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‘मामा’ के साथ रही ‘लाड़ली’

मध्यप्रदेश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और लाड़ली बहना ने दिलाया दो तिहाई बहुमत। जीत के लिए भाजपा की रणनीति भी रही कारगर। मतदाताओं ने नकारात्मक मुद्दों की राजनीति करने वाली कांग्रेस को सिखाया सबक

Written byरमेश शर्मारमेश शर्मा
Dec 11, 2023, 11:15 am IST
inविश्लेषण, मध्य प्रदेश

इस विजय में भाजपा का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के जनहितैषी विकास कार्य विशेषकर, लाड़ली बहना योजना की भूमिका मुख्य आधार है। इस चुनाव में मतदाता ने यह संकेत भी दिया है कि नकारात्मक राजनीति के दिन चले गए।

मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने दो तिहाई बहुमत प्राप्त करके एक बार फिर इतिहास बनाया है। इस विजय में भाजपा का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के जनहितैषी विकास कार्य विशेषकर, लाड़ली बहना योजना की भूमिका मुख्य आधार है। इस चुनाव में मतदाता ने यह संकेत भी दिया है कि नकारात्मक राजनीति के दिन चले गए।

छत्तीसगढ़ अलग होने के बाद मध्यप्रदेश के वर्तमान स्वरूप में यह पांचवां विधानसभा चुनाव था। कुल 230 विधानसभा क्षेत्रों से सत्तारूढ़ भाजपा ने 48.55 प्रतिशत वोटों के साथ 163 सीटें जीतीं और कांग्रेस को 40.5 प्रतिशत वोटों के साथ 66 सीटें मिलीं। एक सीट अन्य को गई। इस परिणाम की 2018 के विधानसभा चुनाव परिणाम से तुलना करें, तो तब भाजपा को लगभग 41.02 प्रतिशत वोटों के साथ 109 सीटें तथा कांग्रेस को 40.89 प्रतिशत वोटों के साथ 114 सीटें मिलीं थीं, जबकि निर्दलीय सहित अन्य दलों के खाते में सात सीटें थीं। अब 2023 में भाजपा को लगभग 7.53 प्रतिशत वोटों के लाभ के साथ 54 सीटों की बढ़त मिली है, जबकि कांग्रेस को 48 सीटों का घाटा हुआ। लेकिन कांग्रेस का वोट उतना नहीं घटा, जितनी सीटें घट गर्इं। कांग्रेस के वोट शेयर में मात्र 0.49 प्रतिशत की ही कमी आई है। स्पष्ट है कि भाजपा ने अन्य दलों के मतदाता को आकर्षित करके अपना वोट और सीटें बढ़ाई हैं।

2018 में भाजपा और कांग्रेस के अतिरिक्त अन्य दलों और निर्दलीयों को लगभग 18 प्रतिशत वोट मिले थे, जिनमें बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, जयस आदि सभी दलों के साथ निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले वोट भी शामिल थे। इस बार इस ‘अन्य पक्ष’ को मिले वोटों में लगभग सात प्रतिशत की गिरावट आई, जो सीधे भाजपा के खाते में गई। यदि समाज जीवन की लोक शैली के अनुसार मध्यप्रदेश के क्षेत्रीय अंचलों का विभाजन करें तो विन्ध्य, बुंदेलखड, मध्यभारत, महाकौशल, मालवा निमाड़ और भोपाल क्षेत्र में बांटा जा सकता है। भाजपा को इन सभी अंचलों में बढ़त मिली। इसके साथ महिला, युवा, किसान, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सभी क्षेत्र में भाजपा के वोट और सीटें दोनों बढ़ी हैं। भाजपा को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 57 सीटों में से 25 और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 35 सीटों में से 25 सीटें मिलीं। इस जीत में महिलाओं का योगदान सर्वाधिक है। प्रदेश की 50 प्रतिशत महिलाओं ने भाजपा को और 40 प्रतिशत महिलाओं ने कांग्रेस को वोट किया, जबकि 44 पुरुषों ने भाजपा को और 40 प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट दिया।

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नतीजों पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए (बाएं से) नरेन्द्र सिंह तोमर, शिवराज सिंह चौहान, विष्णुदत्त शर्मा एवं ज्योतिरादित्य सिंधिया

मोदी अंतराष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। उनकी प्राथमिकता भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्य हैं, जो उनके जीवन की सक्रियता और निर्णयों से स्पष्ट है। उनके मन में मध्यप्रदेश का विकास प्राथमिकता में है। इसे प्रकट करने के लिए भाजपा ने नारा दिया- ‘एमपी के मन में मोदी और मोदी के मन में एमपी।’ चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री मोदी ने 15 जिलों में कुल 14 सभाएं और एक रैली की। इसमें उन्होंने भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प व्यक्त किया और मध्यप्रदेश भाजपा द्वारा चुनाव घोषणापत्र में किए गए विकास कार्यों के संकल्प को पूरा करने की गारंटी दी।

भाजपा की रणनीति

भाजपा को मिले इस मत प्रतिशत और ऐतिहासिक जीत के चार प्रमुख आधार बने। सबसे महत्वपूर्ण है भाजपा की संगठन शक्ति। दूसरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्र और संस्कृति रक्षक के रूप में छवि, तीसरा मध्यप्रदेश सरकार के जनहितैषी कार्य और चौथा है कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की नकारात्मक राजनीति। इस ऐतिहासिक जीत में भाजपा संगठन की रणनीति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही। चुनाव संचालन की पूरी कमान केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में रही। दो केंद्रीय मंत्रियों भूपेंद्र यादव और अश्विनी वैष्णव को कमान सौंपी गई थी। इनका सतत संपर्क राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से रहा। केंद्रीय नेताओं की उपस्थिति से स्थानीय कार्यकर्ताओं की आंतरिक असहजता को उभरने का अवसर नहीं मिला। सबने एकजुट होकर प्रचार एवं मतदाता संपर्क कार्य किया। भाजपा ने प्रदेश के सभी विधानसभा क्षेत्रों का आकलन करके सीटों को चार श्रेणियों में बांटा था। पहली श्रेणी में वे सीटें रखी गई थीं, जहां भाजपा भाजपा कभी नहीं जीती, दूसरी वे सीटें थीं जहां भाजपा कमजोर रही। तीसरी, जहां कड़ा मुकाबला होना था और चौथी श्रेणी में वे सीटें थीं, जहां भाजपा आसानी से जीत सकती थी।

भाजपा ने पहली दो श्रेणी की 76 सीटों पर चुनावों की घोषणा होने के बहुत पहले अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए थे, ताकि समय रहते जमावट हो जाए। इसके साथ तीन केंद्रीय मंत्रियों सहित सात सांसदों, दो पूर्व सांसदों और एक राष्ट्रीय महासचिव को चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतारा। यद्यपि इनमें एक केंद्रीय मंत्री फग्गन सिह कुलस्ते और एक सांसद गणेश सिंह चुनाव हार गए, पर इन्हें उम्मीदवार बनाए जाने से आसपास की कमजोर सीटों पर वातावरण बना, जिसका लाभ पूरे संसदीय क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवारों को मिला। दो केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रह्लाद पटेल तथा सांसद रीता पाठक, राकेश सिंह व उदय प्रताप सिंह और महासचिव कैलाश विजयवर्गीय स्वयं तो चुनाव जीते ही आसपास की सीटों पर भी पार्टी को जिताया। भाजपा की इस ऐतिहासिक विजय में दूसरा आधार प्रधानमंत्री मोदी की छवि रही।

मोदी अंतराष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। उनकी प्राथमिकता भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्य हैं, जो उनके जीवन की सक्रियता और निर्णयों से स्पष्ट है। उनके मन में मध्यप्रदेश का विकास प्राथमिकता में है। इसे प्रकट करने के लिए भाजपा ने नारा दिया- ‘एमपी के मन में मोदी और मोदी के मन में एमपी।’ चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री मोदी ने 15 जिलों में कुल 14 सभाएं और एक रैली की। इसमें उन्होंने भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प व्यक्त किया और मध्यप्रदेश भाजपा द्वारा चुनाव घोषणापत्र में किए गए विकास कार्यों के संकल्प को पूरा करने की गारंटी दी। उन्होंने महिलाओं की महत्ता का भी उल्लेख किया। उज्ज्वला योजना सहित केंद्र सरकार की लगभग 15 ऐसी योजनाएं हैं, जो महिला कल्याण से संबंधित हैं और मोदी के कार्यकाल में आरंभ हुईं। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी के संकल्प की मतदाताओं पर विशेषकर, महिला मतदाताओं पर गहरा प्रभाव देखा गया, जो मतदान में भी दिखा और परिणाम में भी।

केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति और प्रधानमंत्री मोदी की छवि के साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता और उनके द्वारा किए विकास कार्य भी इस चुनाव में भाजपा की बड़ी शक्ति रही है। शिवराज सिंह चौहान ने अपने चुनाव प्रचार अभियान में कुल 165 चुनाव सभाएं और रैलियां कीं। उनके शासनकाल में जननी सुरक्षा, लाड़ली लक्ष्मी, मुख्यमंत्री कन्यादान जैसी योजनाओं के साथ छात्रवृत्ति, कृषि ऋण आदि में भी महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान किए गए थे। इसी कड़ी में ‘लाड़ली बहना’ योजना सामने आई, जिसने अपनी अलग छाप छोड़ी। इस योजना के अंतर्गत पहले प्रतिमाह एक हजार रुपये दिए जाते थे, जिसे बढ़ाकर 1250 रुपये किया गया। अब आश्वासन दिया गया है कि यह राशि बढ़ाकर प्रतिमाह 3,000 रुपये की जाएगी। इस योजना की चर्चा पूरे चुनाव में रही। मतदान प्रतिशत में वृद्धि और भाजपा को मिले बहुमत में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आरंभ की गई की गई महिला कल्याण योजनाओं में राज्य सरकार की इस ‘लाड़ली बहना’ योजना को भाजपा के विजय अभियान में महत्वपूर्ण कारक माना गया।

मतदाताओं ने नकारात्मक राजनीति को नकारा

मध्यप्रदेश में भाजपा को मिले दो तिहाई बहुमत में जहां भाजपा की रणनीति महत्वपूर्ण कारक रही, वहीं कांग्रेस की नकारात्मक मुद्दों की रणनीति ने उसे सत्ता से बहुत दूर कर दिया। चुनाव अभियान के आरंभ में कांग्रेस अपेक्षाकृत अधिक आक्रामक रही, लेकिन धीरे-धीरे शिथिल होती गई। टिकट वितरण के समय तो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद खुलकर उभरे। सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे के कपड़े फाड़ने के बयान भी वायरल हुए, जिसका प्रभाव कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर पड़ा। चुनाव प्रचार की दृष्टि से कांग्रेस की रणनीति तीन बिंदुओं पर केंद्रित रही। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक वातावरण से भाजपा का बढ़ता जन समर्थन था और है। यह माना जाता है कि जातिवाद सामाजिक एकत्व में दरारें पैदा करता है।

इस चुनाव में कांग्रेस ने जातीय आधारित जनगणना का मुद्दा उछाला और ओबीसी वर्ग के आरक्षण की बात कही। कांग्रेस द्वारा जातीय आधारित जनगणना पर जोर देने से यह संदेश भी गया कि कांग्रेस सामाजिक एकत्व को कमजोर करना चाहती है। इसके साथ यह भी माना जाता है कि ओबीसी वर्ग का झुकाव भाजपा की ओर अपेक्षाकृत अधिक है। यह धारणा भी बनी कि कांग्रेस ने इसमें सेंध लगाने के प्रयास में ही आरक्षण में ओबीसी वर्ग को शामिल करने की बात कही। यही नहीं, प्रत्याशी चयन में भी कांग्रेस ने ऐसे कार्यकर्ताओं को आगे किया, जो भाजपा समर्थक जातीय समीकरणों में सेंध लगा सके लेकिन इससे कांग्रेस को लाभ होने के बजाय नुकसान हुआ।

कांग्रेस की दूसरी रणनीति भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए कार्यों में कमियां निकाल कर बेरोजगारी, महंगाई के मुद्दे उठाकर सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यों से मतदाता का ध्यान हटाने का प्रयास किया। इनके साथ महिला अपराध की कुछ घटनाओं का उदाहरण देकर लाड़ली बहना योजना के प्रति महिलाओं में बढ़े आकर्षण में सेंध लगाने का प्रयास किया। भाजपा द्वारा भावी मुख्यमंत्री का नाम उजागर न करने को भी कांग्रेस ने मुद्दा बनाकर शिवराज सिंह चौहान पर हमले किए। वस्तुत: कांग्रेस शिवराज सिंह चौहान समर्थक मतदाता में असमंजस पैदा करना चाहती थी, लेकिन यह रणनीति भी प्रभावहीन रही।

परिणाम का संदेश

विधानसभा चुनाव में दोनों प्रतिद्वंद्वियों, भाजपा और कांग्रेस ने अपनी-अपनी रणनीति पर काम किया। जो परिणाम आए, वे इन दोनों द्वारा प्रदर्शित किए गए स्वरूप के आधार पर आए, जिससे भविष्य की राजनीति के लिए मतदाता का स्पष्ट संदेश मिलता है। मतदाता ने जहां भाजपा को दो तिहाई बहुमत देकर सरकार चलाने का अवसर दिया, वहीं यह स्पष्ट भी कर दिया कि भविष्य में नकारात्मक मुद्दों की राजनीति नहीं चलेगी और जनता उसी राजनीतिक दल को अपना समर्थन देगी, जो भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक वैभव को विकसित करने के प्रति समर्पित हो और समाज के विकास के लिए आधारभूत निर्णय ले।

Topics: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीनरेंद्र सिंह तोमरउदय प्रताप सिंहलाड़ली बहना योजनाकैलाश विजयवर्गीयस्कृतिक राष्ट्रवादप्रह्लाद पटेलरीता पाठकराकेश सिंह
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