मन को साधने वाली अद्भुत मार्गशीर्ष पूर्णिमा
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मन को साधने वाली अद्भुत मार्गशीर्ष पूर्णिमा

है। वैदिक ऋषियों की मान्यता है पूर्णिमा की तिथि को ब्रह्मांडीय ऊर्जा विशेष रूप से शक्तिशाली होती है, इसीलिए यह तिथि साधक को अंतर्मन में झाँकने और मन के परे जाकर दिव्यता का अनुभव करने का अनूठा सुअवसर उपलब्ध कराती है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Dec 15, 2024, 10:41 am IST
inभारत

हमारी सनातन हिन्दू संस्कृति में चंद्रमा को मन का कारक माना जाता है। वैदिक ऋषियों की मान्यता है पूर्णिमा की तिथि को ब्रह्मांडीय ऊर्जा विशेष रूप से शक्तिशाली होती है, इसीलिए यह तिथि साधक को अंतर्मन में झाँकने और मन के परे जाकर दिव्यता का अनुभव करने का अनूठा सुअवसर उपलब्ध कराती है। इन पूर्णिमा तिथियों में मार्गशीर्ष पूर्णिमा की विशिष्ट महत्ता है क्यूंकि यह तिथि चंद्रमा की पूर्णता का प्रतीक है। विश्वगुरु श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवदगीता में स्वयं इसकी महत्ता का महिमामंडन करते हुए कहते हैं, “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्” अर्थात महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। मनीषियों मान्यता है कि चूंकि पूर्णिमा तिथि का मुख्य प्रभाव सृष्टि के जलतत्व पर होता है और मानव देह 70 प्रतिशत जल से निर्मित है; इसी कारण पूर्णिमा का चाँद व्यक्ति के मन और चित्त पर गहरा प्रभाव डालता है।

इसीलिए आध्यात्मिक उत्थान की साधना के लिए मार्गशीर्ष माह में योगेश्वर श्रीकृष्ण के जप ध्यान व चंद्रमा को अर्घ्य देने की भारी महिमा हमारे धर्मशास्त्रों में गाई गयी है। श्रीमद्भगवदगीता में श्रीकृष्ण कहते है, “तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।” अर्थात, हमेशा निष्काम भाव से कार्य करो, क्योंकि यही मोक्ष का मार्ग है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा हमें इसी निष्कामता और सच्ची भक्ति की ओर प्रेरित करती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर्व ब्रह्माण्ड की दो मूल शक्तियों भगवान विष्णु और भगवान शिव से भी सम्बद्ध है। इस दिन भगवान विष्णु अपने मत्स्य अवतार से सतयुग का शुभारम्भ करते हैं और देवाधिदेव भगवान शिव परिवर्तन और जीवन की चक्रीय प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। नीलमत पुराण के अनुसार कश्यप ऋषि ने मार्गशीर्ष माह में कश्मीर की रचना की थी।

त्रिदेवों की समन्वित शक्ति के प्रतीक महागुरु दत्तात्रेय का अवतरण

ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समन्वित शक्तिपुंज महागुरु दत्तात्रेय का अवतरण महर्षि अत्रि और महासती अनुसूइया के पुत्र रूप में मार्गशीर्ष की पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। विष्णु पुराण, शिवपुराण व महाभारत के साथ दत्त संहिता, अवधूत गीता, दत्तात्रेय उपनिषद्, दत्त महात्म्य ग्रंथ व गुरु चरित आदि ग्रन्थों में अनेक वैदिक मंत्रों के द्रष्टा महायोगी दत्तात्रेय के अद्भुत जीवन दर्शन व लोकमंगलकारी शिक्षाओं का विस्तृत विवरण मिलता है। जहां एक ओर शैवपंथी दत्तात्रेय जी को महादेव शिव का अवतार मानते हैं वहीं वैष्णव धर्मानुयायी इन्हें श्रीहरि विष्णु के छठे अंशावतार के रूप में पूजते हैं। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर नाथ संप्रदाय निर्मित किया था। इनको नवनाथ परंपरा का भी अग्रज माना जाता है।

यह भी मान्यता है कि रसेश्वर संप्रदाय के प्रवर्तक भी दत्तात्रेय जी ही थे। “दत्त महात्म्य” में इन्हें प्रथम गुरु, महानतम योगी और वैज्ञानिक बताया गया है। इस ग्रन्थ में उल्लेख मिलता है कि दत्तात्रेय जी ने ही परशुरामजी को श्रीविद्या- मंत्र प्रदान किया था। शिवपुत्र कार्तिकेय को भी दत्तात्रेय ने अनेक विद्याएं दी थीं। भक्त प्रह्लाद को अनासक्ति-योग का उपदेश देकर उन्हें श्रेष्ठ राजा बनाने का श्रेय महायोगी दत्तात्रेय को ही जाता है। कार्तवीर्यार्जुन को तंत्र विद्या, नागार्जुन को रसायन विद्या एवं गुरु गोरखनाथ को आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि-चतुरंग योग का मार्ग भगवान दत्तात्रेय से ही प्राप्त हुआ था। इस महान समन्वयकारी आध्यात्मिक विभूति के अद्वैत दर्शन के अनुसार समूची सृष्टि अखण्ड व समग्र है। सृष्टि में दिखाई देने वाले विभिन्न स्वरूप एक ही परम तत्व के विभिन्न रूप मात्र हैं। इसीलिए महायोगी दत्तात्रेय ने प्रकृति के 24 घटकों से शिक्षा ग्रहण कर यह संदेश दिया कि जब तक पृथ्वी पर प्रकृति का संतुलन कायम रहेगा; तभी तक मानव का अन्य जीवधारियों का जीवन सुरक्षित रह सकेगा। उनके 24 गुरु हैं- पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हरिण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुंआरी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट।

माँ पार्वती ने लिया था अन्नपूर्णा का अवतार

पौराणिक मान्यता है कि मार्गशीर्ष की पूर्णिमा के दिन ही माँ पार्वती ने देवी अन्नपूर्णा का स्वरूप धारण किया था। इसी वजह से इसी तिथि पर शिव नगरी की स्वामिनी माँ अन्नपूर्णा जयंती भी मनायी जाती है। सनातनधर्मियों की प्रगाढ़ आस्था है कि जिस तरह काशी में देह त्यागने वाले के कान में स्वयं भगवान शंकर तारक मंत्र उसे मोक्ष दे देते हैं, इसी तरह इस अविमुक्त क्षेत्र में आने, रहने और बसने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भरण-पोषण का जिम्मा माँ अन्नपूर्णा स्वयं संभालती हैं। अन्नपूर्णा की नगरी में कोई सद्भक्त कभी कोई भूखा नहीं सोता। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस घर में रसोई को हमेशा साफ और शुद्ध रखा जाता है तथा अन्न का सम्मान किया जाता है, उस घर पर माँ अन्नपूर्णा की कृपा सदैव बनी रहती है।

माँ अन्नपूर्णा के अवतरण और बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी के उनके आधिपत्य में आने का अत्यंत रोचक कथानक ब्रह्मवैव‌र्त्तपुराण के ‘काशी-रहस्य’ में वर्णित है। कथा है कि विवाह के पश्चात् भगवान शंकर जब माता पार्वती की इच्छा पर उन्हें अपने सनातन निवास काशी लेकर आये तो एक सामान्य गृहस्थ स्त्री की भांति माता पार्वती को अपने घर का मात्र श्मशान होना नहीं भाया। तब उनकी इच्छापूर्ति के लिए महादेव ने यह व्यवस्था बनायी कि कलियुग में माता को इस नगरी की स्वामिनी का गौरव मिलेगा। कालांतर में एक बार लोगों की अन्न को बर्बाद करने की गलत आदतों के कारण धरती पर अन्न का घोर अकाल पड़ गया। अन्न-जल के अभाव के कारण सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गयी। तब इस भयंकर संकट से मुक्ति के लिए सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के परामर्श पर अकाल पीड़ितों ने जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु की आराधना की। भगवान विष्णु जानते थे कि इस महाआपदा का निवारण सिर्फ भगवान शिव व माता पार्वती ही कर सकते हैं; इसलिए उन्होंने भगवान शिव को योगनिद्रा से जगाकर वस्तुस्थिति से अवगत कराया। तब लोगों के जीवन की रक्षा हेतु भगवान शिव ने भिक्षु व माता पार्वती ने माँ अन्नपूर्णा का रूप धारण किया तथा भगवान शिव ने माता अन्नपूर्णा से भिक्षा लेकर अकाल पीड़ितों को वितरित की जिससे उनकी प्राणरक्षा हुई। कहा जाता है कि जिस दिन माता पार्वती ने अकालपीड़ितों की रक्षा के लिए माँ अन्नपूर्णा का अवतार लिया था, वह पावन तिथि मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा थी। इस दिन माँ अन्नपूर्णा की विशेष पूजा तथा तरह-तरह के भोग बनाकर प्रसाद रूप में वितरित करने की प्राचीन परंपरा है।

32 गुना अधिक होता है मार्गशीर्ष पूर्णिमा के व्रत का फल

शास्त्रज्ञ कहते हैं कि मानव का सुख-दुःख उसके द्वारा किए गए शुभाशुभ कर्मों पर निर्भर करता है और मार्गशीर्ष पूर्णिमा की पावन तिथि पर संकल्पपूर्वक किया गया व्रत व स्नान दान मनुष्य के दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल देता है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर दिया गया दान अक्षय फल देता है। दान का अर्थ केवल धन देना नहीं है, बल्कि अन्नदान, गर्म वस्त्रों का दान और सेवा-दान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शास्त्र कहते हैं कि इस दिन पवित्र नदियों और तीर्थों में स्नान करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। बताते चलें कि हिन्दू पंचांग के नौवें माह मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को “अगहन पूर्णिमा“ व “आनंद पूर्णिमा” नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि मार्गशीर्ष पूर्णिमा का व्रत करने से व्यक्ति को 32 पूर्णिमा का व्रत करने के जितना फल मिलता है। इसलिए इसे ‘’बत्तीसी पूर्णिमा’’ भी कहा जाता है।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा का वैदिक पर्व देश भर में विविध धार्मिक अनुष्ठानों और लोक परम्पराओं के साथ मनाया जाता है। इन दिन बड़ी संख्या में सनातनधर्मी श्रद्धालु गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान कर सूर्योदय से चंद्रोदय तक व्रत-उपवास का संकल्प लेते हैं। परम्पनुसार इस दिन प्रातः काल स्नान आदि से निवृत होकर साफ सफाई के बाद पूजा स्थल को सुसज्जित कर शास्त्रोक्त विधि से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन कर उनकी प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। उसके बाद पूर्णिमा व्रत की कथा पढ़कर और फिर गोघृत का दीपक जलाकर भगवान विष्णु और माता पार्वती की आरती की जाती है। इस दिन श्रीमद्भगवदगीता, विष्णु सहस्त्रनाम और गजेन्द्र मोक्ष का पाठ, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप सत्यनारायण भगवान की कथा और माँ महालक्ष्मी का पूजन और संध्याकाल चंद्रमा को अर्घ्य विशेष फलदायी होता है।

ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस वर्ष मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 14 दिसंबर को दोपहर 04 बजकर 58 मिनट पर होगी और इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 15 दिसंबर को दोपहर को 02 बजकर 31 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार मार्गशीर्ष पूर्णिमा का पर्व 15 दिसंबर 2024 को मनाया जाएगा। इसी दिन धनु संक्रांति भी मनायी जाएगी। इसी तिथि से मार्गशीर्ष माह के समापन के साथ पौष माह की शुरुआत हो जाएगी।

Topics: Margashirsha Purnima Dateसनातन धर्महिन्दू संस्कृतिपूर्णिमामार्गशीर्ष पूर्णिमाmargshirsha purnima 2024Margashirsha Purnima 2024 vratvishnu lakshmi ji pujaमार्गशीर्ष पूर्णिमा 2024
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