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RSS के 100 वर्ष : स्वतंत्रता संग्राम में संघ का निर्णायक योगदान

संघ का योगदान स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अक्सर अनदेखा किया गया, जबकि उसका प्रभाव मौन रहकर भी निर्णायक था

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Aug 22, 2025, 10:45 pm IST
inसम्पादकीय, संघ @100

क्या आपको पता है कि भगत सिंह और सुखदेव के साथी राजगुरु का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से रहा है? क्या आप जानते हैं कि गांधी जी ने खुद संघ के अनुशासन और सेवा-भाव की सार्वजनिक सराहना की थी? क्या आप जानते हैं कि विभाजन की विभीषिका में लाहौर और मुल्तान से हजारों हिंदू-सिख परिवारों को सुरक्षित भारत लाने में रा.स्व.संघ के स्वयंसेवकों ने अपना बलिदान दिया? यह वे तथ्य हैं जिन्हें आज हर एक भारतीय के लिए जानना जरूरी है, क्योंकि इतिहास की किताबों ने इन्हें धुंधला कर दिया है।

आसान नहीं थी यात्रा

भारत की स्वतंत्रता की यात्रा केवल राजनीतिक आंदोलनों या कुछ नेताओं तक सीमित नहीं थी। यह यात्रा आसान नहीं थी। यह उस मौन तपस्या और संगठन के बल की भी कहानी थी, जिसने राष्ट्र को आत्मगौरव और एकात्मता का संस्कार दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना इसी दृष्टि से हुई थी। एक ऐसा संगठन, जो नारे और शोर से परे जाकर समाज की आत्मा को जाग्रत करे और स्वतंत्र भारत की नींव तैयार करे।

इस यात्रा की शुरुआत डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुई, जिनकी देशभक्ति का पहला सार्वजनिक उद्घोष 1907 में ही सामने आ गया था। नील सिटी स्कूल के किशोर केशव बलिराम हेडगेवार ने सरकारी निरीक्षक के सामने पूरी कक्षा से वंदे मातरम् बुलवाया और परिणामस्वरूप उन्हें विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। यह कोई क्षणिक आवेश नहीं था, बल्कि वह विद्रोही चेतना थी, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रूपरेखा तैयार की।

कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता का संकल्प पारित करने से पूरे नौ वर्ष पहले, सन् 1920 में डॉ. हेडगेवार कांग्रेस की नागपुर इकाई के संयुक्त सचिव के रूप में सक्रिय थे। उसी समय उन्होंने एक प्रस्ताव रखा था, जिसमें स्पष्ट रूप से उन्होंने कहा था, “कांग्रेस का लक्ष्य है पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना, एक भारतीय गणराज्य की स्थापना करना और विश्व के अन्य राष्ट्रों को पूंजीवादी साम्राज्यवाद के शोषण और अत्याचार से मुक्त कराना।” उन्होंने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। राजद्रोह का मुकदमा झेला और लगभग 11 महीने कारावास में रहे। उनके भाषण इतने प्रखर थे कि नागपुर के कलेक्टर ने उन्हें एक वर्ष तक सार्वजनिक भाषण देने से प्रतिबंधित कर दिया था। जेल से लौटने पर उनका स्वागत मोतीलाल नेहरू, हकीम अजमल खां, राजगोपालाचारी और विट्ठलभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया। किंतु डॅा. हेडगेवार ने यह घोषणा की कि नैतिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत एकता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता निरर्थक होगी। इसी विचार से प्रेरित होकर उन्होंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।

संघ की स्थापना का मार्ग आसान नहीं था। राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेने वालों को तत्काल सुर्खियां मिलती थीं, परंतु संगठन निर्माण और सांस्कृतिक जागरण की मौन साधना का कोई नाम तक दर्ज नहीं होता था। डॉ. हेडगेवार ने वही कठिन मार्ग चुना। यही कारण है कि संघ का योगदान स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अक्सर अनदेखा किया गया, जबकि उसका प्रभाव मौन रहकर भी निर्णायक था।

भगत सिंह और सुखदेव के साथी शिवराम हरि राजगुरु का संबंध भी संघ से रहा। नागपुर में शिक्षा प्राप्त करते हुए वे हेडगेवार जी से मिले और शाखा में आते-जाते रहे। 1929 में गिरफ्तारी से पूर्व डॉ. हेडगेवार ने उन्हें सुरक्षित स्थान पर रहने की सलाह भी दी, परंतु राजगुरु जैसे क्रांतिकारी जोखिम उठाने से नहीं चूके और अंततः गिरफ्तार हो गए। यह प्रसंग बताता है कि संघ और क्रांतिकारियों के बीच केवल वैचारिक रिश्ता ही नहीं था, बल्कि संरक्षण और मार्गदर्शन का संबंध भी था।

हर आंदोलन में सक्रिय रहे स्वयंसेवक

1930 में नागपुर में आयोजित संघ की तीन दिवसीय बैठक में बिना शर्त गांधी जी के नमक सत्याग्रह का समर्थन करने का निर्णय लिया गया। डॉ. हेडगेवार ने स्वयं सरसंघचालक पद अस्थायी रूप से छोड़ दिया ताकि संघ कार्य प्रभावित न हो और वे व्यक्तिगत रूप से सत्याग्रह में सम्मिलित हो सकें। वर्धा से निकला उनका जत्था दस हजार की भीड़ में बदल गया। डॉ. हेडगेवार को फिर से नौ महीने का करावास हुआ। जेल से छूटते ही उन्होंने फिर से संघ कार्य का दायित्व संभाला।

1938 में जब हैदराबाद में निजामशाही के शासन में हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ गए तो हैदराबाद आंदोलन के लिए हिन्दू महासभा और आर्य समाज के नेतृत्व में ‘भागानगर नि:शस्त्र प्रतिकार मंडल’ का सत्याग्रह हुआ। संघ ने साफ नीति अपनाई, जिनके पास संगठन का प्रमुख दायित्व है, वे वहीं रहें, बाकी स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से अवश्य भाग लें।

1942 में गांधी जी के ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो आंदोलन’ के आह्वान के समय भी संघ पीछे नहीं रहा। विदर्भ के चिमूर, बावली और आष्टी जैसे क्षेत्रों में कांग्रेस और संघ के कार्यकर्ता साथ लड़े। चिमूर में संघ स्वयंसेवक बालाजी रायपुरकर अंग्रेजों की गोली से बलिदान हुए। यह उस आंदोलन का एकमात्र बलिदान था, जिसमें एक स्वयंसेवक ने अपने प्राणों की आहुति दी। इस आंदोलन के चलते दिल्ली, बिहार, आर्वी, जशपुर, उज्जैन, हर जगह संघ कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए, घायल हुए, संपत्ति जब्त हुई। लेकिन इन बलिदानों का जिक्र शायद ही इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में मिले।

संघ और गांधी जी के संबंधों में मतभेद अवश्य रहे, विशेषकर मुस्लिम नेतृत्व को लेकर। लेकिन ये मतभेद कभी दुश्मनी में नहीं बदले। 1934 में गांधी जी वर्धा के संघ शिविर में आए और अनुसूचित जाति स्वयंसेवकों को भेदभाव-रहित वातावरण में देखकर प्रसन्न हुए। 1947 में दिल्ली में उन्होंने संघ के अनुशासन और सेवा-भाव की सार्वजनिक सराहना भी की।

इसके बाद आया 1947 का विभाजन, भारत के इतिहास का सबसे भीषण अध्याय। पंजाब, सिंध और बंगाल की धरती पर खून और आग का समुद्र उमड़ पड़ा। लाखों हिंदू और सिख परिवार उजड़ गए। ऐसे समय में संघ के स्वयंसेवक सबसे आगे खड़े थे। तत्कालीन सरसंघचालक गुरुजी गोलवलकर ने स्पष्ट निर्देश दिए, जहां भी कोई हिंदू, सिख या निर्दोष परिवार फंसा हो, चाहे वह पाकिस्तान के किसी भी हिस्से में हो, उसे सुरक्षित भारत लाने का हरसंभव प्रयास करो। जीवन का जोखिम उठाना पड़े, तो भी पीछे मत हटो। ऐसा ही हुआ। अनेक स्वयंसेवक बलिदान हुए, घायल हुए, लेकिन पीछे हटना किसी ने स्वीकार नहीं किया। पुनर्वास के बाद भी उन्होंने इन परिवारों को घर बनाने, रोजगार ढूंढने और बच्चों की शिक्षा में सहयोग दिया।

स्वतंत्रता केवल एक आंदोलन या एक दल का परिणाम नहीं थी। यह अनेक प्रयत्नों-सत्याग्रह, सशस्त्र क्रांति, आजाद हिंद फौज, सैनिक विद्रोह और सांस्कृतिक जागरण का संयुक्त फल था। स्वतंत्रता संग्राम और विभाजनकाल, दोनों ही दौर में रा.स्व. संघ ने वह भूमिका निभाई, जो मौन रहते हुए भी निर्णायक थी। यह हमें सिखाता है कि राष्ट्र की शक्ति केवल राजनीति से नहीं, बल्कि संगठित समाज, जाग्रत संस्कृति और त्याग की परंपरा से बनती है।

X @hiteshshankar

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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