वर्तमान में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा का चुनाव हो रहा है। कांग्रेस पार्टी इन सभी प्रदेशों में एक समय सबसे मजबूत और सत्तारूढ़ पार्टी हुआ करती थी। इन सभी प्रदेशों की राजनीति कांग्रेस पार्टी के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। दूसरे शब्दों में सभी प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी का एकछत्र राज हुआ करता था। मगर अब कांग्रेस पार्टी इन सभी राज्यों में अपने वजूद की तलाश में है। कांग्रेस पार्टी से इन राज्यों में अब कोई दल गठबंधन करने के लिए भी तैयार नहीं है और अगर गठबंधन करती है तो अपनी शर्तो पर ही करती है।
इन सभी प्रदेशों में सबसे बड़ा राज्य पश्चिम बंगाल हैं जहाँ विधानसभा की 294 सीट हैं। यहाँ कांग्रेस पार्टी 1977 तक सरकार में थी। इसके बाद वाम दलों के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस पार्टी मजबूत विपक्ष की भूमिका में थी। मगर ममता बनर्जी द्वारा अपनी अलग पार्टी बनाए जाने के बाद कांग्रेस पार्टी एक निर्जीव पार्टी की तरह या अपनी ही छाया बनकर रह गई है। वर्तमान में इस राज्य में कांग्रेस पार्टी का कोई भी विधायक नहीं है। वर्तमान में ऐसे पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, दिल्ली , नागालैंड, मेघालय और सिक्किम छह ऐसे प्रदेश हैं जहाँ कांग्रेस पार्टी का कोई भी विधायक नहीं है। इस बार कांग्रेस पार्टी से कोई भी दल ने गठबंधन में दिलचस्पी नहीं दिखाई है और कांग्रेस पार्टी अकेले सभी सीटों पर चुनाव लड़ने को मजबूर हो रही है।
1967 से तमिलनाडु की सत्ता से बाहर है कांग्रेस
तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी 1967 से सत्ता से बाहर है। 1967 तक तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी का एकछत्र राज रहा था और एम. भक्तवत्सलम कांग्रेस पार्टी के आखिरी मुख्यमंत्री थे। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी द्रमुक की कृपा दृष्टि पर राज्य में राजनीति कर रही है। स्टालिन राज्य मंत्रिमंडल में कांग्रेस पार्टी को स्थान नहीं देते हैं। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी के सीटों की संख्या और सीट भी स्टालिन ही तय करते हैं। इससे पूर्व स्टालिन के पिता एम करुणानिधि कांग्रेस पार्टी की तमिलनाडु में दिशा और दशा तय करते थे।
असम में सबसे अधिक वक्त तक सत्ता में रही कांग्रेस
पूर्वोत्तर राज्य असम में कांग्रेस पार्टी सबसे लम्बे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी है। यह पार्टी 2001 से 2016 तक लगातार तीन बार असम में सत्ता में रही। मगर 2016 के बाद कांग्रेस पार्टी अन्य राज्यों की तरह ही इस राज्य में केवल नाम मात्र की पार्टी बनकर रह गई है। कांग्रेस पार्टी असम में भी पश्चिम बंगाल की तरह ही केवल चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा भर बन रही है। कांग्रेस पार्टी विपक्षी दल बनाने के लिए जरूरत भर सीट प्राप्त कर लेती हैं तो असम में पार्टी के लिए उपलब्धि होगी।
केरल का हाल
केरल में कांग्रेस पार्टी जनता की नज़र में सत्ता के लिए चुनाव लड़ रही है, मगर यहाँ की राजनीती अलग है। कांग्रेस पार्टी नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट अपने सहयोगियों के साथ लगातार दो बार से विपक्ष में है। जबकि ,1982 से माकपा नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और यूडीएफ में चुनाव दर चुनाव सत्ता के अदल बदल की प्रक्रिया था। मगर 2021 में एलडीएफ ने लगातार दो बार सत्ता में वापसी की थी। इस बार भी यूडीएफ सत्ता से काफी दूर खड़ी दिख रही है। कांग्रेस पार्टी ने एलडीएफ को सत्ता से हटाने के लिए कोई भी सक्षम प्रयास नहीं किया है, बल्कि अपने को समयबद्ध चुनावी प्रक्रिया में केवल शामिल कर रही है। राजनीतिक संकेतों के अनुसार, 2019 में राहुल गाँधी के अमेठी के अलावा वायनाड से चुनाव लड़ने के समय सोनिया गाँधी और केरल के माकपा के मुख्यमंत्री पी विजयन के बीच एक गुप्त साठगांठ है।
जिसके, तहत कांग्रेस पार्टी कमजोरी से विधानसभा का चुनाव लड़कर पी विजयन को सत्ता में बने रहने में मदद करेगी। वहीं लोकसभा का चुनाव एलडीएफ कमजोरी से लड़कर वायनाड सीट गाँधी परिवार को और केरल से कूल 20 लोकसभा की सीटों में अधिकतम सीट कांग्रेस पार्टी को जीतने में मदद करेगी। इसी समझौते के तहत राहुल गाँधी 2024 में राय बरेली और वायनाड सीटों से लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद अपनी बहन के लिए वायनाड की सीट छोड़ी थी तब जबकि राय बरेली सीट उस परिवार के लिए पूरे देश में सबसे मुफीद सीट मानी जाती है।
पुडुचेरी में नहीं दिखा दमखम
केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे अधिक संभावना थी। मगर पार्टी ने इसके लिए कोई दमखम नहीं दिखाया। इस प्रदेश के चुनावी 30 विधानसभा सीटों पर 2024 के लोकसभा के चुनाव में 28 सीटों पर कांग्रेस पार्टी प्रथम पायदान पर रही थी। वहीं शेष दो सीटों पर भाजपा आगे रही थी। मगर कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव में अपने अच्छे प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव में बनाये रखने के लिए कोई भी सार्थक प्रयास नहीं किया और भाजपा अपने सहयोगी ऑल इंडिया एन.आर. कांग्रेस के साथ सत्ता बनाये रखने में कांग्रेस और इसके गठबंधन धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन से किसी भी तरह का चुनावी संघर्ष नहीं देखने को मिल रहा है। चुनाव बाद कांग्रेस पार्टी में बड़ी विद्रोह या बगावत की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। असम के नौगांव लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र भारत से कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने चुनाव पूर्व ही इस्तीफा देकर बड़े संकट के आहट का संकेत दे दिया है।














