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होम सम्पादकीय

विषाणु, विभाजक-विध्वंसक राजनीति और तीसरी लहर

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 31, 2021, 02:15 pm IST
inसम्पादकीय

भारत में जो लोग यह कहते है कि सरकार बहुत सबल है और इसके साथ ही वे इस सबलता में मनमानेपन का कारक जोड़ने की कोशिश करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि अगर विपक्ष की हालत खराब हुई है, उसकी दुर्गति हुई है तो वह बुरी नीतियों और भ्रष्टाचार के कारण हुई है।

भारत कोविड-19 की दो लहरें झेल चुका है और अब तीसरी लहर की बात हो रही है। इस बीच में दो तरह की तैयारी दिख रही है।
●एक तरफ तो भारत पूरी सकारात्मकता के साथ वैक्सीनेशन की तैयारी कर रहा है। टीकाकरण में हम दुनिया में कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। वैक्सीन के लिए, कच्चे माल के लिए अमेरिका से बात कर रहे हैं। हमने पहली लहर में दुनिया को मुकाबला करके दिखाया था। दूसरी लहर थरार्ने वाली थी। परंतु तीसरी लहर के पहले हमारी तैयारी बता रही है कि हम डिगे नहीं है, हमें झटका लगा है पर जीतने का संकल्प दूसरी बरकरार है।
●दूसरी तरफ, देश में नकारात्मकता की राजनीति करने वाले कुछ खेमे तीसरी लहर की आशंकाओं को अपनी राजनीति को स्थापित करने का अवसर बनाने के लिए तैयारी में जुटे हैं।

गौर करने वाली बात यह है की राजनीति के अखाड़े में ताल ठोकते यह सिपहसालार ऐसे हैं जिनके पास तर्क नहीं हैं, तथ्य नहीं हैं, जनहित की मंशा नहीं है और जनमत भी नहीं है।
भारतीय लोकतंत्र की विशेषता के संदर्भ में खीझे-छीजे विपक्ष की एकता के कारकों को समझना आवश्यक है। और यह भी कि वे कौन हैं जो इस त्रासदी काल में भी ‘तीसरी लहर’ के स्वागत के लिए आतुर हैं?

खीझा विपक्ष और अराजकता का ‘इकोसिस्टम’
चीन सरीखी एकदलीय व्यवस्था और उसमें भी एक ही व्यक्ति के गिर्द घूमते तंत्र में सब चीजें दबाई जा सकती हैं। मगर भारत चीन नहीं है। अमेरिका सरीखी द्विदलीय पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति की बजाय बैलेंसशीट पर नजर जमाकर चलते हुए मनमाने मुनाफे का क्रम जारी रह सकता था। किन्तु भारत अमेरिका भी नही है। भारत में लोक कल्याण की अवधारणा भी पश्चिम के कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से अलग है। समाज को कमजोर कर सबकुछ सरकार को सौंपना और फिर हर चीज के लिए सरकार का मुंह तकना, यह इस राष्ट्र के संस्कार में नहीं है। यहां लोक, तंत्र के साथ कदम मिलाकर चलता है और तंत्र लोक के मन का होता है। इस मायने में भारतीय लोकतंत्र विश्व की सबसे अनूठी व्यवस्था है।
भारत में जो लोग यह कहते है कि सरकार बहुत सबल है और इसके साथ ही वे इस सबलता में मनमानेपन का कारक जोड़ने की कोशिश करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि अगर विपक्ष की हालत खराब हुई है, उसकी दुर्गति हुई है तो वह बुरी नीतियों और भ्रष्टाचार के कारण हुई है।
लोकतंत्र में विपक्ष मजबूत जरूर होना चाहिए किन्तु विपक्ष की सेहत ठीक रहे, इसका ठीकरा पक्ष या सत्ता पर नहीं फोड़ा जा सकता। विपक्ष की नीति और नीयत कितनी लोकोन्मुखी हैं, इसी के आधार पर विपक्ष की सेहत तय होती है।
ये एक कारक है। और दूसरा, खीझे हुए विपक्ष की एकता है। इन खीझों, झल्लाहटों, बौखलाहटों से एक पारिस्थितिक तंत्र या ‘इकोसिस्टम’ बनता है। ये हाशिये पर पड़े हुए तत्व जनता के साथ क्या कर रहे हैं, करते रहे हैं, यह नहीं देखते। दरअसल, इनकी साझा दुर्गति ने सबको साथ ला खड़ा किया है।

तैयारी आफत को आमंत्रण की!
दिल्ली में आॅक्सीजन व्यवस्था में कुप्रबंधन का सर्वश्रेष्ठ नमूना दिल्ली के मुख्यमंत्री दिखा चुके हैं। मत भूलिए कि वे यह सार्वजनिक तौर पर घोषित चुके हैं कि वे अराजकतावादी हैं। ऐसे में क्या आश्चर्य कि पिछले दिनों सबसे बड़ी अराजकता देश की राजधानी में देखने को मिली। सड़कों पर लोग मरे, ठेलों पर ले जाए गए। आॅक्सीजन के मामले में न्यायालय में खुलासा हुआ कि चुनिंदा अस्पतालों को आॅक्सीजन देना और बाकी अस्पतालों को ठेंगा दिखा देना, इसके पीछे और कोई नहीं, खुद दिल्ली सरकार थी।
एक तरफ देश समस्याओं से लड़ रहा है तो दूसरी तरफ दिल्ली सरकार आफत को फिर आमंत्रण देने की तैयारी कर रही है।

●दिल्ली में 18 साल से ऊपर यानी युवाओं के कोविडरोधी टीकाकरण कार्यक्रम को राज्य सरकार बंद कर चुकी है।
●कोविड काल मे दिल्ली की आफत, पंजाब की, उत्तर प्रदेश की या पूरे देश की आफत बन जाए, इसके लिए दिल्ली के मुहाने पर महामारी का मजमा लगाने वाले ‘आढ़तियों के ऐजेंटों’ को सरकार समर्थन दे रही है।
●सीरम इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया, भारत बायोटेक द्वारा निर्मितदेशी वैक्सीन पर सवाल उठाने वाले लोग विदेशी वैक्सीन की पैरोकारी ही नहीं, विदेशी कंपनियों से सीधे संपर्क करने के स्तर पर उतर आए। ये उन कंपनियों से सौदा करने को उतावले दिखे जो अपनी दवा से जुड़ी कोई दुर्घटना होने की स्थिति में मुआवजा भी नहीं देना चाहतीं।
●संकट के समय आंदोलनजीवियों की एक कतार सीमा जाम करने, उपद्र्रव करने की तैयारी में जुटी है तो दूसरी कतार बच्चों के लिए वैक्सीन का परीक्षण करने की राह में बाधा डाल रही है।
बहरहाल, संकटकाल में देश के लिए परेशानियों को गहरा करने वाला खेल देश ने 26 जनवरी को भी देखा था। एक टूलकिट तब भी सामने आई थी। 26 मई को इसे रीलांच करने में भी एक टूलकिट की तैयारी थी।
देश देख रहा है कि स्वयं को विपक्ष कहने वाले, वास्तव में उपद्रव को पालने वाले बन चुके हैं। किन्तु समय रहते इस पूरे षडयंत्र का खुल जाना ही इस संकट काल का सबसे बड़ा सबक और उपलब्धि है। और यही कारण है कि समाज संकल्पित है-वह अब महामारी के वायरस से भी लड़ेगा और विध्वंसक-विभाजक राजनीति से भी।
हितेश शंकर @hiteshshankar

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