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आतंकियों से जुड़ती हिंसा की कड़ियां

मुर्शिदाबाद हिंसा के तार बांग्लादेश के आतंकी संगठनों से जुड़ रहे हैं। हिंसा की तैयारी लंबे समय से की जा रही थी, इसके लिए स्थानीय स्तर पर और विदेशों से पैसे मिल रहे थे। हिंसा का तरीका वही था, जिसे सीएए विरोध प्रदर्शनों के दौरान आजमाया गया

Written byनागार्जुननागार्जुन
Apr 21, 2025, 03:29 pm IST
inविश्लेषण, पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में वक्फ संशोधन कानून के विरोध में जो हिंसा हुई, वह सुनियोजित थी। यह हिंसा 2019 में नागरिक संशोधन कानून (सीएए) के विरुद्ध हुए हिंसक प्रदर्शनों के जैसी है। हिंसा फैलाने के लिए वही हथकंडे अपनाए गए, जो सीएए के विरुद्ध हुए विरोध-प्रदर्शनों में आजमाए गए थे। खुफिया एजेंसियों के अनुसार, मुर्शिदाबाद हिंसा में टेलीग्राम, व्हाट्सएप जैसे माध्यमों का उपयोग विरोध प्रदर्शन आयोजित करने, जिम्‍मेदारी बांटने और रियल टाइम दिशा-निर्देश देने के लिए किया गया। इनका इस्तेमाल सीएए विरोधी प्रदर्शनों में भी किया गया था। तीन महीने पहले इसका खाका बनाया गया था, जिसके लिए विदेशों से पैसे मिले थे।

खुफिया एजेंसियों की मानें तो दंगाइयों को 500 रुपये दिए गए थे। षड्यंत्रकारियों की मंशा पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश की तर्ज पर अराजक स्थिति पैदा करना थी। इसमें बांग्लादेश के दो आतंकी संगठन जमात-उल मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) शामिल हैं। आईएसआई समर्थित एबीटी पूरे दक्षिण एशिया में शरिया कानून लागू करने के एजेंडे पर काम कर रहा है। वहीं एबीटी 2013 से 2015 तक बांग्लादेश में ब्लॉगर्स पर हमलों और उनकी हत्या सहित कई आतंकी गतिविधियों में शामिल रहा है। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार का तख्ता पलटने में भी दोनों आतंकी संगठन शामिल थे। अभी तक जो जानकारी सामने आई है, उसके अनुसार, एबीटी के दो शीर्ष आतंकी दो माह पहले मुर्शिदाबाद आए थे और ‘बड़ी दावत’ की बात कही थी। आतंकी माैके की ताक में थे। हिंसा को अंजाम देने के लिए पहले रामनवमी की तारीख तय हुई थी और इसके लिए गुर्गों को बाकायदा 3 महीने तक प्रशिक्षण दिया गया था। लेकिन कड़ी सुरक्षा के कारण उन्हें माैका नहीं मिला। इसी बीच, वक्फ विधेयक संसद में पेश हुआ और उन्हें माैका मिल गया।

पश्चिम बंगाल आतंकियों का गढ़!

इस वर्ष फरवरी में एसटीएफ ने मुर्शिदाबाद के हरिहरपाड़ा से एबीटी के दो आतंकियों मिनारुल शेख और मोहम्मद अब्बास अली को गिरफ्तार किया था। दोनों ने पूछताछ में मेटियाब्रुज से जेएमबी को आर्थिक मदद मिलने का खुलासा किया था। हुगली स्थित खगरागढ़ में जो विस्फोट हुए थे, उसके लिए मेटियाब्रुज के कई ‘व्यापारियों’ ने जेएमबी को आर्थिक मदद की थी। शेख और अली की निशानदेही पर एबीटी के आईईडी विशेषज्ञ नूर इस्लाम, बांग्लादेशी नागरिक शाद रवि और अन्य को भी गिरफ्तार किया गया था। ये विस्फाेटक बनाने के लिए जो कच्चा माल खरीद रहे थे, उसके लिए पैसे मटियाब्रुज से मिल रहे थे। अब यह बात सामने आ रही है कि मुर्शिदाबाद में 10-12 अप्रैल के बीच हुई हिंसा में बांग्लादेशी आतंकियों की मदद एक राजनीतिक दल के स्थानीय नेताओं ने की थी। आतंकियों का मददगार राजनीतिक दल कौन है? वे स्थानीय नेता कौन-काैन हैं? क्या यही लोग एबीटी को फिर से खड़ा करने के लिए खाद-पानी दे रहे हैं? याद कीजिए भाजपा नेता राहुल सिन्हा ने हाल ही में कहा था, ‘’पश्चिम बंगाल आतंकियों का गढ़ ही नहीं, बल्कि उनका मुख्य आधार है। ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की राजनीति ने एक खास समुदाय को पश्चिम बंगाल में स्वर्ग जैसा अहसास कराया है। आतंकियों की जड़ें बहुत गहरी हैं, जिन्हें उखाड़ा नहीं जा सकता।’’

आतंक का ‘बांग्लादेश मॉडल’

वास्तव में, बांग्लादेश में उथल-पुथल के बाद अब आतंकी संगठन भारत में आतंकी हमलों की साजिश रच रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत पर आतंकी हमला करने के लिए एबीटी ने 2022 में लश्कर-ए-तैयबा के साथ हाथ मिलाया था। इसके बाद एबीटी के लगभग 50 से 100 आतंकी त्रिपुरा में घुसपैठ की योजना बना रहे थे, लेकिन खुफिया एजेंसियों की सतर्कता और कई आतंकियों की गिरफ्तारी के बाद आतंकी संगठन अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सके। भाजपा के पूर्व सांसद अर्जुन सिंह कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के नौ जिलों की जनसांख्यिकी पूरी तरह बदल चुकी है। इन जिलों का नियंत्रण बांग्लादेशी अपराधियों के पास है। पुलिस के हाथ में राज्य की कानून व्यवस्था है ही नहीं।

मुद्दे पर लौटते हैं। दरअसल, ‘बांग्लादेश मॉडल’ आतंकवाद फैलाने का नया तरीका है। खुफिया एजेंसियों का कहना है कि बांग्लादेश की तर्ज पर षड्यंत्रकारियों का लक्ष्य मुर्शिदाबाद हिंसा की आड़ में ट्रेनों को बाधित करना, सरकारी संपत्ति को नष्ट करना, हिंदुओं की हत्या व उनके घरों को लूटना था। हमलावरों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वे जितना अधिक नुकसान करेंगे, उतना अधिक पैसा मिलेगा। इसके लिए फंडिंग तुर्किए से की जा रही थी। आज वक्फ संशोधन कानून, पिछले साल रामनवमी, उससे पहले सीएए…हर बार नए-नए बहाने से राज्य में हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि यह ‘विरोध प्रदर्शन’ वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ है। लेकिन सच यह है कि राज्य में कट्टरपंथियों को हिंदू खटकने लगे हैं। कई जिलों में, विशेष कर बांग्लादेश की सीमा से लगते जिलों में मुसलमान बहुसंख्यक हो गए हैं और हिंदू अल्पसंख्यक। इसीलिए वे हर बार नए-नए बहाने से हिंदुओं पर लक्षित हमले कर रहे हैं, ताकि वे वहां से भाग जाएं।

भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, ‘’यहां आपको हमास, फिलिस्तीन, पाकिस्तान, सीरिया और यहां तक कि आईएसआईएस के झंडे भी खुलेआम लहराए जाते हैं। लेकिन रामनवमी पर वाहनों से झंडे उतार दिए जाते हैं। कोलकाता क्या ढाका या अफगानिस्तान बन गया है? क्या ममता बनर्जी यही चाहती हैं?

वोट बैंक पर ममता की नजर

राज्य सरकार कट्टरपंथियों को पूरा समर्थन दे रही है। अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तुष्टीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। राज्य में कुल मुस्लिम मतदाता 30 प्रतिशत से अधिक हैं, जिनका लगभग 100 से 120 विधानसभा सीटों पर प्रभाव है। मुर्शिदाबाद में लगभग 70 प्रतिशत, मालदा में 57 प्रतिशत, जबकि उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना जिलों में 40 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम मतदाता हैं। मुर्शिदाबाद में 22 और मालदा में 12 विधानसभा सीटें हैं। जिस मुर्शिदाबाद में हिंसा हुई, वह मुस्लिम बहुल है। यहां की सभी संसदीय सीटों पर मुस्लिम सांसद काबिज हैं। इसके अलावा, 8 में से 7 नगरपालिकाओं और सभी 26 पंचायत समितियों पर भी तृणमूल कांग्रेस का नियंत्रण है। इसलिए ममता बनर्जी मुसलमानों को तुष्ट करने का कोई मौका नहीं छोड़तीं। मुसलमानों को खुश करने के लिए वे दुर्गापूजा और हिंदुओं द्वारा निकाली जाने वाली शोभायात्राओं पर भी पाबंदी लगा देती हैं।

उन्हें वोट बैंक की चिंता है, इसलिए वे इमामों, मुअज्जिमों और मुस्लिम नेताओं से लगातार मिल रही हैं। इसी कवायद में 16 अप्रैल को कोलकाता में आयोजित इमामों और मुअज्जिमों की बैठक में उन्होंने कहा, ‘’मैं हर साल ईद पर रेड रोड नमाज़ पढ़ने जाती हूं।‘’ इससे पहले उन्होंने वक्फ संशोधन कानून को ‘भाजपा का कानून’ करार देते हुए कहा कि वे अपने राज्य में इसे लागू नहीं होने देंगी। उन्होंने मुसलमानों और उनकी संपत्ति की सुरक्षा की बात तो की, लेकिन हिंदुओं पर हो रहे हमलों पर चुप्पी साध ली।

क्या मुख्यमंत्री का यह रुख जिहादियों के हौसलों को बुलंद करने वाला नहीं है? नया वक्फ कानून लागू नहीं करने के उनके बयान के बाद ही राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जिहादियों ने उत्पात मचाया और प्रशासन मूक दर्शक बना रहा।

बहुत कुछ कहती है चुप्पी

राज्य में आए दिन हिंसा होती है, जिसमें हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है, लेकिन सरकार और पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। ऊपर से वे कहती हैं कि हर जाति और मत-मजहब के लोगों को विरोध करने का अधिकार है। दूसरी ओर, उनके सांसद बापी हलदर कहते हैं, ‘’वक्फ एक समुदाय की संपत्ति है। अगर कोई उसकी तरफ देखेगा तो उसकी आंखें फोड़ देंगे और हाथ-पैर तोड़ देंगे।’’ विधेयक के पारित होने से पहले तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी ने भड़काऊ बयान दिया, ‘जहां भी मुसलमान प्रार्थना करते हैं, वह जमीन वक्फ की हो जाती है। भाजपा उन संपत्तियों को जब्त कर लेगी।’

इससे स्पष्ट है कि सत्तारूढ़ दल और उसके नुमाइंदे सुनियोजित तरीके से न केवल हिंसा को समर्थन दे रहे हैं, बल्कि मुस्लिम समुदाय को हिंदुओं पर हमला करने के लिए भी उकसा रहे हैं। राष्ट्रपति ने 5 अप्रैल को विधेयक को मंजूरी दी और 8 अप्रैल से राज्य में हिंसा भड़क उठी। जंगीपुर, उमरपुर, सुति, धुलियान, सजुर मोड़ और रघुनाथगंज जैसे इलाकों में प्रदर्शनकारियों के भेष में कट्टरपंथियों ने बड़े पैमाने पर हिंसा की। दंगाइयों ने पुलिस पर भी हमले किए और तीन पुलिस वाहनों, एक एम्बुलेंस व एक सरकारी एनबीएसटीसी बस को पेट्रोल बम से जला दिया। हिंदू इलाकों में जमकर आगजनी, मारपीट और लूटपाट हुई। शमशेरगंज के जाफराबाद इलाके में इस्लामी कट्टरपंथियों ने लगातार तीन दिन तक लूटपाट की। पीड़ितों ने स्थानीय पुलिस थाने को फोन किया, पर कोई मदद नहीं मिली। पीड़ितों की मदद करने की बजाए पुलिस वाले चौकियां छोड़ कर भाग गए। तब बीएसएफ ने मोर्चा संभाला, जिसके क्षेत्राधिकार में सीमा से 50 किलोमीटर का क्षेत्र आता है। लेकिन कट्टरपंथियों ने बीएसएफ जवानों को घेर कर पथराव भी किया।

केंद्रीय बलों की तैनाती के बाद हालात नियंत्रण में

दरअसल, पश्चिम बंगाल में वक्फ संशोधन कानून के विरोध के नाम पर जो हिंसा हुई, वह कोई विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और राज्य प्रायोजित हिंदू नरसंहार है। ममता सरकार के मंत्री खुलेआम कह रहे हैं, ‘जरूरत पड़ी तो पूरे कोलकाता और बंगाल को भर देंगे।’ इसका क्या मतलब निकाला जाए? मजहबी युद्ध की चेतावनी? या किसी जिहादी संगठन की घोषणा? अगर हिंसा को सत्ता की माैन स्वीकृति नहीं थी तो अपने जलते घरों, परिवार के सदस्यों को बचाने क घरों को जलाया गया, महिलाओं को डराया गया, मंदिरों पर पत्थरबाज़ी हुई, तब राज्य पुलिस या तो नदारद थी या मूकदर्शक बनी रही। जिन लोगों को जनता की रक्षा करनी चाहिए, वे राज्य सरकार के इशारे पर पीड़ितों को अकेला छोड़ गए। क्या यह राज्य द्वारा समर्थित हिंसा नहीं है? क्या ममता बनर्जी बांग्लादेशी घुसपैठियों की बदाैलत राज्य को बांग्लादेश बनाना चाहती हैं?

उत्तर मालदा से भाजपा सांसद खगेन मुर्मू कहते हैं, ‘’राज्य का माहौल खराब किया जा रहा है। यह हिंसा एक सोची-समझी साजिश के तहत हुई है। हिंदुओं पर यह अत्याचार राजनीतिक साजिश का हिस्सा है।’’

दूसरी ओर, कांग्रेस सहित दूसरे दल जो दलित अधिकारों और जातीय जनगणना का राग अलापते हैं, वे भी मुर्शिदाबाद में हिंदू विरोधी हिंसा पर चुप हैं। सवाल तो उनसे भी किया जाना चाहिए कि क्या उनकी ‘धर्मनिरपेक्षता’ केवल एक मजहब के लिए है? उनकी इसी चुनिंदा चुप्पी पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कहना पड़ा कि पश्चिम बंगाल जल रहा है, लेकिन कांग्रेस-समाजवादी पार्टी चुप हैं। राज्य की मुख्यमंत्री चुप हैं। सेकुलरिज्म के नाम पर दंगाइयों को खुली छूट दे दी गई है। इस प्रकार की अराजकता पर लगाम लगनी चाहिए।

बहरहाल, अगर मुसलमानों का विरोध प्रदर्शन वक्फ संशोधन अधिनियम के खिलाफ था, फिर यह हिंदू विरोधी कैसे हो गया? इसके तार बांग्लादेश से कैसे जुड़ गए? इसमें बांग्लादेश के आतंकी संगठन कैसे शामिल हो गए? उनकी मदद किसने की? ऐसे ढेरों सवाल हैं, जिनके जवाब हिंसा की गहन जांच के बाद ही सामने आएंगे।

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