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भारी पड़ेगी पहाड़-पूर्वांचल की उपेक्षा

दिल्ली में पूर्वांचल के 40 प्रतिशत और उत्तराखंड के 25 लाख से अधिक लोग उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यमुना की गंदगी, छठ पूजा पर अव्यवस्था और रोजगार जैसे मुद्दों पर घिरी आआपा

Written byShivam DixitShivam Dixit
Feb 3, 2025, 11:14 am IST
inविश्लेषण, दिल्ली, पर्यावरण
यमुना में उफनाती झाग के बीच छठ पूजा करती महिलाएं (फाइल चित्र)

यमुना में उफनाती झाग के बीच छठ पूजा करती महिलाएं (फाइल चित्र)

दिल्ली की आबादी में पूर्वांचल के लोगों की 40 प्रतिशत और उत्तराखंड की भागीदारी 6 प्रतिशत (लगभग 35 लाख) है। ये लोग दिल्ली की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ हैं। इनमें घरों में काम करने वाली महिलाएं, दिहाड़ी मजदूर, आटो चालक और छोटी-मोटी दुकानों से लेकर कॉर्पोरेट घरानों में काम करने पेशेवर भी शामिल हैं, जो हर क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे हैं। लेकिन बड़ा वोट बैंक होने के बावजूद आआपा सरकार ने इनकी समस्याओं और आवश्यकताओं की अनदेखी की है।

सत्ता में आने से पहले आआपा ने इन क्षेत्र के लोगों से बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन सत्ता में आने बाद उन पर अमल नहीं किया। अब वे ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, उज्ज्वला योजना, जिसके तहत गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन दिया जाता है, आआपा सरकार ने दिल्ली में प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया। रोजगार और कौशल विकास पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। दिल्ली में ‘संकल्प योजना’ कागजों से बाहर आई ही नहीं। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की तुलना में दिल्ली में स्वरोजगार के लिए दी जाने वाली सहायता न्यूनतम है।

पूर्वांचल के लोगों के लिए केंद्र सरकार ने कई योजनाएं लागू की हैं, लेकिन आआपा के अड़ियल रवैये के कारण ये योजनाएं प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो पार्इं। ‘आयुष्मान भारत योजना’ के तहत गरीबों को 5 लाख रुपये तक की मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा दी जाती है, पर केजरीवाल ने इसे लागू करने से इनकार कर दिया। इस कारण पूर्वांचल के लाखों लोग इससे वंचित रह गए। इसी तरह, गरीबों को किफायती आवास देने वाली प्रधानमंत्री आवास योजना का भी दिल्ली में लोगों को नाममात्र का लाभ मिल रहा है, जबकि उत्तर प्रदेश व बिहार में इसका व्यापक लाभ मिल रहा है।

पूर्वांचल के लोगों का आरोप है कि आआपा सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाया, उन्हें राशन कार्ड व पहचान पत्र दिया, लेकिन उन्हें इससे वंचित रखा। इसी तरह, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए भी आआपा सरकार ने कोई ठोस योजना नहीं बनाई। प्रवासी मजदूरों का कहना है कि दिल्ली सरकार ने उनके रोजगार को सुरक्षित करने के बजाय बाहरी लोगों को प्राथमिकता देती है। पूर्वांचल बहुल इलाके जैसे—त्रिलोकपुरी, संगम विहार, पालम और मंगोलपुरी में टूटी सड़कें, गंदे पानी की आपूर्ति और सीवर की समस्याएं आम हैं। वहीं, दिल्ली के अलग-अलग हिस्से में उत्तराखंड के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। अकेले पटपड़गंज विधानसभा क्षेत्र में लगभग 15 प्रतिशत मतदाता उत्तराखंड के हैं।

दिल्ली को ‘लंदन-पेरिस’ बनाने का वादा करने वाले केजरीवाल इन इलाकों में बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं करा पाए। छठ पूजा पूर्वांचल के लोगों का सबसे बड़ा पर्व है। लेकिन हर साल छठ के समय यमुना में उफनाती झाग और अव्यवस्थाओं के कारण उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पिछले साल तो प्रदूषण के कारण यमुना में छठ पूजा ही नहीं करने दिया गया। इसके अलावा, न पक्के घाट हैं, न लाइट और न ही नदी किनारे साफ-सफाई की व्यवस्था। यमुना में बढ़ता प्रदूषण केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं है, बल्कि यह केजरीवाल सरकार की नीतियों उनकी उदासीनता का भी प्रमाण है। चुनाव से पहले झूठे वादे किए गए। पूर्वांचल और पहाड़ के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं का कहना है कि आआपा ने कभी उन्हें महत्व नहीं दिया। उनका इस्तेमाल सिर्फ वोट बैंक के रूप में किया।

रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों की उपेक्षा से पूर्वांचल और उत्तराखंड के लोगों में गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। इस चुनाव में उनकी नाराजगी कहीं आआपा पर भारी न पड़ जाए।

Topics: migrant labourerspopulation of Delhiपाञ्चजन्य विशेषयमुना में बढ़ता प्रदूषणदिल्ली को ‘लंदन-पेरिसपूर्वांचल और उत्तराखंड के लोगप्रवासी मजदूरदिल्ली की आबादीIncreasing pollution in YamunaDelhi is called 'London-Paris'people from Purvanchal and Uttarakhand
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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