उत्तराखंड : जंगलों में सैकड़ों दरगाह कैसे बन गयीं ?
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उत्तराखंड : जंगलों में सैकड़ों दरगाह कैसे बन गयीं ?

उत्तराखंड में बढ़ती मुस्लिम आबादी  की खबरों के बीच एक और खबर सुर्खियां बटोर रही है वो ये कि राज्य के जंगलों में एकाएक सैकड़ो की संख्या में दरगाहें बन गयी है। ये कब और कैसे बन गयी इस बारे में वन विभाग से सवाल पूछा जा रहा है।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Apr 26, 2022, 04:47 pm IST
inभारत, उत्तराखंड

उत्तराखंड के वनों में आम आदमी की घुसपैठ नहीं हो सकती। वन कर्मचारी किसी को भी जंगल नहीं जाने देते फिर राज्य के रिजर्व फॉरेस्ट एरिया में सैकड़ों की संख्या में मज़ारे कैसे बन गयीं?

कुमायूँ के बाजपुर से लेकर कालाढूंगी तक 20 किलोमीटर जंगल मार्ग में तीन तीन दरगाह शरीफ के बोर्ड देखे जा सकते हैं । ये ऐसे कौन से पीर थे जोकि घने जंगलों में जाकर रहते थे और बाद में इनकी दरगाह बना दी गयी?जंगल रोड पर हरे रंग के बोर्ड और वहां एक गोलक पड़ी हुई देखी जा सकती है। कुछ साल पहले तक यहां न तो कोई मजार थी न ही इन जंगलों में कोई प्रवेश ले सकता था।

दरगाहें न सिर्फ फ़ॉरेस्ट रिज़र्व में बन गयी हैं बल्कि टाइगर रिज़र्व के कोर ज़ोन तक मे देखी जा रही हैं। जिनमें जिम कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व भी शामिल है। तीर्थनगरी के किनारे राजा जी टाइगर रिजर्व में भी दर्जनों की संख्या में दरगाहें बन गयी हैं और यहां मोटे-मोटे नग, हरे कपड़े और पगड़ी पहने मुस्लिम लोग मोरपंखी झुलाते हुए काबिज हो गए हैं। जानकारी मिली है कि ये दरगाहें संदिग्ध किस्म के लोगो की शरणस्थली भी बन गयी हैं। जानकारी के मुताबिक ये दरगाहें, नशाखोरी के अड्डे बन गए हैं।

हल्द्वानी गौला, टनकपुर में शारदा, रामनगर में कोसी नदी किनारे वन विभाग की ज़मीन पर हज़ारों की संख्या में मुस्लिम लेबर ने अपनी झोपड़ियां झाले बना लिए हैं और इनके बीच मे तीन से चार दरगाह और मज़ार स्थापित हो गयी हैं।

ऐसा हर उस नदी किनारे देखने मे आ रहा है, जहां खनन होता है। दरगाह स्थापित करने वाले योजनाबद्ध तरीके से आकर सरकारी वन भूमि पर काबिज हो रहे हैं। उत्तराखंड देवभूमि है। पूरे विश्व में ये हिमालय शिवालिक अध्यात्म की राजधानी माना जाता रहा है। आज़ादी के वक्त यहां नाम मात्र की मुस्लिम आबादी थी और दरगाहें तो दूर-दूर तक नहीं थीं।जानकर बताते हैं कि उत्तराखंड राज्य बनने तक ये दरगाहें नहीं थीं। ये सब 2010 और 2020 के कालखंड में हुआ है। खास बात ये कि ये दरगाहें हर साल जंगल के भीतर उर्स मनाने लगी हैं और बाकायदा लाउडस्पीकर के शोर के साथ कव्वालियां गायी जा रही हैं और वनकर्मी मूकदर्शक बने रहते हैं। वैसे कोई सामान्य व्यक्ति जंगल मे वन कर्मियों के डर से जा नहीं सकता।

हल्द्वानी शहर के बीचोबीच वन विभाग का चीड़ डिपो है यहां देखते देखते ही एक मजार बनी और अब यहां पक्की इमारत बन गयी और अब यहां उर्स होने लगा है। ऐसे ही कॉर्बेट पार्क एरिया में भी हुआ है।

उत्तराखंड के तराई फ़ॉरेस्ट और हरिद्वार के मोतीचूर, श्यामपुर के फ़ॉरेस्ट डिवीजन, कॉर्बेट कालागढ़ ,बिजरानी, नंधौर, सुरई फ़ॉरेस्ट डिवीजन आदि  में भी ऐसी सैकड़ों दरगाह-मज़ार बन गयी हैं? जानकारी मिली है कि टिहरी झील के किनारे भी पिछले साल इसी तरह की दरगाह शरीफ मज़ारे बनाई गई है।

उत्तराखंड में रोहिंग्या और बंग्लादेशी लोगों की घुसपैठ की खबरें आ रही हैं और साथ ही साथ उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी का बढ़ना भी यहां के जनसंख्या असंतुलन की समस्या को बढ़ावा दे रहा है। जिस पर उत्तराखंड सरकार ने इनदिनों सत्यापन अभियान चलाया हुआ है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बयान दिया है कि वो राज्य में समान नागरिक संहिता कानून बनाने जा रहे हैं। धामी ये भी कह चुके हैं कि वो गैरकानूनी रूप से रह रहे लोगों की पहचान करवा रहे हैं।

मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक का बयान

उत्तराखंड में जंगलों में खासतौर पर रिजर्व फ़ॉरेस्ट में दरगाहों के  बन जाने के सवाल पर राज्य के मुख्य  वन्य जीव प्रतिपालक डॉ पराग मधुकर धकाते का कहना है कि हमारे संज्ञान में ये मामला आया है। हमने सभी डिवीजन से रिपोर्ट मंगवायी है कि उनके क्षेत्र में कौन-कौन से धार्मिक स्थल हैं ? कब-कब ये स्थापित हुए हैं? इस बारे में जानकारी एकत्र करवायी जा रही है। डॉ धकाते ने बताया कि नए धर्मस्थल बनाये जाने के लिए जिला प्रशासन से अनुमति लेना जरूरी है, यदि ये गैरकानूनी हैं तो इन्हें हटाया जाएगा।

Topics: उत्तराखंड जंगलजंगलों में अवैध कब्ज़ाजंगलों में अवैध मजारेंलैंड जिहादजमीन जिहादuttarakhand forestillegal occupation in forestsillegal tombs in forestsland jihadUttarakhand Newsउत्तराखंड समाचार
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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