विजय गाथा : झुंझुनू के गांवों में घर-घर सैनिक,  मातृभूमि की रक्षा में जीवन किया बलिदान
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विजय गाथा : झुंझुनू के गांवों में घर-घर सैनिक,  मातृभूमि की रक्षा में जीवन किया बलिदान

झुंझुनू जिले के अमर सपूतों की इस वीर भूमि के रणबांकुरों ने जहां स्वतंत्रता पूर्व के आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था, वहीं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सेना द्वारा लड़ी गई लड़ाइयों में भी इस धरती की माटी में जन्मे वीरों ने समय-समय पर अपना पराक्रम दिखाया है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 30, 2024, 09:37 pm IST
inविश्लेषण, श्रद्धांजलि, राजस्थान
  • रमेश सर्राफ धमोरा

राजस्थान में शेखावाटी क्षेत्र के झुंझुनू जिले के अमर सपूतों की इस वीर भूमि के रणबांकुरों ने जहां स्वतंत्रता पूर्व के आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था, वहीं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सेना द्वारा लड़ी गई लड़ाइयों में भी इस धरती की माटी में जन्मे वीरों ने समय-समय पर अपना पराक्रम दिखाया है। वीरों की इस धरती ने सदियों से जन्म लेते रहे सपूतों के दिलों में देशभक्ति की भावना को प्रवाहित किया हैं। वास्तव में यहां की धरती को यह वरदान सा प्राप्त होना प्रतीत होता है कि इस पर राष्ट्रभक्ति के कीर्तिमान स्थापित करने वाले लाडेसर ही जन्म लेते हैं। चाहे 1948 का पाकिस्तान का कबायली हमला हो या 1962 में चीन से युद्ध हो या 1965 व 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध। यहां के वीरों ने मातृभमि की रक्षा हेतु सदैव अपना जीवन बलिदान किया हैं। सेना के तीनों अंगो की आन की रक्षा के लिए यहां के नौजवान सैनिकों के उत्सर्ग को राष्ट्र कभी भुला नही सकता है। राजस्थान में झुंझुनू जिले के नवयुवकों में सेना में भर्ती होने की बहुत पुरानी परम्परा रही है। यहां के गांवों में घर-घर में सैनिक होता है।

सेना के प्रति यहां के लगाव के कारण अंग्रेजों ने यहां एक सैनिक छावनी की स्थापना कर ‘शेखावाटी ब्रिगेड ‘ का गठन किया था। झुंझुनू जिले के वीर जवानों को उनके शौर्यपूर्ण कारनामों के लिये समय-समय पर भारत सरकार द्वारा विभिन्न अलंकरणों से नवाजा जाता रहा है। अब तक इस जिले के कुल 130 से अधिक सैनिकों को वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। जो पूरे देश में किसी एक जिले के सर्वाधिक संख्या है। भारतीय सेना में योगदान के लिए झुंझुनू जिले का देश में अव्वल नम्बर हैं। वर्तमान में इस जिले के 55 हजार जवान सेना में कार्यरत हैं। वहीं जिले में करीबन 60 हजार भूतपूर्व सैनिक व अर्धसैनिक बलों के जवान हैं। आजादी के बाद भारतीय सेना की ओर से राष्ट्र की सीमा की रक्षा करते हुए यहां के 486 जवान शहीद हो चुके हैं। जो पूरे देश में किसी एक जिले से सर्वाधिक है।

कारगिल युद्ध के दौरान पूरे देश में 527 जवान बलिदान हुए थे जिनमें यहां के 19 सैनिक शामिल थे। जो पूरे देश में किसी एक जिले से बलिदान देने वालों में सर्वाधिक थे। झुंझुनू जिले से अब तक 486 से अधिक सैनिक जवान सीमा पर बलिदान हो चुके हैं। यहां के गांवों में लोकदेवताओं की तरह पूजे जाने वाले बलिदानों के स्मारक इस परम्परा के प्रतीक हैं। इस जिले के वीरों ने बहादुरी का जो इतिहास रचा है उसी का परिणाम है कि भारतीय सैन्य बल में उच्च पदों पर सम्पूर्ण राजस्थान की ओर से झुंझुनू जिले का ही वर्चस्व रहा है। इस क्षेत्र के सैनिकों ने भारतीय सेना में रहकर विभिन्न युद्धों में बहादुरी एवं शौर्य की बदौलत जो वीरता पदक प्राप्त किए हैं वे किसी भी एक जिले के लिये प्रतिष्ठा एवं गौरव का विषय हो सकता हैं। सीमा युद्ध के अलावा जिले के बहादुर सैनिकों ने देश मे आंतरिक शान्ति स्थापित करने में भी सदैव विशेष भूमिका निभाई हैं। सीमा संघर्ष एवं नागा होस्टीलीटीज हो या आपरेशन ब्लूस्टार या श्रीलंका सरकार की मदद हेतु किए गए आपरेशन पवन अथवा कश्मीर में चलाया गया आतंकवादी अभियान रक्षक या कारगिल युद्ध- सभी अभियानों में यहां के सैनिकों ने शहादत देकर जिले का मान बढ़ाया है।

झुंझुनू जिले के हवलदार मेजर पीरूसिंह शेखावत को 1948 के युद्ध में वीरता के लिए देश का सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया जा चुका है। परमवीर चक्र पाने वाले पीरूसिंह शेखावत देश के दूसरे व राजस्थान के पहले सैनिक थे। यहां के सैनिकों ने द्वितीय विश्व युद्ध में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। आज भी यहां द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व सैनिकों की विधवाओं को सरकार से पेंशन मिल रही है। यहां के जवानों ने सेना के सर्वोच्च पदों तक पहुंच कर अपनी प्रतीभा का प्रदर्शन किया है। इस जिले के चित्तोसा गांव के एडमिरल विजय सिंह शेखावत भारतीय नौसेना के अध्यक्ष रह चुके है।

वहीं स्व. कुन्दन सिंह शेखावत थल सेना में लेफ्टिनेन्ट जनरल व भारत सरकार के रक्षा सचिव रह चुके हैं। जे.पी.नेहरा, सत्यपाल कटेवा, लेफ्टिनेंट जनरल केके रेप्सवाल सेना में लेफ्टिनेन्ट जनरल पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। लेफ्टिनेंट जनरल बसंत कुमार रेप्सवाल सेना सेवा कोर में कार्यरत हैं। इसके अलावा यहां के काफी लोग सेना में मेजर जनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल, मेजर सहित अन्य महत्वपूर्ण पदों पर हैं। देश में झुंझुनू एकमात्र ऐसा जिला है जहां सैनिक छावनी नहीं होने के उपरान्त भी गत पचास वर्षों से अधिक समय से सेना भर्ती कार्यालय कार्यरत है। इससे यहां के काफी युवकों को सेना में भर्ती होने का मौका मिल पाता है। जिले में इतने अधिक लोगों का सेना से जुड़ाव होने के उपरान्त भी सरकार द्वारा सैनिक परिवारों की बेहतरी व सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए बहुत कुछ किया जाना अभी बाकी है।

कारगिल युद्ध के समय सरकार द्वारा घोषित पैकेज में यह बात भी शामिल थी कि हर शहीद के नाम पर उनके गांव में किसी स्कूल का नामकरण किया जाएगा मगर जिले के ऐसे कई शहीदों के नाम पर अब तक सरकार ने स्कूलों का नामकरण कई नहीं किया है। झुंझुनू जिले के दोरासर गांव में सैनिक स्कूल प्रारम्भ हो चुका है, जिसका लाभ सेना में जाने वाले यहां के युवाओं को मिलेगा। 19 साल पहले हमने करगिल तो जीत लिया था, लेकिन शहीदों के परिवारों के सामने आज भी समस्याओं के कई करगिल खड़े हैं। जिन पर जीत दर्ज करनी अभी बाकी है। सरकार द्वारा झुंझुनू जिले को देश का सैनिक जिला घोषित कर यहां के सैनिक परिवारों को सुविधाएं उपलब्ध करवाने की तरफ पर्याप्त ध्यान दे तो आज भी झुंझुनू क्षेत्र से अनेक पीरूसिंह पैदा होकर देश के लिए प्राण न्योछावर कर सकते हैं। झुंझुनू जिले के सैनिकों की बहादुरी देखकर कवि ने अपनी रचना में भी झुंझुनू के वीरो का गुणगान इस प्रकार किया है। शुरा निपजे झुंझुनू, लिया कफन का साथ । रण-भूमि का लाडला, प्राण हथेली हाथ ।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

Topics: भारत-पाकिस्तान युद्धपाञ्चजन्य विशेषमातृभमि की रक्षाभूतपूर्व सैनिक व अर्धसैनिक बलों के जवानहवलदार मेजर पीरूसिंह शेखावतदेश का सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र
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