डर, अनिश्चितता पीछे छोड़ दिया
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विभाजन – विभीषिका : डर, अनिश्चितता पीछे छोड़ दिया

मेरा जन्म बहावलपुर रियासत के छोटे से गांव में एक सिख परिवार में हुआ। पिता जमींदार थे। परिवार साधारण, लेकिन संतोषजनक जीवन व्यतीत करता था। आय गायों और भैंसों के दूध और खेती पर निर्भर था। इनकी कहानी मक्खन सिंह की जुबाानी-

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 13, 2025, 02:00 pm IST
inभारत, विश्लेषण
मक्खन सिंह, मूल स्थान— बहावलपुर

मक्खन सिंह, मूल स्थान— बहावलपुर

India Pakistan Partition : मेरा जन्म बहावलपुर रियासत के छोटे से गांव में एक सिख परिवार में हुआ। पिता जमींदार थे। परिवार साधारण, लेकिन संतोषजनक जीवन व्यतीत करता था। आय गायों और भैंसों के दूध और खेती पर निर्भर था। मेरा अधिकांश समय पिता के साथ खेतों में काम करने और मवेशियों की देखभाल में बीतता था।

सामाजिक व धार्मिक आयोजन पूरे गांव के लगभग 200 घरों और लगभग 1,000 लोगों को एक साथ जोड़ते थे। गांव के अधिकांश लोग किसान थे और राष्ट्रवादी आंदोलनों या बड़े राजनीतिक विमर्शों पर अधिक ध्यान नहीं देते थे। इसलिए स्वतंत्रता संग्राम में भी किसी तरह की सक्रिय भागीदारी नहीं थी। बंटवारे की कल्पना भी असंभव सी लगती थी।

मैं 17 वर्ष का था, जब बंटवारे की खबरें गांव तक पहुंचने लगीं। यह खबर अनिश्चितता और भ्रम लेकर आई। शुरू में लगा कि यह राजनीतिक अशांति दैनिक जीवन को प्रभावित किए बिना ही गुजर जाएगी। लेकिन जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि हमारा गांव पाकिस्तान में जाएगा।

जैसे-जैसे डर बढ़ा, गांव से लोग पलायन करने लगे। मेरे परिवार ने भी जाने का निर्णय लिया। जुलाई 1947 के अंतिम दिनों में आनन-फानन में और भारी मन से सब कुछ पीछे छोड़ना पड़ा— अपनी जमीन, मवेशी, घर और पीढ़ियों की यादें। हमारे पास बैलगाड़ी भी नहीं थी, जिससे सफर आसान होता। हम कुछ पड़ोसियों और रिश्तेदारों के छोटे समूह के साथ पैदल ही निकल पड़े। साथ में उतना ही सामान था, जितना उठा सकते थे।

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यात्रा लंबी और चिंता से भरी हुई थी। कोई निश्चित मंजिल नहीं थी, बस इतना मालूम था कि सीमा पार करना है। कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद हम फिरोजपुर पहुंचे, जहां संघर्ष और मुश्किलें पहले से इंतजार कर रही थीं। अनजाना शहर, कोई ठिकाना नहीं था, तो खुले स्थानों और रेलवे स्टेशनों पर रहना पड़ा। भोजन बहुत कम था और किसी तरह की सरकारी सहायता भी नहीं थी।

स्थानीय लोगों ने बहुत मदद की। उन्होंने हमारे जैसे हजारों शरणार्थियों को खाना, आश्रय और मानसिक संबल दिया। हमें सरकार से तेंडिवाल गांव में जमीन का छोटा-सा टुकड़ा मिला। यह उस जमीन की तुलना में बहुत कम थी, जो हम पीछे छोड़ आए थे। नई शुरुआत आसान नहीं थी। नए माहौल में खुद को ढाला और दोबारा जिंदगी शुरू की।

नए सिरे से खेती शुरू की, जिसमें चार बेटों ने मदद की। बहावलपुर में जिन लोगों को पीछे छोड़ आए थे, उनसे कोई संपर्क नहीं रहा। समय और दूरी ने अपनी पुश्तैनी ज़मीन से पूरी तरह अलग कर दिया।

पाकिस्तान और दीर्घकालिक सुरक्षा संकट : विभाजन का मोल

Topics: बहावलपुरTrue Stories of PartitionIndia Pakistan Partition StoriesHindus atrocities in Partitionभारत पाक बंटवारे की कहानीमक्खन सिंहविभाजन विभीषिकाVibhajan Vibhishikaपाञ्चजन्य विशेषPanchjanya Special
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