भारत की लोकतांत्रिक राजनीति
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होम भारत

अराजकता की इंजीनियरिंग

सीएसडीएस द्वारा उछाले गए झूठ के सहारे व्यवस्था और सरकार पर हमला... यह भूल-चूक है या संगठित रणनीति के पैंतरे!

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 24, 2025, 04:00 pm IST
in भारत, विश्लेषण

भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में आज जो परिदृश्य उभर रहा है, वह किसी आकस्मिक भूल या केवल विपक्षी आलोचना का परिणाम नहीं है। बिहार में चल रहे मतदाता सूची सत्यापन (एसआईआर) को कांग्रेस और उसके गठबंधन ने रोकने के प्रयास किए और चुनाव आयोग पर योजनाबद्ध तरीके से मतदाताओं के नाम सूची से हटाने के आरोप लगाए।

इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय में याचिका भी दायर की गई। वहीं, सीएसडीएस ने महाराष्ट्र के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के आंकड़ों में हेरफेर कर मतदाताओं की संख्या में असंबंधित और भ्रामक अंतर दिखाया, जिससे चुनाव प्रक्रिया और लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा हुआ।

यह एक सुनियोजित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य स्थिर एवं लोकप्रिय सरकार को अस्थिर करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनसामान्य के विश्वास को कमजोर करना है। इसके तय आयाम, रणनीतियां और पहले से आजमाए जा चुके सिद्ध उदाहरण हैं।

शीतयुद्ध काल से ही बड़े राष्ट्र इस रणनीति का प्रयोग करते आए हैं कि बिना सीधे युद्ध के किसी देश की राजनीतिक संरचना को कैसे हिलाया जा सके। अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए के ‘डोमेस्टिक डी-स्टेबलाइजेशन प्रोजेक्ट्स’ इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। लातिनी अमेरिका, पूर्वी यूरोप और एशिया में झूठे प्रचार, मीडिया हेरफेर और सामाजिक असंतोष भड़काकर वैध सरकारों को गिराने के प्रयास हुए। यही पैटर्न आज भारत में भी देखने को मिलता है, जहां राजनीतिक विपक्ष, विदेशी फंडिंग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म इस रणनीति के तीन मुख्य स्तंभ बने हुए हैं।
आज की अराजकता केवल सड़कों या अखबारों तक सीमित नहीं है, बल्कि सबसे तीव्रता से सोशल मीडिया पर निर्मित होती है—

फेक न्यूज : झूठे आरोप, मनगढ़ंत आंकड़े और संपादित वीडियो के माध्यम से जनता के मन में संदेह पैदा किया जाता है।

सोशल बॉट्स : कृत्रिम ढंग से ‘ट्रेंड’ तैयार किए जाते हैं ताकि लगे कि जनमत विपक्षी दावों के पक्ष में है।

नैरेटिव रिप्लेसमेंट : जब कोई झूठ उजागर होता है, तो तुरंत नया आरोप गढ़कर विमर्श को दूसरी दिशा में मोड़ दिया जाता है।
यह रणनीति जनता की स्मृति को क्षणभंगुर और भ्रमित करने के लिए सबसे प्रभावी हथियार बन चुकी है।

भारत में हाल के वर्षों की कई घटनाएं इस पैटर्न की पुष्टि करती हैं-

  •  बिहार और कर्नाटक में विपक्ष ने महिलाओं के
    नाम लेकर ‘डबल वोट’ या ‘नाम कटने’ के झूठे आरोप लगाए, जिन्हें बाद में उन्हीं महिलाओं ने खारिज किया।
  •  सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि एसआईआर जैसी प्रक्रियाएं चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में हैं और इन पर बेबुनियाद आरोप लगाना संस्थागत स्थिरता को चोट पहुंचाता है।ये घटनाएं दर्शाती हैं कि इन अभियानों का उद्देश्य सच्चाई की खोज नहीं, बल्कि अविश्वास और भ्रम फैलाना है।भारत को अस्थिर करने की यह रणनीति इसके पड़ोसी देशों और वैश्विक मंच पर भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के दौरान झूठे नैरेटिव और अफवाहों ने राजनीतिक अस्थिरता बढ़ाई। पाकिस्तान-अमेरिका समीकरण और चीन-बांग्लादेश की नजदीकियां भारत में लोकतंत्र को ‘खतरे में’ दिखाने वाले नैरेटिव को समर्थन देते हैं। जॉर्ज सोरोस और अंतरराष्ट्रीय ट्रांसनेशनल एनजीओ भी इस प्रक्रिया में सक्रिय माने जाते हैं, जो विदेशी फंडिंग और रिपोर्टों के माध्यम से भारत की संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं।

ये पढ़ें – राजनीतिक रणनीति का पैटर्न

Topics: राजनीतिक विपक्षडबल वोटमतदाता सूचीपाकिस्तान-अमेरिका समीकरणविधानसभा चुनावचीन-बांग्लादेशविदेशी फंडिंगपाञ्चजन्य विशेषडिजिटल प्लेटफॉर्मसीएसडीएसअराजकता की इंजीनियरिंगलोकतांत्रिक राजनीतिमहाराष्ट्र के लोकसभा
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