न्यूयॉर्क टाइम्स का हिन्दू-बौद्ध विरोधी राग : बांग्लादेश की कट्टरता पर डाला पर्दा
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न्यूयॉर्क टाइम्स का नया प्रोपेगेंडा : बांग्लादेश की इस्लामी कट्टरता पर डाला पर्दा, हिंदू और बौद्धों को किया बदनाम!

न्यूयॉर्क टाइम्स ने आलपा हिन्दू-बौद्ध विरोधी राग : बांग्लादेश की कट्टरता पर डाला पर्दा, भारत-म्यांमार पर फोड़ा ठीकरा

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Apr 3, 2025, 04:50 pm IST
inविश्लेषण

न्यूयॉर्क टाइम्स में बांग्लादेश को लेकर एक लेख प्रकाशित हुआ है। इस लेख में हालांकि यह कहने का प्रयास है कि बांग्लादेश को रीइन्वेन्ट अर्थात पुन: निर्माण करने में कट्टरपंथियों के हाथों मे जाने का खतरा है, परंतु इससे भी बढ़कर इसमें एक जो सबसे बड़ा कुकृत्य है वह भारत में हिंदुओं और म्यांमार में बौद्धों को लेकर गढ़ा गया झूठ है। बांग्लादेश में हसीना सरकार के जाने के बाद जो रिक्त स्थान उत्पन्न हुआ, उसे कट्टरपंथी भरने का प्रयास कर रहे हैं, ऐसा इस लेख में कहा गया है।

परंतु इस लेख में यह नहीं कहा गया है कि शेख हसीना को हटाने में सबसे बड़ा हाथ उन्हीं लोगों का था, जो देश की उस पहचान के विरोध में थे, जो उसने वर्ष 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ प्राप्त की थी। क्या बिना किसी सहायता के छात्रों का इतना बड़ा आंदोलन हो सकता था?

इस लेख में फुटबॉल मैच के उदाहरण दिए हैं कि कैसे कट्टरपंथियों ने लड़कियों के फुटबॉल मैच को रोक दिया और कैसे एक ऐसे आदमी को पुलिस कस्टडी से छुड़वा लिया था, जिसने सार्वजनिक स्थान पर एक लड़की को सिर न ढकने को लेकर प्रताड़ित किया था।

इस लेख में और भी कई घटनाएं लिखी हैं कि कैसे शेख हसीना के जाने के बाद ढाका में एक रैली हुई, जिसमें इस्लाम का अपमान करने वालों को फांसी देने की सजा कई मांग की गई और इस्लामी खिलाफत की मांग कई गई। मोहम्मद यूनुस के शासनकाल में किस तरह से इस्लामी कट्टरपंथी ताकतें सिर उठा रही हैं, उसके विषय में इस लेख में लिखा है, मगर मोहम्मद यूनुस को क्लीन चिट देते हुए।

सारा ठीकड़ा इस्लामी पार्टियों पर फोड़ा गया है। इसमें लिखा है कि इस समय जब बांग्लादेश अपने लोकतंत्र को दोबारा बनाने की राह पर है और अपने 175 मिलियन लोगों के लिए नया भविष्य बनाने की राह पर है, तो इसी समय इस्लामी कट्टरपंथी देश के उस सेक्युलर ताने बाने को तोड़ रहे हैं, जो यहाँ पर हमेशा से था।

भारत की हिन्दू पहचान से दूर होकर वर्ष 1947 में मजहब के आधार पर अपनी पहचान लेने वाले देश में सेक्युलर होने की बात कहना ही हास्यास्पद है। जिस देश का जन्म ही मजहब के आधार पर अपनी अलग पहचान के आधार पर हुआ हो, वह कैसे सेक्युलर हो सकता है, यह समझ से परे है।

शेख मुजीबुर्रहमान तो स्वयं ही उस जिन्ना की सेना के सिपाही थे, जिसने भारत से पाकिस्तान का निर्माण कराया और जब उन्होनें देखा कि उर्दू भाषी लोग बांगलभाषी लोगों के साथ भेदभाव कर रहे हैं, तो भाषाई आधार पर हो रहे अन्यायों का विरोध करने के लिए उन्होनें एक नए मुल्क के लिए संघर्ष किया, परंतु रजाकार सहित कई ऐसी ताकतें उस समय भी थीं, जिन्हें मुजीबुर्रहमान का वह स्वरूप पसंद नहीं आया था। और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जब शेख हसीना ने रजाकार को लेकर कोई बयान दिया था, तो आंदोलनकारी छात्रों ने यह नारा भी दिया था कि वे सभी रजाकार हैं।

यह लेख कहीं न कहीं मुहम्मद यूनुस के कट्टरपंथी चेहरे को कवर अप करने के लिए तो नहीं लिखा गया है, क्योंकि यह मोहम्मद यूनुस की सरकार ही है, जिसने बांग्लादेश कई जमात ए इस्लामी से प्रतिबंध हटाया था और इसके साथ ही यह भी ध्यान दिए जाने योग्य है कि यह मोहम्मद यूनुस की सरकार ही है जिसने हिज्ब उत-तहरीर के संस्थापक सदस्य नासिमुल गनी को गृह सचिव के रूप में नियुक्त किया है और यह भी सब जानते हैं कि यह समूह भारत में इस्लामी खिलाफत की स्थापना करना चाहता है।

इतना ही नहीं बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के जो विशेष साथी हैं, महफूज आलम, जिन्हें मोहम्मद यूनुस उस विरोध प्रदर्शन का मास्टरमाइंड बताते हैं, उसके विषय में भी कहा जाता है कि वह भी इस्लामी छात्र लीग से जुड़ा हुआ था, हालांकि महफूज ने एक फ़ेसबुक पोस्ट पर इसका खंडन किया था, मगर 16 दिसंबर 2024 को उसने एक और फ़ेसबुक पोस्ट लिखकर अपना हिन्दू और भारत विरोधी चेहरा दिखाया था। जिसमें उसने लिखा था कि भारत के पूर्वोत्तर प्रांत और बांग्लादेश की एक संस्कृति और इतिहास है और जिसे हिन्दू चरमपंथियों और उच्च जाति वाले हिंदुओं के बंगाल-विरोधी विचारों ने दबाकर रखा हुआ है। जब इस पोस्ट पर विवाद हुआ था, तो उसने इसे डिलीट कर दिया था।

इतना ही नहीं, जब बांग्लादेश में बाढ़ आई थी, तो यह याद होगा कि कैसे बांग्लादेश के आम लोगों ने भारत को ही दोषी ठहराया था। यही नहीं बांग्लादेश में मार्च में ही हिज़्ब-उत-तहरीर ने प्रदर्शन करते हुए खिलाफत के लिए जुलूस निकाला था। यह संगठन बांग्लादेश में खिलाफत या शरिया कानून लागू करने की मांग कर रहा है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने जो यह नया लेख प्रकाशित किया है, उसमें मोहम्मद यूनुस को लेकर कोई भी प्रश्न नहीं है, बस यही लिखा है कि कैसे शेख हसीना के जाने के बाद के रिक्त स्थान को कट्टरपंथी भर रहे हैं, और यह नहीं लिखा है कि जमात और जमात के छात्र लीग से मोहम्मद यूनुस ने ही प्रतिबंध हटाया है।

इतना ही नहीं, इसमें जो सबसे खतरनाक है वह यह कि इसमें बांग्लादेश में हो रही कट्टरणपंथी घटनाओं का सामान्यीकरण करने के लिए भारत और म्यांमार तक को घसीट लिया है।

इसमें लिखा है कि बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह उस क्षेत्र में हो रही कट्टरपंथी घटनाओं का ही एक रूप है। जैसे अफगानिस्तान ऐसा प्रांत बन गया है, जहां पर मजहब के आधार पर महिलाओं को मूलभूत आजादी से वंचित रखा जा रहा है, पाकिस्तान में भी मुस्लिम चरमपंथी रह-रह कर सिर उठाते हैं, तो वहीं “भारत में, एक दृढ़ हिंदू दक्षिणपंथी ने देश की धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की परंपराओं को कमजोर कर दिया है। म्यांमार बौद्ध चरमपंथियों की गिरफ्त में है जो जातीय सफाया अभियान चला रहे हैं।“

इस लेख का उल्लेख करते हुए बांग्लादेश में हो रहे बदलावों पर मुखर बात रखने वाले लेखक हुसैन सद्दाम ने भी लिखा है और कई प्रश्न किये हैं और यह भी कहा है कि अवैध यूनुस सरकार में इस्लामी कट्टरपंथी बढ़ नहीं रहे हैं, वे तो स्थापित हो चुके हैं

The @nytimes’ latest report, “As Bangladesh Reinvents Itself, Islamist Hard-Liners See an Opening” (April 1, 2025), lays bare what we’ve been saying all along: under the illegal #Yunus government, Islamist extremism is not just rising—it is being actively enabled.

Leaders of… pic.twitter.com/yAUz5Y8BGr

— Hussain Saddam (@saddam1971) April 1, 2025


इस लेख को पढ़कर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह लेख आखिर किसलिए लिखा गया है? भारत और म्यांमार के उल्लेख की क्या आवश्यकता थी? इसमें हिंदुओं, बौद्ध, अहमदिया आदि समुदायों के धार्मिक स्थलों के तोडफोड का उल्लेख है, परंतु कारण पर बात नहीं की गई है कि आखिर शेख हसीना के जाने के बाद केवल उन्हीं धार्मिक स्थलों पर हमले क्यों हुए, जो किसी खास धार्मिक मत का पालन नहीं कर रहे थे।

यदि मजहबी कट्टरता बढ़ रही है तो इसमें दोष किसका है? शेख हसीना के जाने के बाद जिस प्रकार कथित छात्रों ने उनके ब्लाउज और अंत:वस्त्र लहराए, वह किस मानसिकता का प्रतीक था?

ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे भारत और म्यांमार को बांग्लादेश की कट्टरपंथी सोच के समकक्ष खड़ा करने के लिए ही यह कथित लेख लिख दिया है।

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