बांग्लादेश में हालांकि सरकार बन चुकी है, मगर फिर भी शेख मुजीबुर्रहमान की विरासत को मिटाने की प्रक्रिया जारी है। इस बार वहाँ से दो स्मारकों में परिवर्तन के समाचार आ रहे हैं।
वर्ष 2020 में शेख हसीना सरकार ने मुक्ति संघर्ष की स्मृति में सुहरावर्दी उद्यान में राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की 26 फुट की प्रतिमा लगाए जाने की परियोजना आरंभ की थी। लिबरैशन वार अफेयर्स के मंत्रालय ने यह घोषणा की थी कि सुहरावर्दी उद्यान में शेख मुजीबुर्रहमान की विशालप्रतिमा इस कारण लगाई जाएगी, जिससे कि लोगों को मुक्ति का संघर्ष हमेशा याद रहे।
पहले रमना रेस कोर्स था यह मैदान
इस उद्यान का नाम पहले रमना रेस कोर्स था। शेख मुजीबुर्रहमान ने इसी मैदान में 7 मार्च 1971 को स्वतंत्रता की घोषणा की थी। उन्होंने मुक्ति की घोषणा की थी, उन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान से आजादी का ऐलान किया था। उनके इस भाषण की महत्ता को इस बात से समझा जा सकता है कि वर्ष 2017 में यूनेस्को ने इसे दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासतों में सम्मिलित करते हुए मेमोरी ऑफ थे वर्ल्ड रजिस्टर में स्थान दिया था।
इतना ही नहीं यही वह ऐतिहासिक उद्यान है, जहां पर पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल ए ए के नियाजी ने भारत के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने घुटने टेकते हुए, आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे।
यहीं शेख मुजीबुर्रहमान ने दिया था मुक्ति भाषण
इसी उद्यान में शेख मुजीबुर्रहमान ने मुक्ति का भाषण दिया था और मुक्ति के दस्तावेज़ों को पाया ही था। ये दोनों ही इतनी बड़ी घटनाएं बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान के शासनकाल में घटी थीं। यही कारण था कि शेख हसीना की सरकार इस उद्यान को पूरी तरह से स्वतंत्रता स्मारक परियोजना के रूप में विकसित करना चाहती थी। वह चाहती थी कि शेख मुजीबुर्रहमान की विरासत को देश के सामने रखा जाए। और इसी को ध्यान में रखते हुए बांग्लादेश की तत्कालीन सरकार ने वर्ष 2020 में यहाँ पर शेख मुजीबुर्रहमान की प्रतिमा को बनाने का निर्णय लिया था।
उन दोनों ही स्थानों पर ये प्रतिमाएं लगनी थीं और साथ ही थ्री डी होलोग्राफ़िक शो भी आयोजित किया जाना था। बांग्लादेश में 2024 में शेख हसीना के जाने के बाद इस योजना को रोककर उसमें कुछ परिवर्तन की योजना बनाई गई थी।
अब क्या हैं प्रस्तावित परिवर्तन
अब इन दोनों स्थलों पर क्या किया जा रहा है? इन स्थानों पर प्रतिमाओं को पूरी तरह से हटाया जा रहा है। जहां इन दोनों स्थानों पर मुक्ति भाषण और आत्मसमर्पण की जीवंत प्रतिमाएं स्थापित होनी थी, अब वहाँ पर आधुनिक वाटर फाउंटेन बनाए जाने की योजना है।
दरअसल इसे लेकर सरकार के अपने तर्क हैं। इस योजना के विरोधियों का तर्क यह था कि मुक्ति भाषण और जहां पर पाकिस्तान की सेना ने आत्मसमर्पण किया था, वहाँ पर शेख मुजीबुर्रहमान की प्रतिमा लगने से घटना मात्र एक राजनीतिक दल तक सीमित हो रही है। और यह एक विशेष विचारधारा को समर्पित स्थान लगने लगता।
इसीलिए प्रतिमाओं के स्थान पर दोनों ही स्थानों पर फुव्वारे लगाए जाएंगे, जिससे राजनीतिक निष्पक्षता लगे और किसी विशेष विचारधारा का वह स्थान न बन जाए।
नए प्रस्ताव के अंतर्गत यह कहा जा रहा है कि अब होलोग्राफ़िक शो की विषय सामग्री को परिवर्तित करते हुए, शेख मुजीबुर्रहमान के स्थान पर मुक्ति संग्राम से जुड़े अन्य नेताओं और लोगों के भी योगदान को सम्मिलित किया जाएगा।
5 अगस्त 2024 को इस उद्यान मे हुई थी तोड़फोड़
यह और भी रोचक है कि जब 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना देश छोड़कर गई थीं, उस समय वहाँ पर सुहरावर्दी उद्यान में संग्रहालय की बाहरी दीवारों पर जो टेराकोटा की कलाकृतियाँ बनी थी, उन्हें कथित छात्रों की भीड़ ने तोड़ दिया था। और क्या आप जानते हैं कि जिन कृतियों को तोड़ा था, उनमें क्या था?
उनमें शेख मुजीबुर्रहमान और पाकिस्तानी सेना के भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण का इतिहास था। कथित छात्रों ने इस ऐतिहासिक प्रतीक को “हथौड़ों” से तोड़कर विकृत कर दिया था।
आग लगाई थी और वहाँ पर जो भी इस आत्मसमर्पण के इतिहास के प्रतीक थे, उन्हें मिटाने के हर संभव प्रयास किए थे।
यहाँ तक कि मुक्ति संग्राम के योद्धाओं की स्मृति में बनी शिखा चिरंतन अर्थात अमर ज्योति के परिसर में भी तोड़फोड़ की थी। पार्क की सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट कर दिया था।
क्या यह शेख मुजीबुर्रहमान की विरासत को नष्ट करने का प्रयास है?
योजनाओं में इस परिवर्तन को लेकर यह आरोप लग रहे हैं कि यह शेख मुजीबुर्रहमान की विरासत को नष्ट करने की योजना है। क्या ये आरोप सत्य हैं? बांग्लादेश की मीडिया के अनुसार कुछ लोगों को यह लग रहा है कि इन दोनों ही स्थलों पर शेख मुजीबुर्रहमान की प्रतिमाओं का न लगना, कहीं न कहीं मुक्ति संग्राम से शेख मुजीबुर्रहमान का नाम छीनने का प्रयास है।
यह भी गौरतलब है कि वर्ष 2024 में शेख हसीना के बांग्लादेश से जाने के बाद शेख हसीना और शेख मुजीबुर्रहमान से जुड़े हर लगभग हर स्थल को नष्ट कर दिया गया है। या फिर वहाँ पर इतनी तोड़फोड़ की गई है, कि उसे अब दुबारा बनाना संभव नहीं है। उनकी प्रतिमाओं, संग्राहलयों और चित्रों को सुनियोजित तरीके से नष्ट किया गया।
उनके ऐतिहासिक महत्व को कम किया जा रहा है। ऐसा 2024 के बाद से कथित छात्र नेताओं के बयानों से भी प्रतीत हुआ था।
वर्ष 2005 में संशोधन के माध्यम से उनका राष्ट्रपिता का दर्जा समाप्त करना हो या फिर करेंसी के नोटों से हटाया जाना, सभी एक प्रकार से यही बताते हैं कि कहीं न कहीं शेख मुजीबुर्रहमान की विरासत को बांग्लादेश से धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है। उनसे संबंधित पाठ्यक्रम सामग्री या तो हटा दी गई है या फिर संशोधित कर दी गई है। जय बांग्ला जैसे नारे से भी राष्ट्रीय नारे का दर्जा वापस ले लिया गया है।
इन कदमों के बाद अब सुहरावर्दी उद्यान में इन प्रतिमाओं को न लगाकर फुव्वारे लगाना और होलोग्राफ़िक सामग्री में परिवर्तन करना, आलोचकों के अनुसार शेख मुजीबुर्रहमान की ऐतिहासिक पहचान को धीरे-धीरे मिटाने के प्रति एक और कदम है।
वहीं इस योजना के परिवर्तनों का समर्थन करने वालों का कहना है कि वे मुक्ति संग्राम को किसी एक पार्टी या विचारधारा तक सीमित नहीं रख सकते हैं।

















