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जैसी करनी, वैसी भरनी

सिख नरसंहार में सज्जन कुमार को मिली सजा क्या काफी है, इस पर लोगों की अलग-अलग राय है। हालांकि कांग्रेस सरकारों की ढिलाई के कारण सज्जन को सजा मिलने में 34 और 41 साल की देरी तो हुई, लेकिन अदालत का फैसला यह बताता है कि व्यक्ति चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं

Written byआशीष रायआशीष राय
Mar 10, 2025, 05:38 pm IST
inभारत, विश्लेषण, दिल्ली
सज्जन कुमार

सज्जन कुमार

सिख नरसंहार से जुड़े एक मामले में 40 साल बाद दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने 25 फरवरी, 2025 को पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने 12 फरवरी को सज्जन कुमार को दोषी ठहराया था, लेकिन फैसला सुरक्षित रख लिया था। इससे पहले सिख हिंसा से जुड़े दिल्ली कैंट के एक मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश एस. मुरलीधर और न्यायाधीश विनोद गोयल की पीठ ने 17 दिसंबर, 2018 को 5 सिखों की हत्या से जुड़े मामले में सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। यह पहला मामला था, जिसमें सज्जन कुमार को सजा सुनाई गई थी। उस समय पहले सजा सुनाते समय न्यायाधीश मुरलीधर ने जो टिप्पणी की थी, लगभग वैसी ही टिप्पणी विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा ने भी की है।

शैतानी इरादा

आशीष राय
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय

विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा ने कहा कि सज्जन कुमार द्वारा किया गया अपराध न केवल जघन्य था, बल्कि सभ्य समाज के लिए घोर निंदनीय भी है। यह अपराध नफरत और सामुदायिक विभाजन को भड़काने के इरादे से किया गया था। पीड़ितों ने न केवल अपने परिवार के सदस्यों को जलाकर मारे जाने का भयावह दृश्य देखा, बल्कि अपने घरों को जलते और लुटते हुए भी देखा। उन्होंने पुलिस की निष्क्रियता और पड़ोसियों की निष्ठुरता पर भी चिंता जताई, जिससे दंगाइयों को खुली छूट मिल गई।

न्यायमूर्ति मुरलीधर ने कहा था कि 1984 की हिंसा मानवता के खिलाफ अपराध थे। यह महज भीड़ की हिंसा नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित नरसंहार था। इसमें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधियों ने सांप्रदायिक नफरत भड़काई। इस मामले में वर्षों तक न्याय देने में देरी हुई, क्योंकि आरोपी प्रभावशाली राजनेता थे। पुलिस और जांच एजेंसियां प्रभावित रहीं, जिससे दोषियों पर कार्रवाई नहीं हो सकी। यह सिर्फ हत्या का मामला नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध था। यह मामला सिर्फ कुछ लोगों की हत्या का नहीं था, बल्कि इसमें पूरे समुदाय को लक्षित किया गया था। न्यायमूर्ति मुरलीधर ने इसे ‘संहार का भयावह रूप’ बताया था। साथ ही उन्होंने कहा था कि 34 साल बाद दोषियों को सजा मिलना दुखद है, लेकिन यह दिखाता है कि कानूनी प्रक्रिया अंतत: न्याय दे सकती है।

न्यायमूर्ति मुरलीधर और विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा की टिप्पणी विधायिका और कार्यपालिका की सक्षमता पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। सज्जन कुमार का मामला राजनीतिक संरक्षण और कानूनी तंत्र की विफलता का उदाहरण है। सत्ता में बैठे लोगों की मिलीभगत के कारण ही न्याय मिलने में दशकों लग जाते हैं। यह मामला न्याय में देरी का जीवंत उदाहरण है। यदि विधायिका और कार्यपालिका अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन कर रही होती और तंत्र प्रभावी होता, तो सज्जन कुमार को सजा मिलने में 34 साल और फिर 41 साल की देरी नहीं होती। ऐसे मामलों के विचारण के दौरान आम नागरिकों के मन मस्तिष्क में न्यायिक व्यवस्था के प्रति विश्वास बनाए रखना भी एक कठिन चुनौती होती है। दूसरा पहलू यह भी है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार की नाकामियों के चलते न्याय में देरी तो अवश्य हुई है, परंतु न्यायालय ने देरी से ही सही, दोषियों को सजा सुनाकर आम नागरिकों को यह संदेश देने का प्रयास किया है कि यह न्यायिक प्रक्रिया की जीत है और व्यक्ति चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है।

मांगी थी रियायत

हत्या के अपराध में अधिकतम सजा मृत्युदंड होती है, जबकि न्यूनतम सजा आजीवन कारावास। शिकायतकर्ता और अभियोजन पक्ष ने सज्जन कुमार के लिए मौत की सजा की ही मांग की थी। पीड़ित परिवार की मदद करने वाले समाजसेवी सोनू जंडियाला ने भी आरोपी के लिए फांसी की सजा की मांग की थी।

उन्होंने कहा कि टायरों में आग लगाकर उन्हें जसवंत सिंह और तरुणदीप सिंह के गले में डाला गया था। फैसला सुनाए जाने से ठीक पहले सज्जन कुमार ने सजा में रियायत की अपील करते हुए न्यायालय से कहा, ‘‘इस मामले में मुझे फांसी की सजा देने का कोई आधार नहीं बनता है। मैं 80 साल का हो चला हूं। बढ़ती उम्र के साथ कई बीमारियों से जूझ रहा हूं। 2018 से जेल में बंद हूं। उसके बाद से मुझे कोई फरलो/पैरोल नहीं मिली है। 1984 की हिंसा के बाद किसी आपराधिक मामले में शामिल नहीं रहा। जेल में/सुनवाई के दौरान मेरा व्यवहार हमेशा ठीक रहा। कोई शिकायत मेरे खिलाफ नहीं मिली। इसलिए मेरे सुधार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। मैंतीन बार सांसद रह चुका हूं। सामाजिक कल्याण की कई परियोजनाओं का हिस्सा रहा हूं। अभी भी खुद को निर्दोष मानता हूं। न्यायालय मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम सजा तय करे।’’

न्यायालय के फैसले पर किसी ने खुशी जताई तो किसी ने सजा को नाकाफी बताया। शिकायतकर्ता बलबीर कौर ने कहा कि वे न्यायालय के फैसले से संतुष्ट हैं। जो जैसा करेगा, वैसा ही भरेगा। वहीं, सिख नेता गुरलाद सिंह ने कहा, ‘‘हमें मौत की सजा से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। हम अदालत के फैसले से खुश नहीं हैं। हम सरकार से अपील करेंगे कि वह उच्च न्यायालय में जाए और सज्जन कुमार के लिए मौत की सजा की मांग करे। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के महासचिव जगदीप सिंह कहलों ने कहा कि सज्जन कुमार को अगर मौत की सजा दी गई होती, तो बेहतर होता और हमें संतुष्टि महसूस होती।

10 आयोग बने, पर बचता रहा

सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर सहित कांग्रेस के कई नेताओं पर भीड़ को हमले के लिए उकसाने के आरोप थे। लेकिन सिख विरोधी हिंसा में जितने मामले दर्ज किए गए थे, उनमें से अधिकांश मामलों में तो सही तरीके से जांच ही नहीं हुई। यही नहीं, गवाहों को धमकाया गया और कई मामलों में सबूत भी नष्ट कर दिए गए। कई गवाह तो बरसों तक डर से सामने ही नहीं आए। इन सब कारणों से कई आरोपी अदालत से बरी हो गए और पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिल सका।

हिंसा की जांच के लिए 10 आयोग और समितियां गठित की गईं, फिर भी आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। 1985 में राजीव गांधी की सरकार ने रंगनाथ मिश्रा आयोग का गठन किया। आयोग के समक्ष हिंसा पीड़ितों के हलफनामे में सज्जन कुमार का नाम भी आया, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। पहली बार 1991 में दिल्ली पुलिस ने सज्जन कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, लेकिन जांच प्रक्रिया सुस्त ही रही। इसके कारण सज्जन की गिरफ्तारी नहीं हो सकी। हिंसा की पहली वास्तविक जांच वाजपेयी सरकार के दौरान की गई थी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 2000 में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति जीटी नानावटी की अध्यक्षता में आयोग गठित कर हिंसा की दोबारा जांच करने और इसमें कांग्रेस नेताओं, पुलिस और प्रशासन की भूमिका का पता लगाने को कहा। 2005 में आयोग की रिपोर्ट आई, जिसमें सज्जन कुमार और अन्य नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए गए। इसके बाद सीबीआई ने सज्जन कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया और जांच में तेजी आई।

2010 में पहली बार सज्जन कुमार पर अदालत में आरोप तय किए गए और हत्या, दंगा भड़काने और आपराधिक षड्यंत्र के तहत मुकदमा चला। 30 अप्रैल, 2013 को दिल्ली की कड़कड़डूमा जिला न्यायालय ने सबूतों के आभाव में बरी कर दिया था, लेकिन अभियोजन पक्ष ने दिल्ली उच्च न्यायालय में फैसले को चुनौती दी। इसी दौरान, 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार ने न्यायमूर्ति जीपी माथुर की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसने मामलों की फिर से जांच कराने की सिफारिश की।

2015 में सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में विशेष जांच आयोग (एसआई) का गठन किया। एसआईटी ने उन 293 मामलों की समीक्षा की, जो बंद कर दिए गए थे। 114 मामलों को फिर से खोला गया। गवाहों के बयान फिर से दर्ज किए गए और नया आरोपपत्र दाखिल किया गया। एसआईटी की जांच के चलते जगदीश टाइटलर और अन्य नेताओं पर भी केस मजबूत हुए। एसआईटी के सहयोग से अभियोजन पक्ष ने दिल्ली उच्च न्यायालय में जोरदार पैरवी की और सज्जन कुमार को दोषी ठहराने और सजा दिलाने में सफल रहे।

Topics: न्यायमूर्ति जीटी नानावटी की अध्यक्षतादिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत1984 की हिंसा मानवता के खिलाफ अपराधसिख नरसंहारजैसी करनीवैसी भरनीपाञ्चजन्य विशेषसज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर1984 की हिंसा
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