नेतृत्व का असमंजस और आंसुओं की बाढ़
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होम भारत

विभाजन-विभीषिका : नेतृत्व का असमंजस और आंसुओं की बाढ़

विभाजन-विभीषिका : नेतृत्व काविभाजन एक राजनीतिक कमजोरी, नैतिक चूक और विचारधारा से विचलन का परिणाम था। सरदार पटेल हमेशा जिन्ना की बंटवारे की मांग का विरोध करते रहे, लेकिन उनकी नहीं सुनी गई असमंजस और आंसुओं की बाढ़

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 12, 2025, 01:10 pm IST
in भारत, विश्लेषण
जवाहरलाल नेहरू, लार्ड माउंबेटन और मोहम्मद अली जिन्ना

जवाहरलाल नेहरू, लार्ड माउंबेटन और मोहम्मद अली जिन्ना

गांधीजी सांप्रदायिक राजनीति से दूर रहने की बात करते रहे, परंतु उन्होंने खिलाफत आंदोलन, खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे मामलों में मुस्लिम नेताओं से वैचारिक समझौते किए। नोआखाली हिंसा (1946) से ग्रस्त इलाकों में वे पैदल गए, किंतु राजनीतिक विकल्प के रूप में विभाजन का कड़ा विरोध नहीं किया। विभाजन की शुरुआत से ही भारतीय नेतृत्व दो ध्रुवों में बंटा था। महात्मा गांधी ने जहां अहिंसा और अखंड भारत के आदर्शों का पथ प्रशस्त किया, वहीं नेहरू ने तात्कालिक राजनीतिक दांवों में उलझ कर भारतीय सभ्यता की समष्टि भावना को कमजोर किया। गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन जैसे मुस्लिम हितों से मेल रखने वाले कदम उठाए और मुस्लिम नेताओं के साथ वैचारिक समझौतों में भी सहमति दी, लेकिन विभाजन के समय राजनीतिक रूप से निर्णायक विरोध करने में विफल रहे। यह दर्शाता है उनकी दुविधा, किन्तु अंततः उनका मौन पाकिस्तान की स्थापना को वैधता प्रदान कर गया।

गांधीजी की इस भूमिका को लेकर स्वयं तत्कालीन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पुस्तक “भारत का विभाजन : एक पुनर्मूल्यांकन” में स्पष्ट रूप से प्रश्न उठाया गया है। हिंदी में ”खंडित भारत” नाम से इस पुस्तक का अनुवाद हुआ है। इसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा है, “गांधीजी ने विभाजन का विरोध तो किया, पर वह विरोध केवल वैचारिक और भावनात्मक स्तर पर सीमित रह गया। उन्होंने कांग्रेस के नेताओं को खुलकर चुनौती नहीं दी, न ही जनता को आंदोलित किया। यदि वे चाहते, तो विभाजन की योजना को रोका जा सकता था, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया।”

विभाजन-विभीषिका: एक ऐतिहासिक त्रासदी थी भारत विभाजन…

नेहरू की अधीरता

नेहरू तत्काल सत्ता हस्तांतरण के पक्ष में थे। उन्हें भारत के बंटवारे की आशंका थी, फिर भी उन्होंने वैचारिक प्रतिरोध नहीं किया। जब 1946 में गांधी जी ने जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश की, नेहरू ने इसे अस्वीकार कर दिया था। इस संबंध में डॉ. राममनोहर लोहिया ने ‘भारत विभाजन के गुनहगार’ नाम से प्रकाशित पुस्तक में लिखा है कि गांधी जी ने जिन्ना को प्रधानमंत्री बना देने का सुझाव दिया था, यह कहकर कि इससे देश का बंटवारा रोका जा सकता है। परंतु कांग्रेस के नेता, विशेषकर नेहरू, इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। नेहरू ने कहा कि हम पुराने प्रस्तावों को अब स्वीकार नहीं कर सकते।”

पटेल की चेतावनी की अनसुनी

सरदार वल्लभभाई पटेल प्रारंभ से ही मुस्लिम लीग की मंशा को लेकर स्पष्ट थे। उन्होंने बार-बार कहा कि मुस्लिम लीग किसी सह-अस्तित्व की नहीं, सत्ता और पृथकतावाद की राजनीति करती है। सरदार पटेल की पुस्तक ‘भारत का विभाजन’ में वह लिखते हैं, ”दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद ब्रिटेन में 1945 में चुनाव हुए जिसमें लेबर पार्टी सत्ता में आई। विंस्टन चर्चिल की जगह क्लीमेंट एटली प्रधानमंत्री बने। लेबर पार्टी भारत की पूर्ण स्वतंत्रता नीति के लिए वचनबद्ध थी। भारत में राजनीतिक पार्टियों की शक्ति का आकलन करने के लिए केंद्रीय और प्रांतीय विधानसभा चुनावों की घोषणा कर दी गई। 1945 के अंत तक केंद्रीय विधानसभा के पहले चुनाव हुए। गैर मुस्लिम वोटों में से 91.3 प्रतिशत वोट कांग्रेस को मिले, जबकि मुस्लिम वोटों के 86.6 प्रतिशत वोट मुस्लिम लीग को मिले। 10 अप्रैल 1946 को जिन्ना ने विधानसभाओं के चुने गए सदस्यों की बैठक बुलाई और पाकिस्तान की मांग को फिर से दोहराया। सरदार पटेल ने जिन्ना के इस प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने इसे हास्यास्पद बताते हुए कहा कि इसका अर्थ यह हुआ कि एक पिता एक राष्ट्र का होगा, उसके बच्चे दूसरे राष्ट्र के।” अपनी पुस्तक में उन्होंने लिखा है, ” आज मुस्लिम लीग प्रचार कर रही है कि कांग्रेस में हिंदुओं का प्रभाव है। जबकि सच यह है कि गुलामों के पास न हिन्दुस्थान है न पाकिस्तान। यदि अंग्रेज भारत से चले जाएंगे तो मुसलमानों और हिंदुओं के बीच मतभेद दस वर्ष में समाप्त हो जाएंगे। जिन्ना बंटवारे की मांग कर मुसलमानों को गुमराह कर रहे हैं।”

भारत का विभाजन तय

माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) के तहत भारत का विभाजन स्वीकार किया गया। कांग्रेस कार्यसमिति ने बिना जनमत संग्रह या पूर्ण विचार-विमर्श के इसे स्वीकार कर लिया। संविधान सभा में कोई विस्तृत बहस नहीं हुई, ना ही आम जनता से संवाद किया गया। रजनी देसाई ने अपनी पुस्तक ”फ्रीडम स्ट्रगल बिट्रेड” में लिखा है कि कांग्रेस नेतृत्व ने विभाजन जैसे निर्णायक निर्णय पर जनता की राय जानने की पहल नहीं की। माउंटबेटन की योजना को तत्काल स्वीकार कर लिया गया, बिना जनमत संग्रह के, बिना गहराई से विचार-विमर्श किए, इस पर विस्तृत बहस नहीं हुई। यह एक राजनीतिक फैसला अधिक था, लोकतांत्रिक प्रक्रिया कम।”

विभाजन-विभीषिका: जो आंखों ने देखा दिल में उसकी टिस आज भी है…. उस वक्त मेरी उम्र 17 साल थी

सत्ता की जल्दबाजी

ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण की योजना मूल रूप से जून 1948 के लिए बनाई थी, पर माउंटबेटन ने इसे अगस्त 1947 तक लाैटा दिया, जिससे तैयारियों का अभाव और विभाजन की त्रासदी बढ़ी। नेहरू ने इस शीघ्रता को स्वीकार किया, गांधी जी ने चुप्पी साधी, जबकि पटेल व्यथित हुए। यह दर्शाता है कि नेताओं के बीच असमंजस, वैचारिक समन्वय की कमी और सत्ता की लालसा ने राष्ट्र के भविष्य को उचित समय और व्यापक चर्चा के बिना दांव पर लगा दिया। संविधान सभा के सदस्य डॉ. के. एम. मुंशी ने इसे ”सत्ता पाने की लालसा में राष्ट्र को चोट पहुंचाना” बताया। के.एम. मुंशी अखंड भारत के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपनी पुस्तक “Pilgrimage to Freedom” में लिखा है कि भारत का विभाजन एक स्थायी समाधान नहीं है बल्कि एक ऐतिहासिक भूल है, जो भविष्य में गंभीर समस्याएं खड़ी करेगा। उन्हें लगता था कि कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर नेहरू और माउंटबेटन की जोड़ी ने जल्दबाजी में निर्णय लिया और राष्ट्र के दीर्घकालिक हितों को नजरअंदाज किया। कांग्रेस नेतृत्व ने जिन्ना के भय और हिंसक परिस्थितियों से दबाव में आकर पाकिस्तान को मान्यता दी। भारत की पौराणिक और प्राचीन सांस्कृतिक निरंतरता को एक प्रशासनिक निर्णय के तहत तोड़ दिया गया। यह निर्णय तत्काल सत्ता के स्वार्थ में दीर्घकालिक एकता के लिए एक बड़ा आघात था।

जिन्ना की रणनीतिक सफलता

जिन्ना ने अपने वैचारिक रुख पर अडिग रहते हुए पूरा पाकिस्तान ले लिया, बिना ज्यादा कीमत चुकाए। मुस्लिम लीग ने 1946 में कांग्रेस के हर प्रस्ताव को अस्वीकार किया, और सीधे विभाजन की मांग की। भारतीय नेतृत्व इसके बाद भी सत्ता के लिए झुकता रहा। भारत में नेतृत्व झुक गया, और पाकिस्तान का निर्माण हो गया। कांग्रेस ने जिन्ना के भय और हिंसा के आगे झुककर पाकिस्तान को मान्यता दी। भारत की 5000 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक निरंतरता को एक प्रशासनिक निर्णय के तहत तोड़ दिया गया। जिन्ना ने अपने वैचारिक आग्रह पर दृढ़ता से कायम रहते हुए बोझिल संघर्ष के बिना पाकिस्तान की स्थापना की। मुस्लिम लीग ने वर्ष 1946 में कांग्रेस के हर समझौते के प्रस्ताव को खारिज किया और पाकिस्तान के गठन की मांग पर अड़ी रही। भारतीय नेतृत्व ने परिस्थिति के दबाव में झुक कर इस मांग को स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार, भारत का नेतृत्व कमजोर पड़ गया और पाकिस्तान का निर्माण संभव हो पाया।

तुष्टीकरण और मुस्लिम अलगाववाद : भारतीय राष्ट्रभाव के सामने कट्टरपंथी चुनौती

गांधी-नेहरू के विरोधाभास

गांधीजी और नेहरू, दोनों की वैचारिक असंगति और राजनीतिक अदूरदर्शिता ने भारत को विभाजित कर दिया। जहां गांधीजी अहिंसा, अखंड भारत और आत्म संयम पर विश्वास करते थे, वहीं नेहरू ने आधुनिकता, सेकुलरिज्म और पश्चिमी लोकतंत्र मॉडल को अंगीकार किया। इस वैचारिक असंयम ने राजनीतिक निर्णयों में अनिर्णय और अधीरता को जन्म दिया, जो अंततः विभाजन का कारण बने।

राजनीति कमजोरी का परिणाम

भारत का विभाजन एक राजनीतिक कमजोरी, नैतिक चूक और विचारधारा से विचलन का परिणाम था। नेतृत्व ने दीर्घकालिक सांस्कृतिक एकता को छोड़कर तात्कालिक सत्ता का वरण किया। यह निर्णय एक पीढ़ी के रक्त से लिखा गया – जो इतिहास के सबसे काले पन्नों में दर्ज है। यदि भारत को भविष्य में सशक्त, अखंड और नैतिक राष्ट्र बनना है, तो उसे इस विफलता से सबक लेकर नेतृत्व की कसौटियों को पुनः परिभाषित करना होगा, न्याय, समरसता और दीर्घकालिक राष्ट्रहित के आधार पर। भारत का विभाजन स्वतंत्रता संग्राम का सबसे त्रासद और विवादित अध्याय है। इसे प्रायः अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति या मुस्लिम लीग की पृथकतावाद राजनीति का परिणाम माना जाता है, किन्तु एक अनदेखी ओर भी रही है, भारतीय नेतृत्व की अदूरदर्शिता और नैतिक विफलता। जब सत्तासीन नेताओं ने दीर्घकालिक राष्ट्रहित की जगह तात्कालिक सत्ता स्वीकृति को प्राथमिकता दी, तो भारत की एकता और संप्रभुता सटीक दिशा खो बैठी। उस ऐतिहासिक नैतिक पराजय का तर्कपूर्ण विवेचन आज भी आवश्यक है, जो वर्तमान भारतीय जनमानस के इतिहास बोध और भविष्य दृष्टि दोनों ही के लिए आवश्यक है।

पाकिस्तान और दीर्घकालिक सुरक्षा संकट : विभाजन का मोल

उपेक्षित रहे राष्ट्रीय स्वर

सावरकर, गोलवलकर, डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं की चेतावनियां असनुनी की गई जिन्होंने भारत की अखंडता की आवाज उठाई, उन्हें उचित स्थान नहीं मिला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा को प्रमुखतः ‘हिंदू कट्टरपंथी’ बताकर खारिज कर दिया गया। अंततः भारत का विभाजन केवल राजनीतिक दुर्बलता नहीं, बल्कि नैतिक चूक और वैचारिक विसंगति का परिणाम था। दीर्घकालिक राष्ट्रहित की अनदेखी करके तत्कालीन नेतृत्व ने एक अधूरे राष्ट्र का निर्माण किया, जिसकी कीमत एक पीढ़ी के खून और विस्थापन के रूप में चुकानी पड़ी। इतिहास के पन्नों में यह निर्णय भारत के लिए एक नैतिक पराजय के रूप में अंकित हुआ। यदि भारत एक सशक्त, समरस और अखंड राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित होना चाहता है, तो उसे आत्मपरीक्षा करते हुए नेतृत्व के आदर्शों और कार्यशैली को पुनः परिभाषित करना होगा। न्याय, समरसता, और दीर्घकालिक राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना अनिवार्य है, ताकि भविष्य में ऐसी विभाजनकारी त्रासदियों से बचा जा सके।

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