तुर्किये: फिर जीते एर्दोगन, फिर जीता इस्लामी कट्टरपंथ
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तुर्किये: फिर जीते एर्दोगन, फिर जीता इस्लामी कट्टरपंथ

एर्दोगन इस्लाम के ​कट्टरपंथी स्वरूप के पैरोकार हैं जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी रहे कमाल केलिचडारोहलू सुधारवादी, उन्मुक्त सोच के पश्चिमी देशों से संबंध प्रगाढ़ करने के पैरोकार थे

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 30, 2023, 02:45 pm IST
in विश्व
राष्ट्रपति एर्दोगन तुर्किये की इस्लामी पहचान को प्रमुखता से उभारते हुए रूढ़िवादी लोगों को अपने पाले में रखने में कामयाब रहे

राष्ट्रपति एर्दोगन तुर्किये की इस्लामी पहचान को प्रमुखता से उभारते हुए रूढ़िवादी लोगों को अपने पाले में रखने में कामयाब रहे

कहने को तो इस बार तुर्किये के राष्ट्रपति चुनाव में दो दलों में टक्कर कांटे की रही, लेकिन अंतत: रेसिप तैयिप एर्दोगन फिर से राष्ट्रपति बन गए। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी केलिचडारोहलू, जिन्हें भारत की मीडिया ने ‘तुर्किये का गांधी’ कहकर प्रचारित किया था, उन्हें हराया है। दो दिन पहले एर्दोगन की इस लगातार 11वीं बार जीत की घोषणा हुई थी। हालांकि उनका जीतना कई वर्गों में निश्चित माना जा रहा था, लेकिन पहले दौर के मतदान में उन्हें पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया था। लेकिन अब 53 प्रतिशत मत के साथ वे विजयी घोषित हुए। विपक्षी दल के नेता कमाल केलिचडारोहलू को 47 प्रतिशत मत ही मिले।

तुर्किये की कुर्सी पर एक बार फिर से बैठे एर्दोगन की वापसी के साथ ही उस देश में इस्लामी कट्टरपंथ और मजबूत हुआ है। कारण, एर्दोगन इस्लाम के ​कट्टरपंथी स्वरूप के पैरोकार हैं और उनके ही आदेश के बाद कानून बदलकर ​इस्लामी हिजाब पहनकर महिलाएं सरकारी कामकाज करने आती हैं। जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी रहे कमाल केलिचडारोहलू सुधारवादी, उन्मुक्त सोच के पश्चिमी देशों से संबंध प्रगाढ़ करने के पैरोकार थे। लेकिन चुनाव परिणाम ने एक बार फिर दिखा दिया कि भूकंप से त्रस्त और तबाह हुए उस देश में एर्दोगन चीजें पटरी पर भले ही न लाए पाए हों, मुद्रास्फीति चरम पर हो, चीजों के दाम आसमान छू रहे हों, लेकिन देश के मुसलमान कट्टरपंथी सोच पर ही चलेंगे। यूं भी एर्दोगन ‘इस्लामी जगत का खलीफा’ बनने का सपना पाले बैठे हैं।

एर्दोगन के प्रतिद्वंद्वी रहे कमाल केलिचडारोहलू सुधारवादी, उन्मुक्त सोच के पश्चिमी देशों से संबंध प्रगाढ़ करने के पैरोकार थे

एर्दोगन के राज में वहां की मुद्रा लीरा लगातार पतन की शिकार रही है। लेकिन इस्लाम से जुड़े कट्टरपंथी मुद्दों पर उनकी सोच उन्हें कामयाब बना गई। जैसे, समलैंगिकता का उन्होंने खुलकर विरोध किया। 2020 के अपने उस फरमान को प्रचारित किया ​जिसने यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट बनी हाजिया सोफिया को फिर से मस्जिद का रूप दे दिया था।

तुर्किये के इन चुनाव परिणामों का असर अंकारा से कहीं दूर तक दिखने वाला है। भौगोलिक तौर पर तुर्किये स्थित है यूरोप और एशिया के बीच। यह उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का भी सदस्य है। देश पर राष्ट्रपति एर्दोगन का एकछत्र राज है। एर्दोगन की नीतियां कट्टर सोच वालों को भाती हैं, फिर वे चाहे देश के हों या देश के बाहर के। भारत के जम्मू कश्मीर को लेकर इसीलिए वह पाकिस्तान का राग ही दोहराता है।

तुर्किये के इस बार के मतदान में भाग लेने वाली 40 लाख मतदाताओं के सामने इस बार एक विकल्प था देश को शेष दुनिया के साथ ले चलने वाली सुधारवादी और समन्वयवादी राह पकड़ने का, जिससे वह आश्चर्यजनक रूप से करीब आ भी गया था, लेकिन एर्दोगन ने येनकेनप्रकारेण इस्लामवाद को उकसाया और जर्जर अर्थव्यवस्था के बावजूद लोगों को एक सपना दिखाकर चुनाव जीत लिया। कहने वाले कह रहे हैं, और एकाध वीडियो भी सोशल मीडिया पर दिखाई दिए हैं कि एर्दोगन ने चुनाव जीतने के लिए पैसे बांटने से भी गुरेज नहीं किया।

बताया गया है कि तुर्किये के इतिहास में यह पहला ऐसा राष्ट्रपति चुनाव है जिसमें बहुमत की उम्मीद में मतदान दो दौर में हुआ है।

राष्ट्रपति एर्दोगन तुर्किये की इस्लामी पहचान को प्रमुखता से उभारते हुए रूढ़िवादी लोगों को अपने पाले में रखने में कामयाब रहे हैं। जबकि वहां जारी रिकॉर्ड तोड़ महंगाई, और भूकंप से बेघर हुए लोग अब भी दर—दर भटक रहे हैं। फरवरी में आए भूकंप से मची तबाही से देश को पूरी तरह उबारने में एर्दोगन नाकाम साबित रहे हैं। इसीलिए पहले दौर में विपक्षी उम्मीदवार का उन्हें कांटे की टक्कर दे पाए थे।

कुर्सी पर तीसरे दशक में प्रवेश करने वाले एर्दोगन सबसे पहले 2003 में प्रधानमंत्री चुनाव जीते थे। लगभग दस साल तक प्रधानमंत्री रहने के बाद उन्होंने सत्ता व्यवस्था में बदल किया और देश के राष्ट्रपति बन बैठे। एर्दोगन के राज में वहां की मुद्रा लीरा लगातार पतन की शिकार रही है। लेकिन इस्लाम से जुड़े कट्टरपंथी मुद्दों पर उनकी सोच उन्हें कामयाब बना गई। जैसे, समलैंगिकता का उन्होंने खुलकर विरोध किया। 2020 के अपने उस फरमान को प्रचारित किया ​जिसने यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट बनी हाजिया सोफिया को फिर से मस्जिद का रूप दे दिया था।

चुनाव जीतने के बाद लोगों को संबोधित करते हुए एर्दोगन ने जाने किस गणित के आधार पर कहा कि महंगाई आसमान छूने के बाद भी ब्याज दरें कम रखने की नीति पर चला जाएगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह नीति अर्थशास्त्र के उलट है।

ऐसे संकेत मिले हैं कि विदेश नीति भी इस सरकार के अंतर्गत अमेरिका तथा यूरोप से दूरी बनाए रखेगी। लेकिन तुर्किये के उस नाटो, जिसका अगुआ अमेरिका है, का सदस्य बन रहते हुए भी रूस से नजदीकी बनाए हुए है। यूक्रेन युद्ध की आड़ में पश्चिमी देशों ने रूस पर जो पाबंदियां लगाई हैं उनमें एर्दोगन की सरकार प्रतिभागी नहीं है। कूटनीति के विशेषज्ञ कहते हैं कि नाटो में रहते हुए अपना अलग राप अलापने वाला तुर्किये इस संगठन में अड़चनें डालना बंद नहीं करेगा।

Topics: inflationerdoganनाटोMuslimतुर्कियेIslamएर्दोगनPresidentfanaticismराष्ट्रपतिleeraelectionankaraAmericaistambulnatoturkiye
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