G7 में बढ़ता भारत का रुतबा, दुनिया के विकसित देश भी मान रहे भारत का लोहा, समझ रहे भारत का महत्व
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G7 में बढ़ता भारत का रुतबा, दुनिया के विकसित देश भी मान रहे भारत का लोहा, समझ रहे भारत का महत्व

भारत की बढ़ती भूमिका को विशेषज्ञ विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के दुनिया में तेजी से बढ़ रहे कदमों से जोड़कर देखते हैं। अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार होते जाना और सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनना ही इसकी वजह नहीं है, बल्कि रक्षा विनिर्माण, प्रौद्योगिकी और नवाचार सहित एआई में भी भारत के द्वारा निरंतर तय किए जा रहे उन्नत मानदंडों को विश्व में समर्थन मिलना भी भारत की बढ़ती साख के सूचक हैं

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Jun 18, 2026, 02:32 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रां के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रां के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

अभी 15 से 17 जून, 2026 तक फ्रांस के एवियन-लेस-बेन्स में सम्पन्न 52वें G7 शिखर सम्मेलन में दुनिया भर के नेता जुटे। उन्होंने यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया कूटनीति, वैश्विक आर्थिक असंतुलन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गवर्नेंस जैसी अहम चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। भारत G7 समूह का सदस्य नहीं है, लेकिन इसके आउटरीच सत्रों में नियमित और प्रभावशाली रूप से न्योता जाता रहा है। 2025 तक, भारत तेरह G7 शिखर सम्मेलन आउटरीच सत्रों में भाग ले चुका था और इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार सातवीं बार इसमें शामिल हुए।

निश्चित ही भारत की वैश्विक भूमिका अब और बढ़ गई है। कारण? भारत को आज एक बड़ी उभरती हुई अर्थव्यवस्था, ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज और ऊर्जा सुरक्षा, टेक्नोलॉजी, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक स्थिरता जैसे मुद्दों पर एक अहम साझेदार के रूप में देखा जाता है। मेजबान देश भारत को इसलिए बैठक में बुलाता है ताकि व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके और उन वैश्विक चुनौतियों का समाधान किया जा सके जिनके लिए G7 की मुख्य सदस्यता से परे सहयोग की आवश्यकता है।

जी—7 नेताओं के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

सब जानते हैं, G-7 दुनिया की सबसे विकसित और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है। G7 के सदस्य देश हैं-फ्रांस, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंगडम, जापान, अमेरिका और कनाडा। इसके अलावा, यूरोपीय संघ भी सभी चर्चाओं में एक सदस्य के तौर पर शामिल होता है, जिसका प्रतिनिधित्व यूरोपीय परिषद और यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष करते हैं। UN या NATO जैसे संगठनों से उलट, G7 का कोई स्थायी मुख्यालय या कानूनी दर्जा नहीं है। यह बातचीत का मंच है, न कि कोई औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संगठन जिसका स्थायी सचिवालय या कानूनी दर्जा हो।

वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा
हालांकि शुरुआत में इसका फोकस अर्थव्यवस्था पर था, लेकिन बीतते सालों में G7 का एजेंडा काफी बढ़ता गया है और इसमें कई तरह के वैश्विक मुद्दे शामिल होते गए हैं। जैसे, अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा: भू-राजनीतिक तनाव, संघर्ष (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध) और आतंकवाद से निपटना। जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा: जलवायु कार्रवाई, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव और सस्ती व भरोसेमंद ऊर्जा तक पहुंच सुनिश्चित करने के प्रयासों में तालमेल बिठाना। वैश्विक स्वास्थ्य: महामारी और स्वास्थ्य संकटों से निपटने के तरीकों पर चर्चा करना और वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करना। टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: उभरती हुई टेक्नोलॉजी के असर पर ध्यान देना, जिसमें उनका नैतिक इस्तेमाल और गवर्नेंस शामिल है। व्यापार नीतियां और सप्लाई चेन: मुक्त और निष्पक्ष व्यापार को बढ़ावा देना और रुकावटों को दूर करना।विकास और मानवीय सहायता: विकासशील देशों की मदद करने और मानवीय संकटों से निपटने के प्रयासों में तालमेल बिठाना।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बात को ध्यान से सुनते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

इस मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका को विशेषज्ञ विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के दुनिया में तेजी से बढ़ रहे कदमों से जोड़कर देखते हैं। अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार होते जाना और सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनना ही इसकी वजह नहीं है, बल्कि रक्षा विनिर्माण, प्रौद्योगिकी और नवाचार सहित एआई में भी भारत के द्वारा निरंतर तय किए जा रहे उन्नत मानदंडों को विश्व में समर्थन मिलना भी भारत की बढ़ती साख के सूचक हैं।

ग्लोबल साउथ की आवाज

सुप्रसिद्ध थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष राममाधव इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हैं, ”पिछले दो दशकों में वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में आए बदलाव के बीच चीन, आसियान (ASEAN) देश और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाएं नई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के रूप में उभरी हैं। 2020 के दशक तक, भारत ने यूके और जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान हासिल कर लिया। G-7 में अब केवल अमेरिका और जर्मनी की जीडीपी ही भारत से अधिक है। इस बीच, वैश्विक GDP में G-7 की हिस्सेदारी घटकर लगभग 40 प्रतिशत रह गई है।”

वे आगे लिखते हैं, ”G-7 के लिए भारत एक बेहद कीमती साझेदार है। यह एक स्थिर और किसी के लिए खतरा न बनने वाला लोकतंत्र है, जिसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था समूह के सदस्यों के साथ टक्कर ले रही है। यहां एक विशाल घरेलू बाजार और तेज़ी से बढ़ता मध्यम वर्ग है, जो दुनिया के सबसे बड़े मध्यम वर्गों में से एक है। और यह अपार आर्थिक अवसर प्रदान करता है। पीपीपी के हिसाब से, जीडीपी में भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर है, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है। इसके अलावा, तेजी से बदलती ग्लोबल टेक-इकोनॉमी में टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत की तरक्की और कुशल लोगों की बड़ी संख्या इसे और भी आकर्षक बनाती है। सबसे अहम बात यह है कि मोदी के नेतृत्व में भारत ‘ग्लोबल साउथ’ की मुख्य आवाज बनकर उभरा है, जिससे उसकी आर्थिक ताकत के साथ-साथ कूटनीतिक ताकत भी बढ़ी है।”

इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी से भेंट करते प्रधानमंत्री मोदी

इसके संदेह नहीं है कि भारत की कई देशों के साथ मिलकर काम करने की रणनीति में G-7 का खास स्थान है। भारत के इस समूह के सभी सात सदस्य देशों के साथ ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ के समझौते हैं। चार यूरोपीय ताकतों यथा जर्मनी, फ्रांस, इटली और यूके के अलावा, शिखर बैठक में यूरोपीय संघ के नेताओं की मौजूदगी की वजह से आज इस मंच पर यूरोप का दबदबा है। भारत की नई भूरणनीतिक प्राथमिकताओं में यूरोप के साथ रिश्तों को बहुत महत्व दिया गया है। पिछले साल भारत ने यूरोपीय संघ के साथ एक अहम फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (मुक्त व्यापार समझौता) किया था, इसके भी जल्द ही लागू होने की संभावना है।

भारत का ‘विजन’

यूरोप-भारत संबंधों के संदर्भ में रामाधव एक महत्वपूर्ण आयाम की तरफ इशारा करते हैं। वे लिखते हैं कि पिछले दस साल में भारत-यूरोप संबंधों में काफी गति आई है, जिसकी मुख्य वजह है मोदी के दौर में भारत की विदेश नीति में बदलाव। भारत के नए यूरोप-केंद्रित विजन की एक खास बात ‘इंडो-मेडिटेरेनियन’ वाला पहलू है। यह एक उभरता हुआ भूरणनीतिक खाका हिंद महासागर को यूरोप से जोड़ता है। इस विजन को सितंबर 2023 में तब और बढ़ावा मिला, जब जी-20 के अध्यक्ष के तौर पर भारत ने नई दिल्ली में सऊदी अरब, यूएई, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ईयू और अमेरिका के नेताओं की मौजूदगी में ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर’ लॉन्च किया था। इसका मकसद व्यापार, टेक्नोलॉजी और ऊर्जा के क्षेत्रों में भारत के हितों को आगे बढ़ाना है।

मोदी सरकार के नेतृत्व में आज भारत दुनिया में एक प्रमुख आर्थिक और तकनीकी शक्ति के तौर पर उभरने को तैयार है। मोदी ‘आत्मनिर्भरता’ हासिल करने यानी डीप-टेक और दूसरी नई टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने पर तेजी से काम कर रहे हैं। भारत को अपनी बड़ी युवा आबादी की बढ़ती रोजगार जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण की भी आवश्यकता है। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में यूरोप के साथ संबंध बहुत महत्व रखते ही हैं, क्योंकि यूरोप के पास पूंजी और टेक्नोलॉजी है। भारत के लिए यह बात मायने रखती है कि प्रधानमंत्री मोदी इस जरूरत को समझते हैं और दुनिया के उन्नत देश भी जानते हैं कि मोदी है तो उनके पास भी भारत के साथ विस्तार और सहयोग के रास्तों पर बढ़ना मुमकिन है। यही कारण है कि अन्य अनेक अंतरराष्ट्रीय समूहों और मंचों के साथ ही जी—7 में भारत का महत्व और बढ़ गया है।

Topics: economyजी-7भारतटेक्नोलॉजीModiInnovationFranceAmericatrumpIndiag7europeparisयूरोपit
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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