15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, मगर उससे एक दिन पहले 14 अगस्त को उसका एक अंग काटकर अलग कर दिया गया। इस विभाजन के लिए जो खून की नदियां बहाई गई थीं, वह हिंसा अप्रत्याशित थी। लोगों को यह अनुमान ही नहीं था कि कभी एक साथ रहने वाले लोग, अपने ही मुल्क के लोगों के इस सीमा तक खिलाफ हो जाएंगे कि उसके लिए वे हत्याएं करेंगे, लड़कियों का बलात्कार और छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ेंगे।
विभाजन की इस विभीषिका की पीड़ा आज तक लोग झेल रहे हैं। स्मृतियां ताजी हैं। इसी विभीषिका को स्मरण करने के लिए भारत सरकार द्वारा विभाजन विभीषिका दिवस मनाया जाता है। इसमें कोई भी दो राय नहीं कि भारत भूमि का विभाजन मजहब के आधार पर हुआ था। एक मजहब के लोग भारत में हिंदुओं के साथ नहीं रहना चाहते थे, इसलिए उन्होनें विभाजन के लिए हर सीमा पार कर दी थी।
मगर क्या ऐसा हो सकता है कि भारत के इतिहास के इस महत्वपूर्ण पड़ाव की जानकारी देने वाले दिवस को इसलिए किसी प्रांत की सरकार द्वारा न मनाया जाए कि इससे सांप्रदायिक विद्वेष फैलेगा? आखिर इसमें सांप्रदायिक क्या है? भारत का विभाजन हुआ था और विभाजन के समय लाखों हिंदुओं का कत्ल हुआ था और महिलाओं के साथ तो बर्बरता की हर सीमा ही पार हो गई थी। भारत का विभाजन एक यथार्थ है और इतिहास है। क्या इससे कभी विमुख हुआ जा सकता है? क्या ऐसा कभी हो सकता है कि इतिहास के इस अंग को पूरी तरह से तोड़ दिया जाए? या बच्चों को पता ही न लगने दिया जाए और वह भी केवल इस आधार पर कि इससे सांप्रदायिक विद्वेष फैलेगा? आखिर यह कैसे हो सकता है? मगर केरल में ऐसा हुआ है। केरल के उच्च शिक्षा विभाग ने यह निर्देश देते हुए एक आदेश जारी किया कि पूरे राज्य में विभीजन विभीषिका दिवस नहीं मनाया जा सकता है।
एक ईमेल सर्कुलर में, विभाग ने कहा कि इस तरह के आयोजन सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ सकते हैं और धार्मिक प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा दे सकते हैं। विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया कि वे सभी संबद्ध कॉलेजों को इस आदेश का तत्काल पालन करने के लिए सूचित करें।
इस निर्देश को लेकर एसएफआई के राज्य सचिव पीएस संजीव ने कहा कि एसएफआई इस समारोह का विरोध करेगी।
केरल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के सर्कुलर में मनाए जाने का निर्देश था
केरल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर मोहनन कुन्नुममल ने संबद्ध कॉलेजों को एक परिपत्र जारी कर 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने और सीनेट हॉल में एक कार्यक्रम सहित अन्य कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश दिया था। यह निर्देश राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर द्वारा राज्य के विश्वविद्यालयों को 14 अगस्त को विभाजन की विभीषिका को याद करने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश के बाद आया था।
राज्यपाल के निर्देश को असंवैधानिक बताया
परंतु केरल की राजनीति में विभाजन विभीषिका का शायद स्थान नहीं है और केरल के मुख्यमंत्री ने राज्यपाल के इस निर्देश को असंवैधानिक बताया और एक्स पर लिखा था कि 15 अगस्त भारत के साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष और उसे दबाने के लिए अंग्रेजों द्वारा की गई क्रूरताओं की याद दिलाता है। संघ परिवार, जिसकी स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं थी और जिसने ब्रिटिश राज की सेवा की, अब विभाजनकारी एजेंडे को बढ़ावा देकर स्वतंत्रता दिवस को कमज़ोर करना चाहता है। राज्यपाल द्वारा विश्वविद्यालयों को 14 अगस्त को “विभाजन विभीषिका दिवस” के रूप में मनाने का निर्देश असंवैधानिक और अस्वीकार्य है। केरल अपने परिसरों को उनके विभाजनकारी एजेंडे का मंच बनने की कभी अनुमति नहीं देगा।
यह बहुत ही खेदजनक है कि केरल जैसे प्रांत विभाजन की उस सत्यता को अस्वीकार करते हैं, जो भारत के लिए विगत दशक की सबसे बड़ी पीड़ा है।
कहते हैं कि स्मृतियों का संरक्षण करके ही इतिहास का निर्माण होता है और यदि कटु या असहज स्मृतियों को ही नहीं सहेजा जाएगा, तो आने वाली सन्ततियां किस इतिहास का सामना कर पाएंगी? वे क्या इतिहास लिख पाएंगी? हालांकि इन तमाम प्रश्नों के बीच केरल में विभाजन विभीषिका दिवस नहीं मनाया गया।
















