अनन्य हिन्दी प्रेमी व भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने के प्रबल समर्थक थे। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा उन्हीं के अथक प्रयासों का सुफल था। अंग्रेजों की अधीनता से मुक्त होने के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति के अभाव में देश से राजकाज की भाषा अंग्रेजी में तब्दील हो चुकी थी। ऐसे में जिन महापुरुषों ने आजाद भारत में हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने में अपना महती योगदान दिया; उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन की मानी जाती है। हिंदी की सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश लेने वाले इस महामानव के राजनीतिक जीवन का प्रारंभ 1905 में तब हुआ था जब उन्होंने बंगभंग आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया था।
हिंदी को राजभाषा बनाने में अहम योगदान
यह वह वक्त था जब उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए स्वदेशी का व्रत धारण किया था। देश की आम जनता के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता और हिन्दी के उत्थान के प्रति के प्रेम को देखते हुए 1906 में उन्हें इलाहाबाद से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अनन्य हिन्दी प्रेमी व भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने के प्रबल समर्थक थे। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा उन्हीं के अथक प्रयासों का सुफल था। अंग्रेजों की अधीनता से मुक्त होने के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति के अभाव में देश से राजकाज की भाषा अंग्रेजी में तब्दील हो चुकी थी। ऐसे में जिन महापुरुषों ने आजाद भारत में हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने में अपना महती योगदान दिया; उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन की मानी जाती है।
राजनीति के साथ हिंदी सेवा का सफर
हिंदी की सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश लेने वाले इस महामानव के राजनीतिक जीवन का प्रारंभ 1905 में तब हुआ था जब उन्होंने बंगभंग आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया था। यह वह वक्त था जब उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए स्वदेशी का व्रत धारण किया था। देश की आम जनता के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता और हिन्दी के उत्थान के प्रति के प्रेम को देखते हुए 1906 में उन्हें इलाहाबाद से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधि चुना गया। इसी समय टण्डन जी अपने साहित्यिक जीवन में भी आगे बढ़ रहे थे। यही समय था जब उनकी प्रसिद्ध रचना बन्दर सभा महाकाव्य “हिन्दी प्रदीप” में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद टण्डन जी ने 10 अक्टूबर 1910 को “नागरी प्रचारिणी सभा”, वाराणसी के प्रांगण में “हिन्दी साहित्य सम्मेलन” की स्थापना की थी। इसके कुछ साल बाद हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए 1918 में उन्होंने “हिन्दी विद्यापीठ” की नींव रखी।
आजादी की लड़ाई और हिंदी के लिए संघर्ष
इसके उपरांत “हिन्दी साहित्य सम्मेलन” के “इंदौर अधिवेशन” में भी उन्होंने स्पष्ट रूप से राजकीय सभाओं, कांग्रेस की प्रांतीय सभाओं और अन्य सम्मेलनों में देशवासियों से अंग्रेजी का प्रयोग न करने का आह्वान किया था। गांधी जी के आह्वान पर वे 1920 में असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। 1931 में लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन से गांधी जी के वापस लौटने से पहले जिन स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार किया गया था, उनमें जवाहरलाल नेहरू के साथ पुरुषोत्तम दास टण्डन प्रमुख थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लगभग सात बार जेल जाने वाले टण्डन जी ने इलाहाबाद के मेयर के रूप अपने कार्यकाल के दौरान हिन्दी को भी जनप्रिय बनाने के अनेक साहसी तथा ऐतिहासिक कार्य किये। वर्ष 1947 में जहां एक ओर उन्होंने “हिन्दी रक्षक दल” की स्थापना की वहीं दूसरी ओर 14 जून 1947 को जब कांग्रेस कार्य समिति ने देश के विभाजन के प्रस्ताव जब अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के समक्ष मंजूरी के लिए रखा था तब इसका विरोध करने वालों में सबसे मुखर स्वर पुरुषोत्तम दास टण्डन का था। इसके पीछे उनका मानना था कि विभाजन स्वीकार करने का मतलब होगा अंग्रेजों की “फूट डालो और शासन करो” की नीति को परोक्ष रूप से पुन: स्वीकार कर लेना।
हिंदी के लिए टण्डन जी का समर्पण
पुरुषोत्तम दास टण्डन हिन्दी में भारत की मिट्टी की सुगंध महसूस करते थे। बताते चलें कि आज़ादी के पूर्व एक दशक से अधिक समय तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहे टण्डन जी हिन्दी के अनन्य सेवक होने के साथ समर्पित राजनयिक, कर्मठ पत्रकार, तेजस्वी वक्ता और समाज सुधारक भी थे। उन्हें भारत के राजनैतिक और सामाजिक जीवन में नयी क्रान्ति पैदा करने वाले कर्मयोगी के रूप में जाना जाता है। इसीलिए वे जन सामान्य के बीच राजर्षि (जो ऋषि के समान सत्कार्य में लगा रहे) के रूप में प्रसिद्ध हुए। कहा जाता है कि यह उपाधि उन्हें महान संत देवरहा बाबा ने दी थी। गौरतलब हो कि टण्डन जी हिन्दी को देश की आजादी के पहले आजादी प्राप्त करने का और आजादी के बाद आजादी को बनाये रखने का सशक्त साधन मानते थे। सनद रहे कि महात्मा गांधी के अनुयायी होने के बावजूद हिंदी के मामले में उनके विचारों से पूरी तरह सहमत नहीं थे। बताते चलें कि महात्मा गांधी और पण्डित नेहरू राजभाषा के नाम पर हिंदी-उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी भाषा के पक्षधर थे, जिसे देवनागरी और फारसी दोनों लिपि में लिखा जा सके; लेकिन टण्डन जी उनसे सहमत नहीं थी।
हिंदी को राजभाषा बनाने की निर्णायक लड़ाई
उल्लेखनीय है कि राजभाषा चयन को लेकर 1949 में हो रही संविधान सभा की बैठक में महात्मा गांधी, पण्डित नेहरू और डॉ राजेन्द्र प्रसाद समेत कई नेता उर्दू-फारसी मिश्रित हिन्दुस्तानी के पक्षधर थे, जबकि दूसरा पक्ष संस्कृतनिष्ठ हिंदी के लिए मुखरता से आवाज उठा रहा था। इस पक्ष के नेता थे पुरुषोत्तम दास टंडन। कहा जाता है कि 11, 12, 13 और 14 सितम्बर 1949 को इस मुद्दे पर संविधान सभा में गरमागरम बहस के उपरांत हिंदी और हिन्दुस्तानी को लेकर मतदान हुआ तो हिन्दी को 62 और हिन्दुस्तानी को 32 मत मिले। इस तरह टण्डन जी के प्रयासों से हिन्दी राजभाषा और देवनागरी राजलिपि घोषित हुई। हालांकि राजर्षि टण्डन जी पर हिंदी का अधिक समर्थन करने व अन्य भाषाओं को नजरअंदाज करने तथा सांप्रदायिक होने का आरोप भी लगा। मगर मातृभाषा के प्रति अनूठा लगाव और भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति गहन निष्ठा उनकी हिन्दी सेवा की संजीवनी बनी रही। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष के अपने कार्यकाल में विधानसभा में हिंदी का राजकाज की भाषा के रूप में हिन्दी का प्रयोग शुरू कराया अपितु हिन्दी को “राष्ट्रभाषा” और “वन्देमातरम” को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृत कराने के लिए अपने सहयोगियों के साथ एक अभियान भी चलाया था। 17 फरवरी 1951 को मुजफ्फरनगर (बिहार) में आयोजित एक सार्वजनिक सभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा था, “हिन्दी के पक्ष को सबल करने के उद्देश्य से ही मैंने राजनीति में प्रवेश लिया क्योंकि मेरे हृदय पर हिन्दी का ही प्रभाव सबसे अधिक था और मैंने उसे ही अपने जीवन का सबसे महान व्रत बनाया।”
हिंदी प्रेम की अनोखी मिसाल
जानना दिलचस्प हो कि हिन्दी भाषा को देश में अग्रणी स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाने के लिए भारत सरकार द्वारा जब उन्हें “भारत रत्न” और सुमित्रानंदन पंत को “पद्मभूषण” की उपाधि से विभूषित किया गया तो इस पर अपने मित्र व वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकार वियोगी हरि से उन्होंने कहा था कि उन्हें खुद को “भारत रत्न” मिलने की उतनी खुशी नहीं हुई जितनी पंत जी को “भारत रत्न” न मिलने का दुख हुआ। वियोगी हरि ने अपने संस्मरण में लिखा है कि टण्डन जी का कहना था कि यह ठीक है कि मैंने हिन्दी के लिए काम किया है पर आगे चलकर लोग पुरुषोत्तम दास टण्डन को भूल जाएंगे लेकिन पंत जी की कविताएं तो हमेशा अमर रहेंगी। इसलिए सुमित्रानंदन पंत को “भारत रत्न” मिलना चाहिए था। ऐसा अनूठा था राजर्षि का हिन्दी प्रेम!















