुए कहा कि पंडित जी ने जब जय हिन्द कहा तो आप लोगों ने जय हिन्द के स्थान पर नमस्ते क्यों कहा? इस पर एक स्वयंसेवक ने उत्तर दिया-नमस्ते तथा जय हिन्द दोनों ही अभिवादन के प्रकार हैं। आजकल नमस्ते ही अधिक प्रचलित है। यहां शाखा में और स्कूल में बालक जो बोलते हैं, वहीं उन्होंने पंडित जी से कहा है। इसमें बुराई क्या हो गई? यह उत्तर देने वाले थे श्री ओम प्रकाश दीवान, जो उस समय कुल्लू तहसील के प्रचारक थे और उस दिन उस शाखा में उपास्थित थे।

RSS के 100 वर्ष : स्वतंत्रता संग्राम में संघ का निर्णायक योगदान

चीनी आक्रमण

1962 में चीनी आक्रमण के समय सब और मिल रही पराजय से तो स्वयं नेहरू जी भी घबरा गए थे। लगातार बढ़ती आ रही चीनी सेनाओं के समाचारों से असम के कई स्थानों पर भगदड़ शुरू हो गई थी। तेजपुर आदि विभिन्न स्थानों पर सरकारी अधिकारी भी भागने लगे थे। ऐसे समय वहां के संघ स्वयंसेवकों ने स्वयं अटल रहते हुए लोगों को भागने से रोका। चीन के भारतीय एजेंटों ने यह अफवाह फैला दी थी कि कुछ ही घंटों में चीनी सेनाएं तेजपुर पहुंचने वाली हैं। इस अफवाह पर विश्वास करके वहां के स्टेट बैंक के अधिकारियों ने करोड़ों रुपए के नोट जला दिए और ब्रह्मपुत्र नदी को पार करने के लिए उसके नौका तट पर पहुंच गए। तेजपुर के अनेक प्रशासकीय व पुलिस अधिकारी भी नौका तट पर पहुंच गए। इससे आम जनता में तो भगदड़ मचनी ही थी।

ऐसी विषम स्थिति में तेजपुर के स्वयंसेवकों ने निश्चय किया कि हम भागेंगे नहीं, चीनियों का सामना करेंगे। इस निश्चय के बाद वे भाग रहे अन्य लोगों को भी रोकने की कोशिश में लग गए। उनके ध्यान में, यह बात भी आई कि कुछ लोग पूर्णतया निश्चिंत होकर अपने घरों में बैठे हैं। उनसे पूछने पर उत्तर मिला कि चीनी आ भी गए तो हमें थोड़े ही कुछ कहेंगे। स्वयंसेवक समझ गए कि यह कोई बहुत बड़ा षाड्यंत्र है।

अतः कुछ स्वयंसेवक नदी तट पर पहुंच गए। सैकड़ों लोग नौकाओं पर सवार हो चुके थे। स्वयंसेवकों ने उन्हें समझा-बुझा कर नौकाओं से उतरने के लिए कहा। कुछ के साथ जबरदस्ती करनी पड़ी। सरकारी अधिकारियों को तो विशेष रूप से खींच-खींच कर नौकाओं से उतारा गया, क्योंकि उनके चले जाने पर जनता का मनोबल बनाना असंभव हो जाता। तट पर पहुंचे अन्य लोगों से भी वापस अपने घरों को लौटने की प्रार्थना की गई। उन्हें बताया गया कि यह केवल अफवाह है और यह भारतीय सेना के मार्ग में कठिनाइयां पैदा करने के लिए फैलाई गई है।

लोगों की समझ में यह बात आ गई और वे अपने घरों को लौटने शुरू हो गए। कुछ ही घंटों में भगदड़ थम गई और तेजपुर में स्थिति सामान्य हो गई और चीनी चाल विफल हो गई। बिना किसी प्रतिरोध के असम पर कब्जा करने का उसका सपना ध्वस्त हो गया।

यह सब जानकारी भी नेहरू जी को मिली ही। इससे उनके मन में जाने-अनजाने बैठा हुआ संघ के प्रति कलुष काफी धुल गया। संघ के प्रति उनकी अवधारणा भी बदल गई। चीन से मिली भारी पराजय से गिरे हुए मनोबल को ऊपर उठाने के लिए यह तय किया गया कि इस बार (अर्थात् 1963) के गणतंत्र दिवस पर सभी संसद सदस्य तथा कुछ चयनित नागरिक भी 26 जनवरी की परेड में भाग लें। इस निर्णय के अंतर्गत ही नेहरू जी ने तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी आमंत्रित करने का निर्देश दिया था। क्या वर्तमान कांग्रेसी इससे कुछ शिक्षा लेंगे? तब ‘गणतंत्र दिवस’ था, अब ‘स्वतंत्रता दिवस’था। तब जवाहर लाल नेहरू थे, अब नरेंद्र दामोदरदास मोदी। तब राजपथ था, अब लालकिला। तब 1963 था, अब 2025।

Topics: संघ शाखा100 years of RSSNehru in SindhNehru at RSS conferenceराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघRSS shakhacommunaluniformed volunteersRepublic Day Paradeसिंध में नेहरूसंघ पर प्रतिबंधसंघ सम्मेलन में नेहरूपाञ्चजन्य विशेषSangh volunteersAnti-Muslim
कृष्णानंद सागर
कृष्णानंद सागर
प्रख्यात लेखक। [Read more]
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