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उत्तर-दक्षिण भारत के सांस्कृतिक सेतु

तमिल में ऋषि अगस्त्य को ही ऋषि अगस्तायार कहा जाता है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार वे पहले ऋषि थे, जिन्होंने उत्तर भारत से दक्षिण भारत का भ्रमण किया और वहां वेद, संस्कृत और सनातन संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया

Written byआचार्य राघवेंद्र प्रसाद तिवारीआचार्य राघवेंद्र प्रसाद तिवारी
May 9, 2025, 04:46 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति

भारतीय संस्कृति यदि आज भी दुनियाभर में एक आदर्श रूप में प्रतिष्ठित है, तो इसका श्रेय यहां के उन ऋषियों, मुनियों एवं तपस्वियों को जाता है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन चराचर जगत के कल्याण हेतु न्योछावर किया। एक ऐसे ही ऋषि हैं अगस्त्य। वे भारतीय पौराणिक कथाओं, चारों वेदों और धर्मग्रंथों में ऐसे महर्षि के रूप में समादृत हैं, जिन्होंने समाज, धर्म, विज्ञान एवं संस्कृति को नई दिशाएं दीं। वे केवल तपस्वी एवं ज्ञानी ही नहीं, अपितु समाज सुधारक, भाषा प्रवर्तक, वैज्ञानिक, चिकित्सक और संस्कृति के उपासक भी थे। उनके पिता ऋषि पुलस्त्य ब्रह्मा के मानसपुत्रों में से एक थे। एक कथानक के अनुसार जब अप्सरा उर्वशी मित्र और वरुण के समक्ष प्रकट हुईं, तो उनके तेज से एक कलश उत्पन्न हुआ, जिससे अगस्त्य ऋषि का जन्म हुआ। इसीलिए अगस्त्य ऋषि को ‘कुंभज’ भी कहा जाता है। उनकी पत्नी लोपामुद्रा भी एक विदुषी और वेदमर्मज्ञ थीं।

आचार्य राघवेंद्र पी. तिवारी
कुलपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा

इन दोनों के वैवाहिक जीवन से यह संदेश मिलता है कि गृहस्थ जीवन में रहकर भी ज्ञान साधना की जा सकती है, आध्यात्मिक जीवन जिया जा सकता है। ऋषि अगस्त्य के जीवन, तपस्या, ज्ञान, सेवा एवं आदर्श का वर्णन वेदों और पुराणों में मिलता है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 165 सूक्त से 191 तक के सूक्तों को अगस्त्य ऋषि द्वारा रचित बताया जाता है। उनके जीवन का उद्देश्य समाज को जागरूक करना, आध्यात्मिक चेतना का उत्कर्ष एवं धर्म और विज्ञान को समृद्ध करना था।

विविधता भारतवर्ष की शक्ति एवं सौंदर्य है। किंतु कई बार इस विविधता को हमारे विरुद्ध कमजोरी के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इस समस्या को दूर करने तथा देश की एकता और अखंडता को पुन:परिभाषित करने में महर्षि अगस्त्य ने अतुलनीय योगदान दिया। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार वे पहले ऋषि थे, जिन्होंने उत्तर भारत से दक्षिण भारत का भ्रमण किया और वहां वेद, संस्कृत और सनातन संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया। स्कंद पुराण के अनुसार, जब शिव-पार्वती का शुभ विवाह होने वाला था तब इस अलौकिक दृश्य का साक्षी बनने हेतु पूरी दुनिया हिमालय आई थी। फलस्वरूप वजन की अधिकता से पृथ्वी एक ओर झुक गई थी। तब शिव के कहने पर अगस्त्य ऋषि संतुलन स्थापित करने के निमित्त काशी से दक्षिण की ओर चले गए थे।

तमिल भाषा एवं साहित्य के विकास में विशिष्ट योगदान हेतु अगस्त्य ऋषि की पहचान तमिल संस्कृति नायक के रूप में है। उन्हें तमिल व्याकरण, काव्यशास्त्र एवं साहित्य का भी जनक माना जाता है। ‘अगस्त्य व्याकरणम्’ (अगत्तियम, अकट्टियम) उनकी प्रसिद्ध रचना है, जिसमें तमिल भाषा के व्याकरण और साहित्यिक परंपराओं का उल्लेख है। उनके प्रयासों से तमिल भाषा, साहित्य, कृषि व्यवस्था एवं सिंचाई को एक नई पहचान मिली। भाषा एवं साहित्य से इतर अगस्त्य ऋषि को आयुर्वेद और चिकित्सा शास्त्र का प्रणेता भी माना जाता है। उन्होंने दक्षिण भारत में औषधीय पौधों एवं उनके उपयोग के ज्ञान का प्रसार किया। उनके द्वारा रचित ‘अगस्त्य संहिता’ में कई औषधीय पौधों का वर्णन मिलता है। उनकी चिकित्सा पद्धति में नाड़ी परीक्षण, जड़ी-बूटियों का उपयोग एवं रोगों के निवारण के उपाय शामिल थे।

अपने कल्याणकारी कार्यों को स्थिरता एवं गति देने हेतु उन्होंने दक्षिण भारत में कई आश्रम स्थापित किए, जहां उन्होंने लोगों को वेद, आयुर्वेद और धर्मशास्त्र की शिक्षा दी। उनके प्रयासों से दक्षिण भारत में वैदिक परंपराओं की नींव पड़ी और उत्तर-दक्षिण का भेद मिटा। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार, विंध्य पर्वत ने अपनी ऊंचाई बढ़ाकर सूर्य देव का मार्ग अवरुद्ध कर दिया था। इस समस्या से चिंतित देवताओं ने अगस्त्य ऋषि से सहायता मांगी। महर्षि ने तपोबल से विंध्य पर्वत को झुकने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पर्वत से यह वचन लिया कि वह तब तक झुका रहेगा जब तक वे दक्षिण से लौटकर वापस न आएं।

किंतु ऋषि दक्षिण भारत के पोथिगई पहाड़ों में स्थाई रूप से बस गए। माना जाता है कि इसी कारण विंध्य पर्वत आज भी झुका हुआ ही है। आशय यह है कि यदि विंध्य की ऊंचाई कम ने होती तो दक्षिण एवं उत्तर भारत के बीच मार्ग अवरुद्ध हो जाता। अगस्त्य ऋषि ने ही विंध्य पर्वत को झुकाकर यह मार्ग सुगम बनाया और दोनों क्षेत्रों के मध्य आपसी जुड़ाव को बढ़ावा दिया। इन्हीं कारणों से तमिल परंपराओं में अगस्त्य को दार्शनिक और व्यावहारिक ज्ञान के दोनों पक्षों में सबसे पहले एवं महत्वपूर्ण सिद्धर (तमिल में चित्तर) यानी ‘ज्ञान को पूरा करने या ज्ञान में सिद्ध होने’ वाला गुरु एवं ऋषि माना जाता है।

उन्हें तमिलनाडु के भारतीय मार्शल आर्ट सिलंबम एवं विभिन्न रोगों के लिए वर्मम बिंदुओं का उपयोग करके उपचार करने हेतु प्राचीन विज्ञान वर्मम का संस्थापक माना जाता है। केरल के एक भारतीय मार्शल आर्ट कलरीपयट्टू के दक्षिणी रूप के चिकित्सकों द्वारा भी इनका उपयोग किया जाता है। मान्यता है कि शिव के पुत्र भगवान मुरुगन ने अगस्त्य ऋषि को वर्मम सिखाया था, जिन्होंने फिर इस पर ग्रंथ लिखे और इसे अन्य सिद्धों को दिया। इस प्रकार भारतीय आद्य ऋषि परंपरा में अगस्त्य एक ऐसे महान तपस्वी के रूप में वर्णित है, जिन्होंने संस्कृत एवं तमिल दोनों भाषाओं को अपनी ज्ञान मीमांसा से समृद्ध किया एवं लोकप्रिय बनाया। फलस्वरूप उन्होंने इन दोनों प्राचीन भाषाओं के एकीकरण एवं सद्भावना में महनीय योगदान दिया।

इतना ही नहीं, अगस्त्य ने असुरों और राक्षसों का दमन कर धर्म की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वातापी और इल्लवाल नामक असुर अपनी मायावी शक्तियों से ऋषियों एवं साधकों को उत्पीड़ित करते थे। अतएव उन्होंने इल्लवाल और वातापी का विनाश किया। यह कथा दर्शाती है कि वे न केवल एक साधक तपस्वी थे, बल्कि पराक्रमी और साहसी भी थे। धर्म मार्ग में जो भी अवरोधक थे, उनका उन्होंने सदैव प्रतिकार किया। मान्यता है कि जब श्रीराम और रावण के बीच युद्ध हुआ तो देखने वाले साधुओं में अगस्त्य ऋषि भी थे। श्रीराम के चिंतित होने पर अगस्त्य ने श्रीराम को सूर्य की अराधना करने वाला ‘आदित्य हृदय’ नामक एक पवित्र स्तोत्र दिया। इस मंत्र का तीन बार जाप करते ही श्रीराम में रावण को मारने की शक्ति आ गई।

‘अगस्त्य संहिता’ उनका एक अति महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें वर्णित वैदिक विज्ञान आज भी वैज्ञानिकों को आश्चर्यचकित करता है। इसमें यंत्र निर्माण, विद्युत उत्पादन एवं अन्य तकनीकी विधियों का उल्लेख है।

उदाहरण के लिए, इसमें एक ‘जल बैटरी’ का वर्णन मिलता है, जिसमें तांबा एवं जस्ता धातु का उपयोग कर विद्युत उत्पादन की विधि दी गई है, जो प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति को दर्शाती है। इसलिए अगस्त्य ऋषि को ‘बैटरी बोन’ भी कहते हैं। इसके अलावा महर्षि ने गुब्बारों को आकाश में उड़ाना और विमान संचालित करने की तकनीकी का भी उल्लेख किया है। अगस्त्य पानी के विखंडन की विधि भी जानते थे। इसीलिए उनके बारे में ऐसी जनश्रुति है कि वे अपनी मंत्र शक्ति से सारे समुद्र का जल पी गए थे।

जल-जंगल-जमीन जिसके संरक्षण की बात आज बहुत गहराई से महसूस की जा रही है, उस दिशा में अगस्त्य ऋषि प्राचीन काल से ही कार्य कर रहे थे। उन्होंने प्रकृति संरक्षण एवं औषधीय पौधों के उपयोग का संदेश दिया। वे प्रकृति प्रेमी और पर्यावरण संरक्षक थे। उनके इन कार्यों की स्मृतियों को सजोने के लिए दक्षिण भारत के प्रसिद्ध पर्वतीय क्षेत्र को ‘अगस्त्य माला’ कहा जाता है। यह क्षेत्र अपनी जैव विविधता और प्राकृतिक संपदा के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में यह भी मान्यता है कि उन्होंने द्वारका से अठारह वेलिर जनजातियों के दक्षिण की ओर प्रस्थान का नेतृत्व भी किया था।

तात्पर्य यह है कि उत्तर भारत की किंवदंतियों में वैदिक परंपरा और संस्कृत के प्रचार-प्रसार में अगस्त्य ऋषि की भूमिका असंदिग्ध है। जबकि दक्षिणी परंपराओं में सिंचाई, कृषि के प्रसार और तमिल भाषा के संवर्धन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि हम समग्रता में विचार करें तो उनका जीवन धर्म, विज्ञान और संस्कृति के समागम का अद्वितीय प्रतीक है। उन्होंने धार्मिक ज्ञान को विज्ञान, भाषा एवं संस्कृति के साथ जोड़कर विशेष तौर पर दक्षिण समाज को नई दशा-दिशा दी। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कैसे ज्ञान और तपस्या के माध्यम से प्रकृति और समाज को समृद्ध किया जा सकता है। सांस्कृतिक संबंधों को पुनस्स्थापित कर दो समाज, दो क्षेत्र के मध्य काल्पनिक दूरी को मिटाने की प्रेरणा भी उनसे ली जा सकती है। उनका जीवन हमें त्याग, तपस्या और मानवता की सेवा का मार्ग प्रशस्त करता है। वे भारतीय संस्कृति एवं इतिहास की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं, जिनके व्यक्तिव एवं कर्तृत्व से हमें राष्ट्रीय एकता तथा मानव कल्याणार्थ कृतसंकल्पित होकर सद्कार्य करने की प्रेरणा सदैव मिलती रहेगी

Topics: ऋषि अगस्त्यपाञ्चजन्य विशेषसंस्कृत और सनातन संस्कृतिसंस्कृति के उपासकअगस्त्य संहितावेदभारतीय संस्कृतिसांस्कृतिक सेतु
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