खामेनेई के जनाजे की आड़ में क्या Iran दे रहा दुनिया को मजहबी-राजनीतिक संकेत! हमास और हिज्बुल्लाह के नेता भी पहुंचे ईरान
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खामेनेई के जनाजे की आड़ में क्या Iran दे रहा दुनिया को मजहबी-राजनीतिक संकेत! हमास और हिज्बुल्लाह के नेता भी पहुंचे ईरान

हिज्बुल्लाह (लेबनान), हमास और इस्लामी जिहाद (फिलिस्तीन), हूती (यमन) और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के साथ विशेष मजहबी आयतें दोहराई गईं, औपचारिक रूप से उनको सम्मान देकर, ईरानी सत्ता ने उनसे अपने पारस्परिक मजहबी संबंध को सार्वजनिक रूप से पेश किया है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Jul 6, 2026, 02:32 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
'अंतिम दर्शन' के लिए तेहरान की ग्रेंड मोसल्ला मस्जिद में रखे खामेनेई और मारे गए परिवार के अन्य सदस्यों के ताबूत

'अंतिम दर्शन' के लिए तेहरान की ग्रेंड मोसल्ला मस्जिद में रखे खामेनेई और मारे गए परिवार के अन्य सदस्यों के ताबूत

ईरान ही नहीं, दुनिया के इस्लामी देश, खासकर शिया देश ‘मातम’ में डूबे हैं। उन देशों और दूसरे अनेक देशों के राजनीतिक, पांथिक, सामाजिक प्रतिनिधि अयातुल्ला अली खामेनेई के जनाजे के सामने अपना अफसोस जताने तेहरान पहुंचे हैं या पहुंच रहे हैं। सब जानते हैं कि गत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इस्राएल की ओर से किए एक हवाई हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनई और उनके परिवार के अनेक लोगों की मृत्यु हुई थी। ईरान हिल गया था, सहम गया था और अमेरिका से इसका बदला लेने की कसमें खाई गई थीं। उस शिया देश में ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र में तीखीं प्रतिक्रियाएं उभरी थीं।

अब चार महीने बाद, पूरे राजकीय सम्मान के साथ खामेनेई का दफनाने के पूर्व आयोजन चल रहे हैं, ताबूत के ‘अंतिम दर्शन’ के लिए जन सागर तेहरान की गलियों, सड़कों को पाटे हुए है। लेकिन क्या ये महज एक मजहबी प्रक्रिया के अंतर्गत हो रहा है या इसके पीछे ईरान की दुनिया को एक संदेश देने की भी सोच है, जो मजहबी और राजनीतिक, दोनों आयामों को लक्ष्य करती है। इस सवाल पर विश्व के कई राजनीतिक विश्लेषक बहस में उलझे हुए हैं।

जिस तरह से जनाजे को ‘अंतिम दर्शन’ के लिए लंबे चौड़े इंतजाम के साथ रखा गया है, खामेनेई के ‘अंतिम संस्कार’ से पूर्व चल रही मजहबी—राजनीतिक प्रक्रियाएं, जिस रास्ते से जनाजा ले जाया जाना है उसका खास मार्ग और उस मौके पर आयोजित होने वाले अन्य कार्यक्रम शासन की दूरगामी रणनीतियों की ओर संकेत करते हैं। ईरानी सत्ता घरेलू और दुनिया के अन्य देशों के सामने एक ​नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश में दिखती है।

मस्जिद के बाहर मातमी भीड़

जैसा पहले बताया, 28 फरवरी 2026 को अयातुल्ला अली खामेनई की मौत के बाद, ईरानी सत्ता ने इसे ‘शहादत’ के रूप में पेश किया था। इसके बाद 1–2 मार्च 2026 को शोक-सत्र रखा गया था और ताबूत को आमजन के ‘अंतिम दर्शन’ के लिए ग्रैंड मोसल्ला, तेहरान में रखा गया था। ग्रैंड मोसल्ला ईरान के पहले सुप्रीम लीडर रूहोल्लाह खुमैनी को समर्पित मजहबी परिसर है।

फिर 3 से 9 मार्च 2026 तक एक सप्ताह तक ‘शोक यात्रा’ निकाली गई जिसमें तेहरान से होते हुए कुम, फिर इराक के नजफ और करबलाह से गुजरकर माश्हद में ‘अंतिम विश्राम’ तक के कार्यक्रम शामिल थे। 12 मार्च 2026 को वर्तमान सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनई का कथित संदेश सार्वजनिक किया गया, जिसमें उनके पिता यानी खामेनेई के ‘मुट्ठी बंधे मजबूत हाथ’ का जिक्र था। मोजतबा का यह संदेश ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी की मौत के ठीक पहले आया था। इससे लोगों में संकट के बढ़ने का डर बढ़ा था।

खामेनेई के ‘अंतिम संस्कार’ समारोहों में इस्तेमाल किए गए रंग, चित्र और नारे बड़े सोच—समझकर चुने गए थे ताकि शिया मजहबी स्मृति और प्रतिरोधी राजनीति को जोड़ा जा सके। जैसे काले और लाल रंग की बात करें तो काला रंग शोक का प्रतीक है, जबकि लाल शहादत और रक्त का संकेत देता है; दोनों मिलकर शोक और बदले की भावना का मजहबी संकल्प सामने रखते हैं।

ऐसे मौकों पर मरहूम खामेनई की बांए हाथ की मुट्ठी की तस्वीरें लगाया जाना और इसे दृढ़ता और प्रतिरोध का प्रतीक बताते हुए खूब प्रचारित करना भी ईरानी ‘एकजुटता’ का संदेश देने की कोशिश ही दिखती है। इसी तस्वीर को मोजतबा के संदेश में शमिल करके उनके सख्त और सतत नेतृत्व का संकेत देने का प्रयास किया गया।

तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला परिसर पर फहराया गया लाल झंडा, जिस पर अरबी में ‘वेंजर्स ऑफ हुसैन’ (कर्बला के बदले की पुकार) लिखा था, खामेनेई की मौत को करबला की शहादत की कहानी से सीधे जोड़ने का संकेत है। खामेनई की मौत को ‘जबरदस्त मजहबी अन्याय’ से जोड़कर बदले को एक शीर्ष मजहबी कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

जनाजे के रास्ते के मजहबी-राजनीतिक मायने
खामेनई की पार्थिव देह को ले जाने का रास्ता ऐसे ही नहीं चुना गया था, इसके पीछे इस्लामी गणतंत्र की विचारधारा की बुनियाद उसके परशियन राजनीतिक-सामरिक तानेबाने का प्रदर्शन करने की सोच थी। यह ग्रैंड मोसल्ला, तेहरान में शोक समारोह की शुरुआत में रूहोल्लाह खुमैनी से इसका संबंध दर्शाने का इरादा दर्शाती है। यानी ये दिखाना कि खामेनई और क्रांति के जनक खुमैनी की मजहबी सोच एक ही थी।

नजफ व कर्बला जैसे प्रमुख शिया स्थलों से जनाजा गुजारकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजहबी फैलाव दर्शाने का प्रयास किया गया। सब जानते हैं कि कर्बला का संदर्भ खासकर शहादत और विरोध की ‘सोच’ को उभारता है। ईरान के भीतर मजहबी स्थल माश्हद पर अंतिम संस्कार करना देश के भीतर मजहबी-राजनीतिक गठजोड़ का प्रतीक माना जा रहा है।

बेशक, खामेनेई के ताबूत के ‘अंतिम दर्शन’ करने देश—दुनिया के विशेष प्रतिनिधि पहुंच रहे हैं। विदेश से वहां पहुंचे हिज्बुल्लाह (लेबनान), हमास और इस्लामी जिहाद (फिलिस्तीन), हूती (यमन) और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के साथ विशेष मजहबी आयतें दोहराई गईं और औपचारिक रूप से उनको सम्मान देकर, ईरानी सत्ता ने उनसे अपने पारस्परिक मजहबी संबंध को सार्वजनिक रूप से पेश किया है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि उपरोक्त हर इस्लामवादी समूह अथवा प्रतिनिधिमंडल के अफसोस जताने के मौके पर कुरान की अलग अलग आयतें पढ़ना तय किया गया था। किसी समूह के लिए सहानुभूति, निष्ठा और दृढ़ता पर जोर देने वाली आयतें पढ़ी गईं तो किसी के लिए कोई अलग संदेश देने वाली आयतें। सऊदी प्रतिनिधियों के साथ पढ़ी गई आयत, जिसमें बद्र की लड़ाई का उल्लेख था, ने खासकर अरबी मीडिया में बहस छेड़ दी क्योंकि कुछ लोगों ने इसे प्रतिद्वंद्विता या चुनौती के संदेश के रूप में देखा।

कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरानी सत्ता ने ‘अंतिम संस्कार’ के प्रतीकात्मक पहलुओं का इस्तेमाल कई घरेलू लक्ष्यों की पूर्ति के लिए किया है। ‘हमें उठना होगा’ का नारा और शोक, यह दिखाते हैं कि खून की शहादत के साथ शासन की वैधता अनिवार्य है। कर्बला और शहादत के मजहबी संदर्भ प्रतिशोध और क्षेत्रीय दुश्मनों के खिलाफ संघर्ष को नैतिक और मजहबी कायदों की तरह पेश करने की कोशिश दिखती है।

मोजतबा को स्थापित करने का प्रयास
वर्तमान सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनई की इस मौके पर गैर-मौजूदगी के बावजूद उनके संदेशों के प्रचार से नए सुप्रीम नेतृत्व के विरोध को रोकने और उसकी वैधता स्थापित करने की कोशिश दिखती है। जनाजे के बड़े पैमाने पर आयोजनों और नारेबाजी के जरिए सार्वजनिक भावना को दर्शाने का प्रयास किया गया है और विरोध के छिटपुट स्वरों को दबाने की रणनीति भी खुलकर दिखती है।

अफसोस मनाने पहुंचे हमास के नेता

ईरानी सत्ता की कोशिश दिखती है कि आधिकारिक बयान ‘विनाश’ या ‘बदले’ का उल्लेख तो करें, पर वास्तविक सैन्य या कूटनीतिक कार्रवाई का स्वरूप धुंधला बना रहे। जैसे 2020 में सोलैमानी के मारे जाने पर की गई सीमित हवाई जवाबी कार्रवाई। इससे साफ हुआ था ​ईरान अक्सर पारंपरिक तरीके से ‘बदला’ लेने की बजाय ऐसे कदम उठाता है जो प्रतीकात्मक हों पर सीधे अमेरिका/इस्राएल को लंबे समय तक खतरा बनाने से दूर रहें।

विश्लेषक मानते हैं कि इन लंबे—चौड़े आयोजनों के बावजूद ईरान में आंतरिक असंतोष बना रहने वाला है। वहां आर्थिक समस्याए हैं, सामाजिक असंतोष है और युवाओं की नाराजगी भी शासन के लिए चुनौतियां बनी रहेगी। सत्ता दिखाने के लिए असहमति को कुछ काबू तो कर सकती है लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं होने तक उथलपुथन बनी रहने वाली है।

अयातुल्ला अली खामेनई के ‘अंतिम संस्कार’ का मौका ईरान को राजनीतिक—मजहबी संकेत भेजने का मौका दे रहा है। रंगों, प्रतीकों और मजहबी स्थलों की सहभागिता न केवल शोक को मजहबी आयोजन की तरह दिखा रही है बल्कि प्रतिरोध, बदले और नेतृत्व की वैधता का एक पारंपरिक-मजहबी आधार भी तैयार कर रही है। घरेलू एकता और क्षेत्रीय तानेबाने को मजबूत करने की यह रणनीति कुछ वक्त के लिए प्रभावी दिख सकती है, पर लंबे वक्त के लिए आर्थिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय आयामों पर स्थिरता देने में दिक्कतें आ सकती हैं। 9 जुलाई को तय खामेनेई के ‘अंतिम संस्कार’ तक ईरान के भीतर और बाहर खदबदाहट जारी रहने वाली है।

Topics: israelहमासHamasshiaख़ामेनेईAli Khameneiईरानsupreme leaderAmericamourningwarIrantehran
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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