भारत की मत पंथ परंपरा का मूल सनातन संस्कृति : निम्बाराम
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होम भारत राजस्थान

भारत की मत पंथ परंपरा का मूल सनातन संस्कृति : निम्बाराम

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक निंबाराम ने उदयपुर में "सनातन के समक्ष चुनौतियां एवं हमारी भूमिका" विषय पर प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठी को संबोधित किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद, गुलामी की मानसिकता और सनातन पर हो रहे हमलों को लेकर चेताया।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 13, 2025, 04:07 pm IST
inराजस्थान

12 फरवरी । “जब पश्चिम में मानव सभ्यता का विकास नहीं हुआ, तब भी भारत में ज्ञान था। भारत ने कभी विश्व पर अपना विचार नहीं थोपा और ना ही आक्रमण किया। फिर भी आज विश्व पटल पर सनातन की व्यापक चर्चा है।” यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम ने प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठी में कहीं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क विभाग, उदयपुर द्वारा आयोजित प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठी “सनातन के समक्ष चुनौतियां एवं हमारी भूमिका” का आयोजन बुधवार को सायं प्रताप गौरव केंद्र के सभागार में किया गया।

मुख्य वक्ता निंबाराम ने कहा कि भारत पहले से ही राष्ट्र रहा है। 1947 में इस राष्ट्र का विभाजन हो रहा था, जबकि जनमानस की भावना अखण्ड भारत की थी। स्वाधीन हो गये, लेकिन अपना तंत्र विकसित होना शेष था। भारतीय संविधान में “हम भारत के लोग”, बंधुत्व, पंथनिरपेक्षता, अधिकार कर्तव्य, 22 चित्र जैसे तत्व भारतीय संस्कृति के प्रतिबिंब है। 2022 में स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मनाया गया। तो असंख्य अनसंग हीरोज को स्मरण किया गया। नई पीढ़ी को सेनानियों के बलिदान का स्मरण करना जरूरी है। औपनिवेशिक मानसिकता व हीन भावना से हटकर स्व के गौरव की पीढ़ी का निर्माण करना है। जी-20 के मंच पर वैश्विक नेताओं के समक्ष भारत ने नालंदा विश्वविद्यालय के चित्र को प्रदर्शित किया एवं गौरवशाली इतिहास सबके सामने रखा गया।

भारतीय ज्ञान पर बोलते हुए निम्बाराम ने कहा कि आध्यात्मिक महापुरुषों के ज्ञान का विश्व ने अभिनंदन किया। सर्वे भवन्तु सुखिनः, वसुधैव कुटुंबकम, नारी को मातृ स्वरूप में देखने का विचार आदि यहां का दर्शन है। यह विचार देने वाली भारत की मत पंथ परंपरा का मूल सनातन है, ऐसी मान्यता है। पंथनिरपेक्षता हमारे डीएनए में है। निरंतर विमर्श व शास्त्रार्थ परंपरा इसका प्रमाण है।

जीवन दर्शन पर बोलते हुए निम्बाराम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिन्दू एक जीवन पद्धति है। आज हिन्दु शब्द अधिक मान्य है। कभी आर्य के रूप में यहां के समाज की पहचान थी। सभ्यताएं निरंतर परिवर्तनशील होती है, परंतु संस्कृति व जीवन मूल्य एक से रहती है। वर्तमान परिस्थितियों में तकनीकी विज्ञान का समय है। नई पीढ़ी के समक्ष सांस्कृतिक दर्शन को शोधपरक स्वरूप में रखना चाहिए।

जब आक्रांताओ के कालखंड में महिला शीलभंग, आस्था व सांस्कृतिक केन्द्रों को ध्वस्त करने जैसे घृणित कृत्य हुए। ऐसे विकट कालखंड में भारतीय समाज में रूढिया स्थापित हुई। लेकिन भारतीय समाज ने कुरीतियों को दूर करने पर भी कार्य किया है।

निम्बाराम ने कहा कि मुगलों के बाद ईसाई कालखंड में भारतीय समाज का व्यापक अध्ययन कर अलग-अलग पहचान स्थापित की गई और समाज को बांटा गया। मैकाले की शिक्षा पद्धति ने  भारतीय पीढ़ी की मन:स्थिति को बदलना प्रारंभ किया। तब 1857 में स्व की त्रयी- स्वदेशी, स्वधर्म व स्वराज से सेनानियों ने स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया।

निम्बाराम ने संघ पर बोलते हुए कहा कि 1920 में नागपुर में कांग्रेस अधिवेशन में संघ संस्थापक डॉ केशवराव हेडगेवार जी ने समस्त व्यवस्था संभाली। गांधीजी की अध्यक्षता में हो रहे अधिवेशन में डॉ हेडगेवार ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखने का आग्रह किया।
लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव आया। तो संघ ने भी अपनी सभी शाखाओं में 26 जनवरी 1930 स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।

निम्बाराम ने कहा कि परिवर्तन समाज के बल पर आता है। भक्ति आंदोलन में संतो के दम पर समाज परिवर्तन आया था। राजस्थान के लोकदेवताओ का समय एक स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में दर्ज है। स्वतंत्रता के बाद सामाजिक स्तर पर सम्मानित जीवन हर वंचित समूह तक पहुंचा है। समाज का आग्रह है कि पराधीनता के प्रतीक बदले जाने चाहिए। अब इंडिया गेट से नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा राष्ट्रीयता की प्रेरणा दे रही है। राजपथ से अब कर्तव्य पथ नाम हुए है। सोमनाथ मन्दिर जीर्णोद्धार से चली यात्रा अब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण तक पहुंची है।

निम्बाराम ने डीप स्टेट जैसे षड्यंत्र से सावधान रहने को कहा। उन्होंने कहा कि परदे के पीछे से तंत्र को अस्थिर करने का वैश्विक विस्तारवादी शक्तियों के प्रयास का सावधानी से सामना करना है। मुगल अंग्रेज के दमनकारी शासन में भी हम समाप्त नहीं हुए। क्योंकि हम लडे संघर्ष किया। राष्ट्र की संप्रभुता के विरुद्ध समूहों को उकसाने के प्रयास हो या फिर सांस्कृतिक तत्वों के विरुद्ध हमारी युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता के नाम पर बरगलाकर स्वच्छंदता थोपने का प्रयास हो, हमें ध्यान देना होगा। अपनी सीमाओं, प्रभुत्व व विचार को विस्तार करने वाली ताकतें सक्रिय है। वे सांस्कृतिक प्रतीकों को हटाने को लेकर अभियान पर निकलते है। अलग-अलग माध्यमों से कभी राखी, चरण स्पर्श, बिन्दी, संयुक्त परिवार आदि को निशाना बनाते है।

निम्बाराम ने कहा कि स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर पंच प्रण का आह्वान किया। जिसमें विरासत पर गर्व, गुलामी की मानसिकता से निकलना, विकसित भारत का संकल्प, समाज में एकता व एकात्मकता और नागरिक कर्तव्य शामिल है।

वहीं संघ सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने पंच परिवर्तन यथा सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी, पर्यावरण व नागरिक कर्तव्य का समाज से आग्रह किया।

मंच पर मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक निंबाराम के साथ विभाग संघचालक हेमेंद्र श्रीमाली व महानगर संघचालक गोविंद अग्रवाल रहे।

कार्यक्रम के प्रारंभ में विभाग सह कार्यवाह कौशल शर्मा ने प्रस्तावना रखी। अतिथि परिचय महानगर कार्यवाह विष्णु शंकर नागदा ने करवाया। कार्यक्रम का संचालन विष्णु मेनारिया ने किया। कार्यक्रम में चित्तोड़ प्रान्त प्रचारक मुरलीधर, उदयपुर विभाग प्रचारक धनराज उपस्थित रहे।

संविधान के 75 वे वर्ष के उत्सव स्वरूप मूल संविधान में अंकित 22 चित्रों की संबंधित अध्याय व संदेश को दिखाती प्रदर्शनी एवं देवी अहिल्या बाई होल्कर की जीवनी की प्रदर्शनी लगाई गई।

Topics: Indian civilizationराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघभारत की सभ्यतासनातन धर्मआरएसएस निंबारामRashtriya Swayamsevak Sanghसनातन पर खतराहिन्दू संस्कृतिसंघ विचारHindu CultureRSS Nimbaraam Speechपंच प्रणIndia’s HistorySanatan DharmaThreats to Sanatanहिंदू राष्ट्रवादPanch PranHindu nationalismBharat's Identityभारत का इतिहास
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